अय्यूब 13
दृश्य
अय्यूब की देह घावों से भरी है, राख पर बैठा है, और तीन मित्र उसके सामने बैठकर परमेश्वर की वकालत कर रहे हैं, मानो वे परमेश्वर के अदालती वकील हों। अय्यूब उनकी बातें सुनते-सुनते थक चुका है। अब वह उठकर उनकी ओर मुड़ता है, और उसकी आवाज़ में एक नई धार आ जाती है: "जो कुछ तुम जानते हो वह मैं भी जानता हूँ; मैं तुम लोगों से कुछ कम नहीं हूँ।" यह पीड़ा में डूबे आदमी की झुँझलाहट नहीं, यह एक ऐसे व्यक्ति की घोषणा है जो अब मित्रों से बात करना बंद करके सीधे परमेश्वर से मुक़दमा लड़ने जा रहा है।
पाठ
अय्यूब अपने मित्रों को "झूठी बात के गढ़नेवाले" और "निकम्मे वैद्य" कहता है, और उनसे कहता है कि यदि वे चुप रहते तो बुद्धिमान ठहरते। फिर वह परमेश्वर की ओर मुड़ता है, दो शर्तें रखता है, और अपनी निर्दोषता का पक्ष लेने की तैयारी करता है, यह जानते हुए भी कि "वह मुझे घात करेगा।"
मर्म
यह अध्याय दो साहसों को एक साथ पकड़ता है, जो आमतौर पर अलग-अलग रहते हैं। एक ओर अय्यूब मित्रों की धर्मशास्त्रीय शुद्धता को अस्वीकार करता है, जो परमेश्वर के "पक्ष में कपट से" बोलती है। दूसरी ओर वह परमेश्वर से मुँह नहीं फेरता, बल्कि उसी की ओर मुड़ता है। यहाँ जो सामने आता है वह यह है: सच्ची भक्ति कभी-कभी परमेश्वर के बारे में सही बातें दोहराने से नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने अपना असली दुःख रखने से प्रकट होती है। पद 15 का वाक्य, "वह मुझे घात करेगा, मुझे कुछ आशा नहीं; तो भी मैं अपनी चाल-चलन का पक्ष लूँगा," विश्वास और विरोध का एक ऐसा गठजोड़ है जिसे केवल गहरे दुःख में ही कोई कह सकता है।
सूत्र
अय्यूब की पुकार, "कौन है जो मुझसे मुकद्दमा लड़ सकेगा?", मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक मध्यस्थ की तड़प है, जिसे वह पहले भी (अध्याय 9) व्यक्त कर चुका है। वह चाहता है कि परमेश्वर अपनी "ताड़ना" और "भय" एक पल के लिए हटा ले ताकि बातचीत हो सके। यह वही खाई है जिसे मसीह पाटते हैं। क्रूस पर वह पुकार, "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?", अय्यूब की भाषा से बहुत दूर नहीं है। मसीह में परमेश्वर स्वयं उस स्थान पर उतर आते हैं जहाँ अय्यूब खड़ा था, ताकि निर्दोष का पक्ष लेने वाला और उत्तर देने वाला एक ही व्यक्ति हो।
दर्पण
अय्यूब के मित्र हमारे भीतर भी बैठे हैं। जब कोई मित्र कैंसर से जूझ रहा हो, जब किसी की नौकरी अचानक चली जाए, जब बच्चा विश्वास से भटक जाए, तब हम कितनी जल्दी "परमेश्वर के निमित्त टेढ़ी बातें" कहने लगते हैं। "सब कुछ किसी कारण से होता है," "परमेश्वर की कोई योजना होगी," ऐसे वाक्य अक्सर पीड़ित के लिए नहीं, हमारी अपनी बेचैनी के लिए बोले जाते हैं। अय्यूब कहता है कि ऐसी सांत्वना "राख के समान" है। और स्वयं दुःख में हों तो? यह अध्याय अनुमति देता है कि आप परमेश्वर से नाराज़गी में बात करें, बशर्ते आप उसी से बात करें। शिकायत को प्रार्थना बनने दें, चुप्पी न बनने दें।
प्रश्न
पद 15 का वाक्य पढ़कर एक असहज प्रश्न उठता है: क्या यह विश्वास है या हठ? अय्यूब कहता है कि परमेश्वर उसे मार डालेगा, फिर भी वह अपना पक्ष लेगा। यह उस भक्ति से बहुत अलग है जो कहती है, "जो भी हो, मैं मान लूँगा।" अय्यूब मानने से इनकार करता है कि उसके साथ जो हो रहा है वह न्याय है। और फिर भी परमेश्वर बाद में (अध्याय 42) कहते हैं कि अय्यूब ने उनके विषय में "ठीक बात" कही, मित्रों ने नहीं। यह एक कठिन सच्चाई है: परमेश्वर उस विश्वास को अधिक सम्मान देते हैं जो उनसे लड़ता है, उस पवित्रता की तुलना में जो उनके बारे में सुरक्षित बातें बोलती है। इसे सुलझाने की कोशिश मत कीजिए; इसके साथ बैठिए।
अंतर्पाठ
भजन 88 अय्यूब के इस स्वर का सबसे करीबी साथी है, एक ऐसी प्रार्थना जो अंधकार में समाप्त होती है और फिर भी परमेश्वर को संबोधित है। दूसरी ओर, यिर्मयाह 20 में भविष्यद्वक्ता कहता है, "हे यहोवा, तूने मुझे धोखा दिया," वही आत्मीय शिकायत। ये पाठ हमें बताते हैं कि बाइबल में परमेश्वर के सामने ईमानदार क्रोध की एक लंबी परंपरा है। तुलना कीजिए इसकी उन मित्रों की "बुद्धिमानी" से, जो सुरक्षित सिद्धांतों में छिपती है। शास्त्र स्वयं गवाही देता है कि परमेश्वर को दूर से किया गया आदर उतना प्रिय नहीं जितनी पास आकर की गई पुकार।
परिप्रेक्ष्य
अय्यूब की पुस्तक के मूल श्रोता एक ऐसी दुनिया में जीते थे जहाँ हर विपत्ति को पाप का दंड समझा जाता था। यह समीकरण सरल था और सामाजिक व्यवस्था को टिकाए रखता था: धर्मी को समृद्धि, पापी को दुःख। इस पृष्ठभूमि में अय्यूब का यह कहना कि "मुझे निश्चय है कि मैं निर्दोष ठहरूँगा," लगभग विद्रोह जैसा लगता होगा। मित्रों की भाषा वही थी जो पूरा समाज बोल
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Job 13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 13 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 13 किस विषय में है?
अय्यूब 13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 13 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
At his lowest point Job says: though He slay me, yet will I hope in Him. That is not optimism. That is faith that has passed through the darkness. I always thought faith was something that makes things lighter, but with Job it is something that holds you when everything goes dark.
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
