बाइबल व्याख्या

रोमियों 12:2

बाइबल
यह वचन Indian Pentecostal Church द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस दो दिशाओं में खींचती हुई दो शक्तियों के बीच खड़ा करता है: एक ओर "इस संसार" का ढाँचा, जो चुपचाप हमें अपने साँचे में ढाल लेता है, और दूसरी ओर परमेश्वर का वह काम जो भीतर से, बुद्धि के नवीनीकरण से शुरू होता है। इसलिए वह कहते हैं: "इस संसार के सदृश्य न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।" और इस बदलाव का लक्ष्य कोई नैतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक पहचानने की क्षमता है: कि तुम परमेश्वर की "भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा" को अनुभव से, जीते-जीते, जान सको। एक निषेध, एक प्रक्रिया, एक उद्देश्य।

मूल बात

ध्यान दें कि यह आदेश कहाँ से आता है। पिछली आयत में पौलुस "परमेश्वर की दया" की याद दिलाते हैं, और ग्यारह अध्यायों तक उन्होंने उसी दया को खोलकर रखा है: पापी को धर्मी ठहराया जाना, मसीह में गोद लिया जाना, वह अनुग्रह जिसे हमने कमाया नहीं। यानी यह पद कोई सीढ़ी नहीं है जिससे ऊपर चढ़कर हम परमेश्वर तक पहुँचें; यह उस घर का जीवन-ढंग है जिसमें हमें मुफ़्त में भीतर बुला लिया गया है। पवित्रता कारण नहीं, परिणाम है।

और गहराई में जाएँ: "इस संसार" के लिए जिस शब्द का प्रयोग होता है वह आयोन है, यानी "यह युग", वह पुरानी व्यवस्था जो आदम से चली आ रही है और जिसके ऊपर परमेश्वर का न्याय घोषित हो चुका है। मसीह के पुनरुत्थान के साथ आनेवाला युग भीतर घुस आया है, और विश्वासी दो युगों की सीमा पर जीता है। इसलिए बदलाव का ज़ोर बुद्धि पर है: सृष्टि में मनुष्य को परमेश्वर की छवि में सोचने-विवेक करने के लिए बनाया गया था, और पाप ने पहले उसी विवेक को अंधा किया। उद्धार इसी को लौटाता है, इसलिए नई वाचा का वादा भी भीतर लिखे जाने का वादा था, पत्थर पर नहीं, मन पर।

सूत्र

परमेश्वर का तरीका शुरू से यही रहा है: पहले छुड़ाना, फिर आकार देना। इस्राएल को पहले मिस्र से बाहर लाया गया, फिर सीनै पर व्यवस्था मिली; मुक्ति शर्त नहीं थी, आधार थी। पौलुस ठीक वही क्रम दोहराते हैं, पर अब नई वाचा के भीतर। पुराने नियम में मंदिर, बलिदान और खान-पान की सीमाएँ इस्राएल को कनान के साँचे में ढलने से बचाती थीं; अब वह सीमा बाहर नहीं, भीतर खींची जाती है, "बुद्धि के नये हो जाने से"। और यह नवीनीकरण किसी अनुशासन का नहीं, मसीह का फल है: जो उनके साथ मरा और जी उठा, वह पुराने युग की नागरिकता छोड़कर आनेवाले राज्य में गिना जाता है। इसलिए यह आयत नैतिकता नहीं, उद्धार-इतिहास का वर्तमान अध्याय है।

दर्पण

"संसार के सदृश्य" बनना शायद ही कभी नाटकीय होता है। यह उस पल में होता है जब आप बच्चों के स्कूल का चुनाव सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि लोग क्या कहेंगे; जब वेतन की रकम आपके भीतर आपकी कीमत तय करने लगती है; जब आप अपने बीमार माता-पिता की सेवा को "समय की बर्बादी" के तराज़ू पर तौलने लगते हैं, क्योंकि यही युग सिखाता है कि उपयोगिता ही मूल्य है। साँचा दबाव नहीं डालता, वह सुविधा देता है। इसीलिए पौलुस भावनाओं को नहीं, बुद्धि को निशाना बनाते हैं: जब तक सोचने का ढाँचा नहीं बदलता, व्यवहार बदलकर भी वही पुराना बना रहता है। आज ही एक काम कीजिए: पिछले सात दिनों का अपना एक ऐसा निर्णय कागज़ पर लिखिए जो आपने केवल "लोग क्या कहेंगे" के डर से लिया, और उसे नाम लेकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।

मुख्य पात्र

इस पद का असली कर्ता परमेश्वर हैं, भले ही क्रियाएँ हमें दी गई हों। "बदलता जाए" की बनावट ही ऐसी है कि काम हम पर किया जाता है; हम अपनी बुद्धि को नया नहीं कर सकते, हम उसे नया होने दे सकते हैं। और जो परमेश्वर यह काम करते हैं, उनका चरित्र यहीं खुल जाता है: उनकी इच्छा "भली, और भावती, और सिद्ध" है। यानी वे कोई कठोर मालिक नहीं जो आज्ञाकारिता तो माँगें पर उसका लाभ अपने पास रखें। दया से शुरू करनेवाले परमेश्वर की माँग भी दयालु ही होती है। यही कारण है कि समर्पण घुटन नहीं, स्वतंत्रता है: जिस युग से हम चिपके हैं, वह हमें खा जाता है; जो परमेश्वर हमें बदलते हैं, वे हमें लौटाते हैं।

एक बारीकी

"अनुभव से मालूम करते रहो" पर रुकिए। यहाँ जिस शब्द का प्रयोग है वह दोकिमाज़ो है, जो सिक्कों या धातु को परखने के लिए इस्तेमाल होता था: असली है या खोटा, यह जाँचकर स्वीकार करना। परमेश्वर की इच्छा यहाँ कोई गुप्त नक्शा नहीं है जिसे खोजना है, बल्कि एक ऐसी चीज़ है जिसे परखी हुई बुद्धि पहचान लेती है, जैसे अनुभवी हाथ खरे सोने को छूकर जान लेता है। इसका अर्थ यह भी है कि हर मोड़ पर आकाश से आवाज़ की प्रतीक्षा करना ज़रूरी नहीं; ज़रूरी है ऐसी बुद्धि जो अनुग्रह से इतनी गढ़ी जा चुकी हो कि खोटे विकल्प अपने आप बेस्वाद लगने लगें।

श्रोताओं का चेहरा

रोम की कलीसिया साम्राज्य की राजधानी में बैठी थी, जहाँ सम्राट का चेहरा हर सिक्के पर था और नगर का पूरा जीवन देवताओं, संरक्षकों और सामाजिक सीढ़ियों के इर्द-गिर्द बुना था। यहूदी विश्वासी क्लौदियुस के निष्कासन के बाद लौटकर देख रहे थे कि गैर-यहूदी भाई अब बहुमत में हैं; तनाव असली था। ऐसे मिले-जुले समूह के लिए "इस संसार के सदृश्य न बनो" का मतलब समाज छोड़कर भाग जाना नहीं था, बल्कि उसी शहर में एक अलग तर्क से जीना: जहाँ बदला लेना सामान्य था, वहाँ भलाई से बुराई को जीतना। यह छोटी, कमज़ोर, बिखरी हुई मंडली को बताया गया कि वही आनेवाले युग की चौकी है।

चिंतन

इस युग का कौन-सा तर्क मेरे भीतर इतना स्वाभाविक हो चुका है कि मैं उसे ईसाई समझने लगा हूँ?

यदि परमेश्वर की इच्छा को "परखकर" पहचानना है, तो मेरी बुद्धि पिछले एक साल में किन चीज़ों से गढ़ी गई है?

Romans में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Romans 1-7 For You

Timothy Keller

Keller opens Paul's masterpiece with clarity and pastoral warmth.

Romans 8-16 For You

Timothy Keller

The second half: assurance, election and everyday Christian living.

The Message of Romans

John Stott

A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

F.F. Bruce

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Romans

Douglas Moo

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Romans 12:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 12:2 का क्या अर्थ है?
पौलुस दो दिशाओं में खींचती हुई दो शक्तियों के बीच खड़ा करता है: एक ओर "इस संसार" का ढाँचा, जो चुपचाप हमें अपने साँचे में ढाल लेता है, और दूसरी ओर परमेश्वर का वह काम जो भीतर से, बुद्धि के नवीनीकरण से शुरू होता है। इसलिए वह कहते हैं: "इस संसार के सदृश्य न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।" और इस बदलाव का लक्ष्य कोई नैतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक पहचानने की क्षमता है: कि तुम परमेश्वर की "भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा" को अनुभव से, जीते-जीते, जान सको। एक निषेध, एक प्रक्रिया, एक उद्देश्य।
रोमियों 12:2 किस विषय में है?
और गहराई में जाएँ: "इस संसार" के लिए जिस शब्द का प्रयोग होता है वह आयोन है, यानी "यह युग", वह पुरानी व्यवस्था जो आदम से चली आ रही है और जिसके ऊपर परमेश्वर का न्याय घोषित हो चुका है। मसीह के पुनरुत्थान के साथ आनेवाला युग भीतर घुस आया है, और विश्वासी दो युगों की सीमा पर जीता है। इसलिए बदलाव का ज़ोर बुद्धि पर है: सृष्टि में मनुष्य को परमेश्वर की छवि में सोचने-विवेक करने के लिए बनाया गया था, और पाप ने पहले उसी विवेक को अंधा किया। उद्धार इसी को लौटाता है, इसलिए नई वाचा का वादा भी भीतर लिखे जाने का वादा था, पत्थर पर नहीं, मन पर।
रोमियों 12:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"संसार के सदृश्य" बनना शायद ही कभी नाटकीय होता है। यह उस पल में होता है जब आप बच्चों के स्कूल का चुनाव सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि लोग क्या कहेंगे; जब वेतन की रकम आपके भीतर आपकी कीमत तय करने लगती है; जब आप अपने बीमार माता-पिता की सेवा को "समय की बर्बादी" के तराज़ू पर तौलने लगते हैं, क्योंकि यही युग सिखाता है कि उपयोगिता ही मूल्य है। साँचा दबाव नहीं डालता, वह सुविधा देता है। इसीलिए पौलुस भावनाओं को नहीं, बुद्धि को निशाना बनाते हैं: जब तक सोचने का ढाँचा नहीं बदलता, व्यवहार बदलकर भी वही पुराना बना रहता है। आज ही एक काम कीजिए: पिछले सात दिनों का अपना एक ऐसा निर्णय कागज़ पर लिखिए जो आपने केवल "लोग क्या कहेंगे" के डर से लिया, और उसे नाम लेकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
रोमियों 12:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"अनुभव से मालूम करते रहो" पर रुकिए। यहाँ जिस शब्द का प्रयोग है वह दोकिमाज़ो है, जो सिक्कों या धातु को परखने के लिए इस्तेमाल होता था: असली है या खोटा, यह जाँचकर स्वीकार करना। परमेश्वर की इच्छा यहाँ कोई गुप्त नक्शा नहीं है जिसे खोजना है, बल्कि एक ऐसी चीज़ है जिसे परखी हुई बुद्धि पहचान लेती है, जैसे अनुभवी हाथ खरे सोने को छूकर जान लेता है। इसका अर्थ यह भी है कि हर मोड़ पर आकाश से आवाज़ की प्रतीक्षा करना ज़रूरी नहीं; ज़रूरी है ऐसी बुद्धि जो अनुग्रह से इतनी गढ़ी जा चुकी हो कि खोटे विकल्प अपने आप बेस्वाद लगने लगें।
रोमियों 12:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस युग का कौन-सा तर्क मेरे भीतर इतना स्वाभाविक हो चुका है कि मैं उसे ईसाई समझने लगा हूँ?
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Romans 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 17

पिता, धन्यवाद कि आपने हमें बदला लेने के बोझ से छुड़ाया। आपका वचन सिखाता है, "बुराई के बदले किसी से बुराई न करो," और यही हमारे मन की शांति बनता है। धन्यवाद कि आप हमें वह करने की शक्ति देते हैं जो सब लोगों के सामने भला है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 3

पिता, मुझे अपने बारे में सच्ची समझ दे। न इतना बड़ा समझूँ कि दूसरों को छोटा कर दूँ, न इतना कम कि तेरा दिया हुआ भूल जाऊँ। जो विश्वास तूने मुझे सौंपा है, उसी नाप से चलना सिखा, संयम और नम्रता के साथ।

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