यिर्मयाह 6
पाठ
यरूशलेम के दक्षिण में तकोआ की पहाड़ी पर नरसिंगा फूँका जा रहा है और बेथक्केरेम की चोटी पर झंडा उठ रहा है: उत्तर से आनेवाली सेना के आगे-आगे भागो। यहोवा स्वयं घेराबंदी का आदेश देते हैं, क्योंकि यह नगर "दण्ड के योग्य" है, इसमें से कुएँ के ताज़े पानी की तरह लगातार नई बुराई निकलती रहती है। भविष्यद्वक्ता और याजक घाव को ऊपर-ऊपर से बाँधकर "शान्ति है, शान्ति" कहते हैं; लोग प्राचीन अच्छे मार्ग पर चलने से और पहरुओं का नरसिंगा सुनने से साफ़ इनकार कर देते हैं। अंत में यिर्मयाह को धातु परखनेवाला ठहराया जाता है, और भट्ठी से जो निकलता है वह खोटी चाँदी है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि आक्रमण का आदेश कौन दे रहा है। अध्याय में बेबीलोनी सेनापतियों की आवाज़ें सुनाई देती हैं, "उठो, हम दोपहर को चढ़ाई करें", पर उनके पीछे खड़े होकर "वृक्ष काट-काटकर यरूशलेम के विरुद्ध मोर्चा बाँधो" कहनेवाले सेनाओं के यहोवा हैं। इस्राएल की धारणा थी कि मंदिरवाला नगर अछूता है; यिर्मयाह कहते हैं कि परमेश्वर स्वयं उस नगर के विरुद्ध मोर्चा बाँध रहे हैं। यह ईश्वर की नैतिक गंभीरता है: वे अपने लोगों के भीतर के "उत्पात और उपद्रव" को अनदेखा करके अपनी ही प्रतिष्ठा नहीं बचाते। और फिर भी बीच में एक दरवाज़ा खुला रह जाता है, "ताड़ना से ही मान ले", मानो न्यायाधीश अपना हथौड़ा हवा में रोके हुए हो।
मुख्य सूत्र
पद 16 इस अध्याय का धड़कता हुआ दिल है: "प्राचीनकाल का अच्छा मार्ग कौन सा है, उसी में चलो, और तुम अपने-अपने मन में चैन पाओगे।" यह निमंत्रण है, धमकी नहीं; यहोवा चौराहे पर खड़े यात्रियों से रास्ता पूछने को कहते हैं, जैसे कोई बूढ़ा गाँववाला दिशा बताता हो। और उत्तर आता है, "हम उस पर न चलेंगे।" सदियों बाद एक और शिक्षक यरूशलेम की सड़कों पर खड़े होकर कहेंगे कि मेरे पास आओ और तुम्हारे मन को विश्राम मिलेगा, और उसी नगर पर रोएँगे क्योंकि उसने समय को नहीं पहचाना। परमेश्वर का तरीका नहीं बदलता: पहले पुकार, फिर परिणाम। मसीह में वही पुकार देह धारण करके सड़क पर आ खड़ी होती है।
दर्पण
"वे मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा करते हैं, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं।" यह वाक्य आज भी काटता है। हम में से बहुतों ने यही सीखा है: टूटते विवाह पर मुस्कान की पट्टी बाँध दो, दफ़्तर के बेईमान हिसाब पर "सब ऐसा ही करते हैं" का मरहम लगा दो, बच्चे की दूरी पर "यह उम्र का असर है" कह दो। और पद 15 और भी तीखा है: "वे लज्जित होना जानते ही नहीं।" यह शर्म का मर जाना है, वह सुन्नपन जो पाप को सामान्य बना देता है। पूछिए अपने आप से, पिछली बार किस बात पर आपका अंतःकरण सचमुच चुभा था?
आज ही दस मिनट निकालिए, काग़ज़ पर अपने जीवन का वह एक घाव लिखिए जिस पर आपने "शान्ति है, शान्ति" की पट्टी बाँध रखी है, और उसे नाम लेकर परमेश्वर के सामने ज़ोर से बोलिए।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर एक थके हुए पिता की तरह बोलते हैं: "मैं उसे रोकते-रोकते थक गया हूँ।" क्रोध उनके भीतर इसलिए भर गया क्योंकि उन्होंने उसे इतनी देर तक रोके रखा। यह मनमौजी देवता नहीं है जो बिजली गिराने को तैयार बैठा हो; यह वह है जिसने शेबा के लोबान और महँगी सुगन्धित नरकट की भेंटें वर्षों तक सही हैं और अब कहता है, "इसका क्या प्रयोजन है?" उपासना की धूप मंदिर में उठती रही जबकि बाज़ारों में ग़रीब लुटते रहे। और फिर पद 26 में वही परमेश्वर अपनी प्रजा से कहते हैं कि इकलौते पुत्र की मृत्यु जैसा विलाप करो, जैसे वे स्वयं उस मातम में शामिल हों।
प्रश्न
अगर अंत में भट्ठी व्यर्थ रही, "ढालनेवाले ने व्यर्थ ही ढाला है", तो क्या परमेश्वर का अनुशासन असफल हो सकता है? यह अध्याय कोई सुखद मोड़ नहीं देता। धौंकनी जल गई, सीसा जल गया, और खोट बाहर नहीं निकला। हम कहना चाहते हैं कि कष्ट हमेशा शुद्ध करता है, पर यिर्मयाह गवाही देते हैं कि कुछ लोग आग में जाकर और कठोर होकर निकलते हैं। यही दुखदायी सच्चाई है जिसे हम अपने परिवारों में देखते हैं। पाठ इसे सुलझाता नहीं। वह केवल बताता है कि परमेश्वर ने सचमुच कोशिश की, और मनुष्य सचमुच इनकार कर सकता है।
अंतर्पाठ
पद 10 के हाशिये पर प्रेरितों 7:51 लिखा है, जहाँ स्तिफनुस महासभा से कहते हैं कि तुम हठीले और मन तथा कान के खतनारहित हो। वह जानबूझकर यिर्मयाह की भाषा उठाता है: वही नगर, वही बहरापन, छह सौ वर्ष बाद। और यहेजकेल 13:10 में वही शिकायत दोहराई जाती है कि झूठे भविष्यद्वक्ता दीवार पर केवल कलई पोतते हैं। दो अलग युगों के दो गवाह एक ही बात कहते हैं: धार्मिक नेतृत्व का सबसे बड़ा प्रलोभन लोगों को वह सुनाना है जो वे सुनना चाहते हैं। कलई की दीवार बारिश में गिरती है, और पट्टी के नीचे घाव पकता रहता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह "प्राचीन अच्छा मार्ग" कौन सा है जिसे आप जानते तो हैं, पर जिस पर चलने से चुपचाप इनकार करते आए हैं?
आप जिन लोगों के बीच अगुवाई करते हैं, क्या आप उन्हें सच कहते हैं, या शान्ति का वह आश्वासन देते हैं जो आपके लिए सुविधाजनक है?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तेरी चेतावनी भी तेरे प्यार का हिस्सा है, यह मैं अक्सर भूल जाता हूँ। मेरा मन कठोर न हो, बल्कि तेरी बात सुनकर नरम पड़े। जहाँ मैं गलत राह पर हूँ, वहाँ मुझे रोक ले। तुझसे दूर होकर जीना मैं नहीं चाहता।
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