अय्यूब 11:12
पाठ
सोपर अपनी बात के बीच में अचानक एक कहावत फेंकता है, जैसे कोई बहस के बीच पत्थर उछाल दे। वह कहता है: "निर्बुद्धि मनुष्य बुद्धिमान हो सकता है; यद्यपि मनुष्य जंगली गदहे के बच्चे के समान जन्म ले।" यानी खोखले दिमाग वाला आदमी भी कभी समझ पा सकता है, हालाँकि इंसान पैदा तो जंगली गधे के बछेड़े जैसा ही होता है, बेलगाम, अनगढ़, किसी की सुनने को तैयार नहीं। कहावत की मार साफ है: सोपर अय्यूब को ही वह निर्बुद्धि मान रहा है, जिसे अभी बुद्धि आनी बाकी है। यह कोई तटस्थ सूक्ति नहीं, बल्कि एक राख में बैठे, फोड़ों से भरे, संतानविहीन आदमी के मुँह पर मारा गया व्यंग्य है। आस-पास के पदों में सोपर परमेश्वर की अथाह बुद्धि की बात करता है (पद 7-9), और फिर उसी ऊँचाई से नीचे झुककर अपने मित्र को जानवर कह देता है।
मूल बात
इस आधे वाक्य में दो सच्चाइयाँ आपस में टकराती हैं। पहली: मनुष्य सचमुच अनगढ़ पैदा होता है। जंगली गधे का बछेड़ा किसी रस्सी को नहीं मानता, वह सुंदर है पर वश में नहीं; बाइबल का यह चित्र मनुष्य की उस स्वतंत्रता को पकड़ता है जो बहुत जल्दी विद्रोह बन जाती है। बुद्धि हमारे भीतर से अपने आप नहीं उगती, वह बाहर से, ऊपर से, परमेश्वर की ओर से आती है। यहाँ तक सोपर ठीक कह रहा है। दूसरी सच्चाई, जो सोपर भूल गया: यही बात उसके अपने बारे में भी सच है। जिसने अभी-अभी कहा कि परमेश्वर का मर्म आकाश से ऊँचा और अधोलोक से गहरा है, वह अगले ही साँस में दावा करता है कि वह अय्यूब के दुःख का कारण ठीक-ठीक जानता है। सिद्धांत सही, प्रयोग क्रूर। यही इस पद का धार्मिक हृदय है: परमेश्वर की अगम्यता को हथियार बनाकर किसी टूटे हुए व्यक्ति पर चलाना, स्वयं एक प्रकार की मूर्खता है। अनुग्रह जानता है कि हम सब बेलगाम पैदा हुए थे; घमंड यह भूल जाता है कि "हम सब" में वह भी शामिल है।
सम्बन्ध सूत्र
यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि जंगली गधे की छवि इस पुस्तक में दोबारा आती है, पर तब वह किसी इंसान के मुँह से नहीं, परमेश्वर के मुँह से निकलती है। अध्याय 39 में परमेश्वर उसी जंगली गधे का वर्णन गर्व से करते हैं: उन्होंने ही उसकी रस्सी खोली, उन्होंने ही उसे उजाड़ मैदान दिया। जिसे सोपर गाली के तौर पर इस्तेमाल करता है, उसे सृष्टिकर्ता अपनी कारीगरी कहते हैं। यही पूरे उद्धार-इतिहास का ढंग है। मनुष्य सचमुच बेलगाम है, यह सच है; पर परमेश्वर का उत्तर उसे तुच्छ कहना नहीं, उसके पास उतर आना है। बुद्धि ऊपर से आती है, हाँ, लेकिन वह आकाश से चिल्लाकर नहीं आई; वह देह लेकर, धूल में बैठकर, दुःखियों के साथ भोजन करते हुए आई। यीशु मसीह परमेश्वर की वही अगम्य बुद्धि हैं जो अय्यूब की राख तक पहुँचती है, और वहाँ पहुँचकर व्यंग्य नहीं करती।
आइना
सोपर बनना बहुत आसान है, और सबसे ज़्यादा वहाँ जहाँ हमारी धर्मशिक्षा मज़बूत हो। अस्पताल के गलियारे में जब कोई कहता है, "कहीं कुछ तो होगा उनके जीवन में"; छोटे समूह में जब किसी की बेरोज़गारी सुनकर हम तुरंत उसके बजट पर उपदेश देने लगते हैं; घर में जब उदास किशोर बेटी से हम कहते हैं कि तेरी प्रार्थना में कमी है। हर बार हमारी बात में थोड़ा सच होता है, और यही उसे और घातक बनाता है। असल खिंचाव यह है: दूसरे के दुःख को समझा देने से हमारा अपना संसार सुरक्षित लगने लगता है। यदि अय्यूब दोषी है, तो मैं सुरक्षित हूँ। आज एक काम करें: किसी ऐसे व्यक्ति को, जो अभी किसी गहरे दुःख से गुज़र रहा है, एक संदेश भेजें जिसमें एक भी सलाह, कारण या शिक्षा न हो, केवल यह कि आप उसे याद कर रहे हैं।
सन्दर्भ
यह तीसरे मित्र की पहली बारी है। एलीफज ने नरमी से शुरू किया था, बिलदद ने परंपरा का हवाला दिया, और अब सोपर, तीनों में सबसे तीखा, बिना भूमिका के वार करता है: "क्या यह बकवादी मनुष्य धर्मी ठहराया जाए?" पृष्ठभूमि में वह प्राचीन पूर्व की सामाजिक व्यवस्था है जहाँ मान-सम्मान सब कुछ था। अय्यूब कभी नगर-द्वार पर बैठने वाला प्रतिष्ठित व्यक्ति था; अब वह राख पर बैठा है, बच्चे मरे, देह गल रही है, और सार्वजनिक रूप से परमेश्वर से बहस कर रहा है। सोपर के लिए यह केवल एक मित्र का विलाप नहीं, सार्वजनिक ईश्वर-निंदा है, जिसका सार्वजनिक खंडन ज़रूरी है। इसलिए वह कहावतों में बोलता है, क्योंकि कहावत भीड़ की भाषा है, और भीड़ के सामने सही ठहरना उसका लक्ष्य है।
एक बारीकी
इब्रानी में जंगली गधे के लिए शब्द है पेरे, रेगिस्तान का वह प्राणी जिसे कोई पालतू नहीं बना सका। वह सुंदर है, तेज़ है, और उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसका कोई मालिक नहीं। सोपर इस शब्द को चुनता है क्योंकि इसमें दो चोटें हैं: पहली, मूर्खता; दूसरी, और गहरी, अनियंत्रितता। वह अय्यूब से कह रहा है कि तुम्हारी समस्या केवल गलत सोच नहीं, तुम्हारी नकेल किसी के हाथ में नहीं है। और विडंबना यह कि अय्यूब की सारी पीड़ा का स्रोत ठीक उलटा है: वह अपने जीवन पर अपना नियंत्रण पूरी तरह खो चुका है। जिस आदमी के हाथ से सब छिन गया, उसे "बेलगाम" कहना केवल क्रूर नहीं, अंधा भी है। सोपर देख ही नहीं पा रहा कि उसके सामने कौन बैठा है।
मुख्य पात्र
सोपर को समझने की कुंजी उसका डर है, उसका ज्ञान नहीं। वह जो कहता है, उसमें अधिकतर सही है: परमेश्वर अगम्य हैं, मनुष्य को बुद्धि सीखनी पड़ती है, पाप छिपाया नहीं जा सकता। लेकिन उसका धर्मशास्त्र एक कवच है, खिड़की नहीं। यदि संसार में एक भी निर्दोष व्यक्ति इस तरह टूट सकता है, तो सोपर की सारी व्यवस्था ढह जाती है, और उसके साथ उसकी अपनी सुरक्षा भी। इसलिए वह अय्यूब को दोषी सिद्ध करने पर इतना उतारू है; वह अय्यूब को नहीं, अपनी नींद बचा रहा है। यह हर धार्मिक व्यक्ति का खतरा है: जब सत्य हमें परमेश्वर के पास ले जाने के बजाय हमें दूसरों से ऊपर बैठाने लगे, तो हमने सत्य को औज़ार बना लिया है। सोपर सबसे शुद्ध सिद्धांत के साथ सबसे निर्दयी वाक्य बोलता है।
शास्त्र की गूँज
पुस्तक के अंत में परमेश्वर खुद इन भाषणों पर फैसला सुनाते हैं, और वह फैसला चौंकाने वाला है: एलीफज और उसके साथियों से वे कहते हैं कि उन्होंने अय्यूब की तरह ठीक बात नहीं कही, और अय्यूब को ही उनके लिए प्रार्थना करनी पड़ती है (अध्याय 42)। जिसे सोपर ने जंगली गधे का बछेड़ा कहा, वही मध्यस्थ बनता है। यह वही उलटाव है जिसे पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हुए खोलता है: परमेश्वर ने संसार के मूर्खों को चुना कि बुद्धिमान लज्जित हों। दोनों जगह एक ही सिद्धांत है, परमेश्वर उन्हें नहीं सराहते जो उनके बारे में सबसे ऊँचे वाक्य बोल सकते हैं, बल्कि उन्हें जो उनके सामने ईमानदार रहते हैं, चाहे लड़खड़ाते हुए।
पहले सुनने वाले
पहले पाठक इस कहावत पर सिर हिलाकर सहमत होते। बुद्धि-परंपरा में पले-बढ़े इस्राएली जानते थे कि मूर्ख को ठोक-पीटकर सुधारना पड़ता है, और यह भी मानते थे कि दुःख पाप का हिसाब है। सोपर उनकी ही भाषा बोल रहा है, उनकी ही पाठशाला का अच्छा विद्यार्थी है। यही इस पुस्तक की रणनीति है: पहले वह पाठक को मित्रों के साथ खड़ा कर देती है, और फिर अध्याय 42 में उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच लेती है। जो लोग निर्वासन, हार और अकारण विनाश से गुज़रे थे, उनके लिए यह मुक्तिदायक था: तुम्हारा दुःख किसी गुप्त पाप का चालान नहीं, और तुम्हें अपने दुःख के भीतर से परमेश्वर से बोलने की अनुमति है।
कठिन प्रश्न
पर सोपर की बात गलत कहाँ है? मनुष्य को सचमुच बुद्धि सीखनी पड़ती है; हम सचमुच अनगढ़ पैदा होते हैं; और कभी-कभी दुःख हमारी आँखें खोलता भी है। तो सही सिद्धांत कब हथियार बन जाता है? पाठ हमें कोई सुविधाजनक नियम नहीं देता। यहाँ कोई ऐसा वाक्य नहीं जिसे हम टाँग लें कि "इस स्थिति में यह कहो, उसमें वह"। जो मिलता है वह एक चेतावनी है: तीनों मित्रों की सारी शुद्ध बातें परमेश्वर की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं, क्योंकि वे बातें एक जीते-जागते, लहूलुहान आदमी पर लागू की गईं जिसकी हालत वे जानते ही नहीं थे। इसका अर्थ है कि सही धर्मशिक्षा का प्रयोग हमेशा जोखिम भरा रहेगा, और हमें इस जोखिम के साथ जीना सीखना होगा, किसी सुरक्षित सूत्र के भरोसे नहीं, बल्कि बहुत धीमी जीभ और बहुत खुले कान के साथ।
चिंतन
पिछले महीने आपने किसी दुःखी व्यक्ति से जो कहा, उसमें कितना हिस्सा उसके लिए था और कितना अपने संसार को समझाने के लिए?
यदि परमेश्वर जंगली गधे को अपनी कारीगरी कहते हैं, तो आपके भीतर की वह "बेलगाम" चीज़ शायद वह नहीं है जो आप समझते हैं; उसे नाम दें और उसके बारे में परमेश्वर से बात करें।
आपकी सबसे मज़बूत धार्मिक मान्यता कौन सी है, और वह किसे चोट पहुँचाने के लिए सबसे आसानी से इस्तेमाल हो सकती है?
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Job 11:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Job 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आप निकम्मे मनुष्यों को जान लेते हैं, और अनर्थ काम को देखते ही उस पर ध्यान देते हैं। कोई बुराई आपकी आँखों से छिपी नहीं रहती। यह जानकर मन को चैन मिलता है कि न्याय आपके हाथ में है, और मुझे किसी से बदला लेने की ज़रूरत नहीं।
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