बाइबल व्याख्या

अय्यूब 27:1

बाइबल

पाठ

बहस थम गई है। मित्रों के पास अब कोई उत्तर नहीं बचा, तीसरा दौर अधूरा टूट जाता है, और तब कथावाचक एक छोटा सा वाक्य रखता है: "अय्यूब ने और भी अपनी गूढ़ बात उठाई और कहा।" यह पद कोई तर्क नहीं देता, यह केवल बताता है कि कौन बोल रहा है और किस ढंग से। अय्यूब चीखता नहीं, वह "उठाता" है, जैसे कोई भारी चीज़ कंधे पर उठाई जाती है। जो शब्द यहाँ "गूढ़ बात" कहा गया है, इब्रानी में वह माशाल है, वही शब्द जो नीतिवचनों के लिए इस्तेमाल होता है। यानी राख पर बैठा हुआ, खुजली से भरा, अपमानित आदमी अब ज्ञानी शिक्षक की मुद्रा में बोलने लगता है। पीड़ित व्यक्ति मंच पर चढ़ जाता है।

मूल बात

यहाँ धर्मशास्त्र का एक असुविधाजनक दावा छिपा है: सच बोलने का अधिकार उस से छिना नहीं जाता जिसका जीवन बिखर चुका है। अय्यूब के मित्रों के पास व्यवस्था थी, सुसंगत ईश्वरविज्ञान था, स्वस्थ शरीर था और घर लौटने की सुविधा थी। फिर भी परमेश्वर के विषय में सच्ची बात उस आदमी के मुँह से निकलती है जिसने सब खो दिया। और वह उसे "गूढ़ बात" के रूप में कहता है, यानी सोच-समझकर, गढ़े हुए वाक्यों में, गुस्से की उल्टी के रूप में नहीं। अगले ही पद में वह शपथ खाता है कि "मेरे मुँह से कोई कुटिल बात न निकलेगी।" यही मूल है: खराई केवल भावना नहीं, वह वाणी का अनुशासन है। दुख आपको झूठ बोलने की छूट नहीं देता, न धर्मी दिखने के लिए, न मित्रों को शांत करने के लिए, न परमेश्वर को खुश करने के लिए।

जोड़ने वाला धागा

अय्यूब का यह "उठाना" बाइबल में अकेला नहीं है। पूरे पवित्रशास्त्र में एक धारा बहती है जिसमें दुख झेलता हुआ धर्मी व्यक्ति चुप नहीं रहता, बल्कि परमेश्वर के सामने और लोगों के सामने सच कहता है, चाहे उसकी कीमत चुकानी पड़े। भजनकार यही करते हैं जब वे शिकायत को प्रार्थना में ढालते हैं। और यह धारा अंततः उस एक व्यक्ति तक पहुँचती है जो पीलातुस के सामने खड़ा होकर न झूठ बोलता है, न अपने बचाव के लिए तर्क गढ़ता है। यीशु मसीह भी दृष्टान्तों में, यानी माशाल में बोलते थे, और उन्होंने भी अपनी सबसे गहरी पीड़ा में मुँह से कोई कुटिल बात नहीं निकलने दी। अय्यूब एक छाया है, अधूरी और चिड़चिड़ी छाया, उस निर्दोष पीड़ित की जो सचमुच निर्दोष था। फर्क यह है कि अय्यूब को अपनी खराई पकड़नी पड़ती है; मसीह हमारी खराई बनते हैं।

दर्पण

यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे कुशल हो चुके हैं: सुविधा के लिए बात को थोड़ा मोड़ देना। दफ्तर में जब बॉस पूछता है कि प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है और आप "बस थोड़ा सा बाकी है" कह देते हैं। घर में जब कोई पूछता है "सब ठीक है?" और आप "हाँ" कह देते हैं क्योंकि सच बताने में चालीस मिनट लगेंगे। कलीसिया में जब लोग आपकी परीक्षा के बारे में पूछते हैं और आप एक धार्मिक-सा वाक्य बोल देते हैं जिस पर आप खुद विश्वास नहीं करते। अय्यूब यही करने से इनकार करता है। वह न मित्रों को सच्चा ठहराता है, न परमेश्वर के बारे में मीठा झूठ बोलता है। वह अपनी शिकायत भी सच रखता है और अपनी निर्दोषता भी।

आज दस मिनट लीजिए, कागज़ पर तीन वाक्य लिखिए जो आपकी वर्तमान पीड़ा या उलझन के बारे में बिल्कुल सच हों, न बढ़ाकर, न धार्मिक शब्दों से सजाकर, और फिर उन्हें परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़िए।

मुख्य पात्र

अय्यूब यहाँ एक अजीब मुद्रा में है। शरीर टूटा हुआ, प्रतिष्ठा नष्ट, मित्र शत्रु बन चुके, और वह ज्ञानी की तरह बोलने बैठता है। यह घमंड नहीं, यह जीवित रहने का तरीका है। जब सब कुछ छिन जाए तो आदमी के पास जो बचता है वह उसकी वाणी है, और अय्यूब उसे गंदा नहीं होने देगा। ध्यान दीजिए कि वह किस पर शपथ खाता है: उसी परमेश्वर के जीवन की, "जिसने मेरा न्याय बिगाड़ दिया"। यही अय्यूब की आत्मिक भूगोल है। वह परमेश्वर पर आरोप लगाता है और उसी परमेश्वर की सौगंध खाता है। नास्तिक बनना उसके लिए विकल्प ही नहीं। उसका क्रोध विश्वास के भीतर से उठता है, बाहर से नहीं, और इसीलिए वह पवित्र है।

अंतर्पाठ

भजन 73 में आसाप ठीक वही रास्ता चलते हैं जो अय्यूब यहाँ शुरू करता है: दुष्टों की समृद्धि देखकर पैर फिसलते हैं, शिकायत मुँह तक आती है, पर वे उसे मंदिर में ले जाते हैं और वहाँ दृष्टि बदलती है। अंतर यह है कि आसाप को उत्तर मिल जाता है, अय्यूब अभी अंधेरे में ही अपनी बात गढ़ रहा है। दूसरी ओर याकूब की पत्री अय्यूब के धीरज की याद दिलाती है, और यह चौंकाने वाला है, क्योंकि यहाँ अय्यूब शांत बिल्कुल नहीं है। तो बाइबल जिसे धीरज कहती है वह चुप्पी नहीं, बल्कि परमेश्वर को न छोड़ना है, तब भी जब आप उन्हीं पर मुकदमा चला रहे हों। यह हमारे धैर्य की परिभाषा को सुधार देता है।

कठिन प्रश्न

अगर परमेश्वर ने सचमुच अय्यूब का न्याय नहीं बिगाड़ा, तो क्या अय्यूब की यह शपथ झूठी नहीं है? वह जिस वाक्य में सच बोलने की कसम खाता है, उसी वाक्य में परमेश्वर पर अन्याय का आरोप लगाता है। कहानी के अंत में परमेश्वर मित्रों को डाँटते हैं और अय्यूब के बारे में कहते हैं कि उसने ठीक बात कही। यह असहज है। इसका मतलब शायद यह है कि परमेश्वर गलत जानकारी वाली ईमानदारी को सही जानकारी वाली चापलूसी से अधिक पसंद करते हैं। अय्यूब का धर्मविज्ञान अधूरा है, पर उसका मुँह साफ है। मैं इसे पूरी तरह सुलझा नहीं सकता, और शायद सुलझाना भी नहीं चाहिए। यह पुस्तक हमें एक ऐसे परमेश्वर के पास छोड़ती है जो हमारी गलत शिकायत को हमारे सही झूठ से ज़्यादा सह लेते हैं।

मनन के प्रश्न

पिछले सप्ताह आपने किस बातचीत में सच को थोड़ा मोड़ा, और किस डर ने वह मोड़ बनवाया?

अगर आपको अपनी पीड़ा को गुस्से की उल्टी नहीं, बल्कि सोची-समझी "गूढ़ बात" के रूप में कहना पड़े, तो पहला वाक्य क्या होगा?

Job में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Job: The Wisdom of the Cross

Christopher Ash

The most pastoral full length walk through suffering and the God who answers.

The Message of Job

David Atkinson

A compact companion for the hardest questions Job raises.

Job: An Introduction and Commentary

Francis Andersen

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Job

John Walton

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Job 27:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 27:1 का क्या अर्थ है?
बहस थम गई है। मित्रों के पास अब कोई उत्तर नहीं बचा, तीसरा दौर अधूरा टूट जाता है, और तब कथावाचक एक छोटा सा वाक्य रखता है: "अय्यूब ने और भी अपनी गूढ़ बात उठाई और कहा।" यह पद कोई तर्क नहीं देता, यह केवल बताता है कि कौन बोल रहा है और किस ढंग से। अय्यूब चीखता नहीं, वह "उठाता" है, जैसे कोई भारी चीज़ कंधे पर उठाई जाती है। जो शब्द यहाँ "गूढ़ बात" कहा गया है, इब्रानी में वह माशाल है, वही शब्द जो नीतिवचनों के लिए इस्तेमाल होता है। यानी राख पर बैठा हुआ, खुजली से भरा, अपमानित आदमी अब ज्ञानी शिक्षक की मुद्रा में बोलने लगता है। पीड़ित व्यक्ति मंच पर चढ़ जाता है।
अय्यूब 27:1 किस विषय में है?
अय्यूब का यह "उठाना" बाइबल में अकेला नहीं है। पूरे पवित्रशास्त्र में एक धारा बहती है जिसमें दुख झेलता हुआ धर्मी व्यक्ति चुप नहीं रहता, बल्कि परमेश्वर के सामने और लोगों के सामने सच कहता है, चाहे उसकी कीमत चुकानी पड़े। भजनकार यही करते हैं जब वे शिकायत को प्रार्थना में ढालते हैं। और यह धारा अंततः उस एक व्यक्ति तक पहुँचती है जो पीलातुस के सामने खड़ा होकर न झूठ बोलता है, न अपने बचाव के लिए तर्क गढ़ता है। यीशु मसीह भी दृष्टान्तों में, यानी माशाल में बोलते थे, और उन्होंने भी अपनी सबसे गहरी पीड़ा में मुँह से कोई कुटिल बात नहीं निकलने दी। अय्यूब एक छाया है, अधूरी और चिड़चिड़ी छाया, उस निर्दोष पीड़ित की जो सचमुच निर्दोष था। फर्क यह है कि अय्यूब को अपनी खराई पकड़नी पड़ती है; मसीह हमारी खराई बनते हैं।
अय्यूब 27:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दस मिनट लीजिए, कागज़ पर तीन वाक्य लिखिए जो आपकी वर्तमान पीड़ा या उलझन के बारे में बिल्कुल सच हों, न बढ़ाकर, न धार्मिक शब्दों से सजाकर, और फिर उन्हें परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़िए।
अय्यूब 27:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन 73 में आसाप ठीक वही रास्ता चलते हैं जो अय्यूब यहाँ शुरू करता है: दुष्टों की समृद्धि देखकर पैर फिसलते हैं, शिकायत मुँह तक आती है, पर वे उसे मंदिर में ले जाते हैं और वहाँ दृष्टि बदलती है। अंतर यह है कि आसाप को उत्तर मिल जाता है, अय्यूब अभी अंधेरे में ही अपनी बात गढ़ रहा है। दूसरी ओर याकूब की पत्री अय्यूब के धीरज की याद दिलाती है, और यह चौंकाने वाला है, क्योंकि यहाँ अय्यूब शांत बिल्कुल नहीं है। तो बाइबल जिसे धीरज कहती है वह चुप्पी नहीं, बल्कि परमेश्वर को न छोड़ना है, तब भी जब आप उन्हीं पर मुकदमा चला रहे हों। यह हमारे धैर्य की परिभाषा को सुधार देता है।
अय्यूब 27:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले सप्ताह आपने किस बातचीत में सच को थोड़ा मोड़ा, और किस डर ने वह मोड़ बनवाया?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Job 27 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 11

पिता, मैं तेरे हाथ के काम को समझना चाहता हूँ, और जो तू सिखाता है उसे छिपाना नहीं चाहता। जहाँ मेरी समझ छोटी पड़ती है, वहाँ मुझे भरोसा रखना सिखा। मेरे मन को सच्चा रख, ताकि जो मैं तेरे बारे में कहूँ वह खरा हो।

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