अय्यूब 3
पाठ
सात दिन और सात रात की चुप्पी के बाद अय्यूब का मुँह खुलता है, और जो निकलता है वह प्रार्थना नहीं, शाप है: "वह दिन नाश हो जाए जिसमें मैं उत्पन्न हुआ।" वह अपने जन्मदिन को, और उस रात को जिसमें गर्भ ठहरा, अंधकार के हवाले कर देना चाहता है, मानो उसे सृष्टि के कैलेंडर से मिटाया जा सके। फिर वह तीन बार "क्यों" पूछता है: गर्भ में ही क्यों न मरा, घुटनों पर क्यों लिया गया, और दुःखियों को उजियाला क्यों दिया जाता है। कब्र उसे राजाओं और दासों की साझी शरण लगती है, जहाँ "दास अपने स्वामी से स्वतंत्र रहता है।" अध्याय वहीं समाप्त होता है जहाँ से शुरू हुआ था, बिना किसी उत्तर के: "मुझे न तो चैन, न शान्ति, न विश्राम मिलता है।"
मूल
प्राचीन पूर्व के संसार में शब्दों में शक्ति मानी जाती थी; शाप कोई भावनात्मक उबाल नहीं, एक कार्रवाई थी। इसलिए अय्यूब जो कर रहा है वह सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर देता है: वह उत्पत्ति की भाषा को उलट रहा है। जहाँ परमेश्वर ने कहा था कि उजियाला हो, वहाँ अय्यूब कहता है, "वह दिन अंधियारा हो जाए! ऊपर से परमेश्वर उसकी सुधि न ले।" वह लिव्यातान को जगाने वालों को बुलाता है, उस समुद्री दानव को जिसे लोग अव्यवस्था का प्रतीक मानते थे। यहाँ धर्मशास्त्र का असली भूकंप है: एक निर्दोष व्यक्ति सृष्टि की भलाई पर ही प्रश्न खड़ा करता है, और परमेश्वर उसे चुप नहीं कराते। बाइबल में विश्वास का अर्थ दर्द को सभ्य भाषा में ढालना नहीं; यहाँ वह कच्चा, बेअदब, और फिर भी परमेश्वर की दिशा में बोला गया है।
सूत्र
बाइबल में अय्यूब अकेला नहीं जो अपने जन्मदिन को धिक्कारता है। यिर्मयाह भी, जब उसे ठोक में डाला जाता है, लगभग वही शब्द दोहराता है, और यह संयोग नहीं: परमेश्वर के सबसे वफादार सेवक ही अक्सर सबसे गहरे अंधेरे में उतरते हैं। यह सूत्र आगे बढ़ता है। गतसमनी में एक और निर्दोष व्यक्ति मिट्टी पर गिरकर कहता है कि उसका प्राण मृत्यु तक शोकित है, और क्रूस पर वह उस अंधकार के भीतर से पुकारता है जो दोपहर को रात बना देता है। अय्यूब अंधकार माँगता है और उसे पाता है; मसीह अंधकार माँगते नहीं, फिर भी उसे अपने ऊपर ले लेते हैं। इसलिए अय्यूब 3 मसीह की ओर संकेत करता है, रूपक से नहीं, बल्कि इस सच्चाई से कि परमेश्वर ने दुःख को दूर से नहीं देखा; वे स्वयं उसमें उतरे, और उसी "क्यों" को अपने होंठों पर लिया।
दर्पण
अय्यूब का सबसे चुभने वाला वाक्य धर्मशास्त्रीय नहीं, निजी है: "जिस डरावनी बात से मैं डरता हूँ, वही मुझ पर आ पड़ती है।" हममें से अधिकांश के भीतर एक ऐसा डर रहता है जिसे हम नाम नहीं देते। बच्चे की रिपोर्ट, पति या पत्नी की चुप्पी जो महीनों से लंबी होती जा रही है, वह गाँठ जिसकी जाँच हम टालते जा रहे हैं, नौकरी की वह बैठक जो अगले हफ्ते है। हम सोचते हैं कि चुप रहने से डर छोटा रहेगा। अय्यूब दिखाता है कि यह काम नहीं करता, और यह भी कि डर को खुलकर कहना अविश्वास नहीं। ध्यान दीजिए: वह रोटी नहीं खा पाता, "लम्बी-लम्बी साँसें" आती हैं। दुःख पहले शरीर में बसता है, फिर शब्दों में आता है। आज, दस मिनट में: कागज़ पर वह एक डर लिखिए जिसे आपने अब तक किसी से नहीं कहा, और उसे ज़ोर से, अपने ही शब्दों में, परमेश्वर के सामने पढ़ दीजिए।
प्रश्न
पहले दो अध्याय पढ़ने वाले हम जानते हैं कि स्वर्ग में क्या हुआ था। अय्यूब नहीं जानता, और पूरी पुस्तक में कभी नहीं जानेगा। परमेश्वर जब अंत में बोलते हैं, तब भी वे कारण नहीं बताते। यह असहज सच्चाई टालनी नहीं चाहिए: परमेश्वर ने अय्यूब को उत्तर देने से रोका, जबकि एक वाक्य उसकी रातों को बदल सकता था। क्यों? पुस्तक इसका जवाब नहीं देती। शायद इसलिए कि जो विश्वास कारण जानकर टिकता है, वह विश्वास नहीं, हिसाब है। पर यह तर्क भी अय्यूब के छालों पर मरहम नहीं लगाता। हमें यहाँ दो चीज़ें साथ पकड़नी होंगी: परमेश्वर उसकी पीड़ा से अनजान नहीं थे, और उन्होंने उसे अनजान रहने दिया। रहस्य स्वीकार करना हार नहीं; पर उसे मिठास में लपेटना बेईमानी है।
संदर्भ
दृश्य की कल्पना कीजिए: ऊज़ देश, शहर के बाहर वह जगह जहाँ राख और कूड़ा फेंका जाता है। कल तक अय्यूब फाटक पर बैठने वाला बड़ा आदमी था, जिसकी बात पर मुकदमे तय होते थे, जिसके पास भेड़-बकरियों के हजारों सिर और नौकरों की कतार थी। अब वह खपड़े से अपनी खुजली खुजाता है, शरीर से बदबू उठती है, मक्खियाँ हैं, और लोग दूर से निकलते हैं। उसके तीन मित्र आए, कपड़े फाड़े, सिर पर धूल डाली और सात दिन चुप बैठे रहे, क्योंकि उस संस्कृति में गहरे शोक में बोलना असभ्यता थी। इसी चुप्पी के बाद वह फटता है। जब वह राजाओं के "सुनसान स्थान" और चाँदी से भरे घरों का ज़िक्र करता है, तो सुनने वाले मिस्र के मकबरों की कल्पना करते थे: भव्य कब्रें, जो अंततः सबको एक ही धूल में मिला देती हैं।
पहले श्रोता
जिन्होंने यह पुस्तक पहली बार सुनी, वे उस दुनिया में जीते थे जहाँ यह मान लिया गया था कि भला आदमी फलता है और दुष्ट नष्ट होता है। अय्यूब का विलाप उनके लिए किसी दीवार में दरार जैसा था। और उसकी एक पंक्ति उन्हें सीधे छूती होगी: "दास अपने स्वामी से स्वतंत्र रहता है," और वहाँ "परिश्रम करानेवाले का शब्द" नहीं सुनाई देता। जिन लोगों ने बेगार की मार, ईंट की ढुलाई, निर्वासन के रास्ते देखे थे, उनके कानों में यह मज़दूर की भाषा थी, न कि दार्शनिक की। जिन माताओं ने शिशुओं को खोया था, वे वचन 16 पर ठिठक जातीं। और सबसे बड़ी राहत यह थी कि ऐसा बोलना परमेश्वर के वचनों में जगह पा गया। मंदिर की मर्यादित प्रार्थनाओं के बीच यह अध्याय एक खिड़की था, जिससे असली हवा आती थी।
चिंतन
आपके भीतर कौन-सा वाक्य है जिसे आप परमेश्वर से कहने में डरते हैं, और यह डर किस बात से आता है, उनके क्रोध से या अपनी शर्म से?
जब कोई आपके सामने अय्यूब जैसी भाषा बोले, तो क्या आप सात दिन चुप बैठ सकते हैं, या आपका हाथ तुरंत जवाब देने के लिए उठ जाता है?
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Job 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अय्यूब सात दिन चुप रहा, फिर जो निकला वह प्रार्थना नहीं, कराहना था: "मेरा कराहना मेरे भोजन से पहले आता है, और मेरी आहें जल के समान बहती हैं।" दुख इतना गहरा कि रोटी से पहले आँसू परोसे जाते हैं। ध्यान दे, परमेश्वर ने इन शब्दों को अपनी किताब से नहीं हटाया। तेरी आहें भी उसके सामने कहने लायक हैं।
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