बाइबल व्याख्या

अय्यूब 36

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ का सार

"वह उनके कान शिक्षा सुनने के लिये खोलता है" (पद 10) और फिर, कुछ पदों बाद, "उपद्रव में उनका कान खोलता है" (पद 15)। यही एलीहू के इस पूरे भाषण की धड़कन है। वह अय्यूब से कहता है: ठहरो, मुझे परमेश्वर के पक्ष में कुछ और कहना है। परमेश्वर सामर्थी हैं, किसी को तुच्छ नहीं जानते, दीनों को उनका हक़ देते हैं; और जब धर्मी लोग भी बेड़ियों में जकड़े जाते हैं, तब वह दुख उनके कान खोलने का साधन बनता है। इसके बाद एलीहू अय्यूब को चेतावनी देता है कि वह कड़वाहट में बहककर गलत रास्ता न चुने, और अंत में बादल, मेंह, बिजली और गरजन के चित्र खींचते हुए कहता है कि परमेश्वर हमारे ज्ञान से कहीं परे हैं।

मर्म

एलीहू एक ऐसा प्रश्न पूछता है जो पूरे अय्यूब की पुस्तक में गूँजता रहता है: "उसके समान शिक्षक कौन है?" (पद 22)। यानी दुख केवल सज़ा नहीं, कक्षा भी हो सकता है। यह विचार सुंदर है और खतरनाक भी। सुंदर, क्योंकि यह मानता है कि परमेश्वर हमारे कष्ट में निष्क्रिय दर्शक नहीं हैं। खतरनाक, क्योंकि इसे हथियार बनाकर किसी टूटे हुए इंसान पर चलाया जा सकता है, और एलीहू ठीक यही करने के कगार पर है। ध्यान दें कि वह स्वयं इस विचार को खुला छोड़ देता है: "परमेश्वर महान और हमारे ज्ञान से कहीं परे है" (पद 26)। जो शिक्षक हमारे ज्ञान से परे है, उसके पाठ का पूरा अर्थ हम कक्षा के भीतर बैठे-बैठे नहीं पकड़ सकते। यही विनम्रता इस अध्याय का सबसे सच्चा हिस्सा है।

मुख्य सूत्र

अय्यूब की पुस्तक में मनुष्य के सारे स्पष्टीकरण एक-एक कर टूटते हैं, और फिर परमेश्वर स्वयं आँधी में से बोलते हैं। एलीहू के अंतिम पद इस आने वाली आँधी की ओर इशारा करते हैं: "पशु भी प्रगट करते हैं कि अंधड़ चढ़ा आता है" (पद 33)। परमेश्वर उत्तर देते हैं, परंतु व्याख्या नहीं देते; वे स्वयं को देते हैं। यही सुसमाचार का आकार है। एक निर्दोष व्यक्ति जब दुख में बेड़ियों से बाँधा गया, तो वह पाठ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए बाँधा गया। यीशु मसीह के विषय में नया नियम कहता है कि उन्होंने दुख उठाकर आज्ञा मानना सीखा; वहाँ दुख किसी गर्व को तोड़ने के लिए नहीं था, क्योंकि गर्व वहाँ था ही नहीं। एलीहू का सिद्धांत आधा सच है; क्रूस उस आधे सच को पूरा करता है।

दर्पण

आपने वह वाक्य कहीं सुना होगा, शायद अस्पताल के गलियारे में: "परमेश्वर आपको कुछ सिखाना चाहते हैं।" कभी-कभी यह सच होता है। लेकिन जब यह किसी दूसरे के दुख पर हमारी असहजता को ढकने का पर्दा बन जाए, तो यह एलीहू की गलती है। और दूसरी ओर, पद 18 का चेतावनी भरा स्वर हमारे लिए भी है: "तू जलजलाहट से भर के ठट्ठा मत कर।" नौकरी छूटने पर, बीमारी के लंबे खिंचते महीनों में, किसी रिश्ते के टूटने पर, कड़वाहट एक आरामदेह घर बन जाती है। हम उसमें रहने लगते हैं और उसे ईमानदारी कहकर बचाव करते हैं। एलीहू कहता है: सावधान, दुख से बड़ा खतरा वह चुनाव है जो हम दुख में करते हैं।

आज दिन ढलने से पहले एक कागज़ पर एक वाक्य लिखिए: "इस दुख में मैंने अब तक जो सुना है, वह यह है", और फिर उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़िए।

शास्त्र की गूँज

यशायाह 50 में परमेश्वर का सेवक कहता है कि प्रभु उसका कान प्रतिदिन खोलते हैं, और वही सेवक मारा-पीटा और अपमानित होता है। वहाँ खुला कान सुधार का चिह्न नहीं, आज्ञाकारिता का चिह्न है। यह एलीहू के शब्दों को गहरा करता है और सुधारता भी है: हर खुला कान किसी छिपे पाप का सबूत नहीं होता। दूसरी ओर, अय्यूब 38 में परमेश्वर स्वयं बादलों, मेंह और बिजली की बात उठाते हैं, ठीक उन्हीं चित्रों से जिनसे एलीहू ने अपना भाषण समाप्त किया। अंतर यह है कि एलीहू इन चित्रों से अय्यूब को समझाना चाहता है, और परमेश्वर उन्हीं चित्रों से अय्यूब को चुप करा देते हैं। वही सत्य, दो अलग आवाज़ों में, और आवाज़ से फर्क पड़ता है।

पृष्ठभूमि

एलीहू चौथा वक्ता है, और सबसे युवा। प्राचीन पूर्व में उम्र ही अधिकार थी; इसीलिए वह पहले चुप रहा और तीन मित्रों के चुक जाने के बाद ही बोला। अध्याय 32 से 37 तक उसका लंबा भाषण चलता है, बिना किसी रुकावट, क्योंकि अय्यूब अब उत्तर ही नहीं देता। यह दृश्य कल्पना कीजिए: राख पर बैठा एक टूटा हुआ आदमी, चारों ओर मित्र जिनके तर्क खत्म हो चुके हैं, और एक जोशीला युवक जो परमेश्वर के वकील की भूमिका ले लेता है। कहानी के अंत में परमेश्वर तीनों मित्रों को डाँटते हैं, परंतु एलीहू का नाम नहीं लेते। उसे न शाबाशी मिलती है, न ठपका। यह मौन अपने आप में पढ़ने लायक है।

केंद्रीय पात्र

एलीहू का अंतर्मन इस अध्याय के आरंभ में ही खुल जाता है: "मैं अपने सृजनहार को धर्मी ठहराऊँगा" और "निश्चय मेरी बातें झूठी न होंगी" (पद 3-4)। यह आत्मविश्वास सुनने में खटकता है, और खटकना चाहिए। कौन परमेश्वर को धर्मी ठहराने का ठेका लेता है? परंतु एलीहू निर्दयी नहीं है। पद 16 में उसकी आवाज़ नरम पड़ जाती है: वह अय्यूब के लिए एक "चौड़े स्थान" की, मेज़ पर परोसे भोजन की कल्पना करता है। यहाँ एक युवक है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है और अपने मित्र के लिए भलाई चाहता है, लेकिन जिसने अभी यह नहीं सीखा कि परमेश्वर को अपनी रक्षा के लिए हमारी ज़रूरत नहीं है। वह सही चित्र बनाता है और गलत समय पर दिखाता है। हममें से कौन नहीं?

चिंतन के प्रश्न

पद 26 कहता है कि परमेश्वर हमारे ज्ञान से कहीं परे हैं। मेरे जीवन का कौन सा हिस्सा है जिसे मैं समझाने पर अड़ा हूँ, जबकि परमेश्वर ने अभी उसे खुला छोड़ा है?

अगर परमेश्वर ने दुख में मेरा कान खोला है, तो मैंने वास्तव में क्या सुना है, और मैंने किसे सुनने से इनकार किया है?

Job में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Job: The Wisdom of the Cross

Christopher Ash

The most pastoral full length walk through suffering and the God who answers.

The Message of Job

David Atkinson

A compact companion for the hardest questions Job raises.

Job: An Introduction and Commentary

Francis Andersen

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Job

John Walton

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Job 36 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 36 का क्या अर्थ है?
"वह उनके कान शिक्षा सुनने के लिये खोलता है" (पद 10) और फिर, कुछ पदों बाद, "उपद्रव में उनका कान खोलता है" (पद 15)। यही एलीहू के इस पूरे भाषण की धड़कन है। वह अय्यूब से कहता है: ठहरो, मुझे परमेश्वर के पक्ष में कुछ और कहना है। परमेश्वर सामर्थी हैं, किसी को तुच्छ नहीं जानते, दीनों को उनका हक़ देते हैं; और जब धर्मी लोग भी बेड़ियों में जकड़े जाते हैं, तब वह दुख उनके कान खोलने का साधन बनता है। इसके बाद एलीहू अय्यूब को चेतावनी देता है कि वह कड़वाहट में बहककर गलत रास्ता न चुने, और अंत में बादल, मेंह, बिजली और गरजन के चित्र खींचते हुए कहता है कि परमेश्वर हमारे ज्ञान से कहीं परे हैं।
अय्यूब 36 किस विषय में है?
अय्यूब की पुस्तक में मनुष्य के सारे स्पष्टीकरण एक-एक कर टूटते हैं, और फिर परमेश्वर स्वयं आँधी में से बोलते हैं। एलीहू के अंतिम पद इस आने वाली आँधी की ओर इशारा करते हैं: "पशु भी प्रगट करते हैं कि अंधड़ चढ़ा आता है" (पद 33)। परमेश्वर उत्तर देते हैं, परंतु व्याख्या नहीं देते; वे स्वयं को देते हैं। यही सुसमाचार का आकार है। एक निर्दोष व्यक्ति जब दुख में बेड़ियों से बाँधा गया, तो वह पाठ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए बाँधा गया। यीशु मसीह के विषय में नया नियम कहता है कि उन्होंने दुख उठाकर आज्ञा मानना सीखा; वहाँ दुख किसी गर्व को तोड़ने के लिए नहीं था, क्योंकि गर्व वहाँ था ही नहीं। एलीहू का सिद्धांत आधा सच है; क्रूस उस आधे सच को पूरा करता है।
अय्यूब 36 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दिन ढलने से पहले एक कागज़ पर एक वाक्य लिखिए: "इस दुख में मैंने अब तक जो सुना है, वह यह है", और फिर उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़िए।
अय्यूब 36 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एलीहू चौथा वक्ता है, और सबसे युवा। प्राचीन पूर्व में उम्र ही अधिकार थी; इसीलिए वह पहले चुप रहा और तीन मित्रों के चुक जाने के बाद ही बोला। अध्याय 32 से 37 तक उसका लंबा भाषण चलता है, बिना किसी रुकावट, क्योंकि अय्यूब अब उत्तर ही नहीं देता। यह दृश्य कल्पना कीजिए: राख पर बैठा एक टूटा हुआ आदमी, चारों ओर मित्र जिनके तर्क खत्म हो चुके हैं, और एक जोशीला युवक जो परमेश्वर के वकील की भूमिका ले लेता है। कहानी के अंत में परमेश्वर तीनों मित्रों को डाँटते हैं, परंतु एलीहू का नाम नहीं लेते। उसे न शाबाशी मिलती है, न ठपका। यह मौन अपने आप में पढ़ने लायक है।
अय्यूब 36 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पद 26 कहता है कि परमेश्वर हमारे ज्ञान से कहीं परे हैं। मेरे जीवन का कौन सा हिस्सा है जिसे मैं समझाने पर अड़ा हूँ, जबकि परमेश्वर ने अभी उसे खुला छोड़ा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Job 36 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, कभी कभी हम आपकी ओर से बोलने की जल्दी कर बैठते हैं, जबकि आपका मन पूरी तरह समझे भी नहीं। मुझे बोलने से पहले सुनना सिखा। जहाँ मेरे शब्द किसी के दुख को गहरा करें, वहाँ मुझे चुप रहने की नम्रता दे।

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