न्यायियों 16:28
पाठ
अंधा, मुँड़ा हुआ, कैदखाने की चक्की से घसीटकर लाया गया शिमशोन दागोन के मंदिर के दो खम्भों के बीच खड़ा है, और तीन हजार लोग छत पर से उसका तमाशा देख रहे हैं। उसी घड़ी, जब उसके पास न आँखें हैं, न बाल, न सम्मान, वह पहली बार इस पूरे अध्याय में परमेश्वर की ओर मुड़ता है: "हे प्रभु यहोवा, मेरी सुधि ले; हे परमेश्वर, अब की बार मुझे बल दे, कि मैं पलिश्तियों से अपनी दोनों आँखों का एक ही बदला लूँ।" यह प्रार्थना तीन चीज़ों से बनी है: एक पुकार कि मुझे भूल न जाइए, एक माँग कि बल लौटा दीजिए, और एक कारण जो पूरी तरह निजी है, उसकी फोड़ी हुई आँखें।
मर्म
ध्यान दीजिए कि शिमशोन क्या नहीं कहता। वह इस्राएल के छुटकारे की बात नहीं करता, पाप स्वीकार नहीं करता, नाज़ीर व्रत तोड़ने का ज़िक्र तक नहीं करता। वह अपनी आँखों का बदला माँगता है। और फिर भी परमेश्वर सुनते हैं। यही इस पद का काँटा और इसकी सांत्वना दोनों है: परमेश्वर का उद्धार मनुष्य की शुद्ध प्रेरणाओं पर नहीं टिका। शिमशोन के बाल दुबारा उग आए (पद 22), पर असली बात यह नहीं थी; असली बात यह थी कि यहोवा जो पद 20 में "उसके पास से चला गया" था, लौट आते हैं। बल कभी शिमशोन की संपत्ति नहीं था, वह हमेशा उधार था। "मेरी सुधि ले" वाचा की भाषा है, वही पुकार जो दास इस्राएल मिस्र में करता था। टूटा हुआ आदमी उसी वाचा पर दाँव लगाता है, और परमेश्वर अपनी प्रतिष्ठा के कारण उत्तर देते हैं, शिमशोन की योग्यता के कारण नहीं।
सूत्र
यहाँ सावधानी ज़रूरी है, क्योंकि शिमशोन को सीधे मसीह की छाया कहना उसे वह बना देगा जो वह नहीं है। फिर भी रूपरेखा को अनदेखा करना मुश्किल है: एक आदमी जिसका जन्म माँ की कोख से पहले ही घोषित हुआ, जो अपने ही लोगों द्वारा शत्रुओं को सौंपा गया, जिसे बाँधा गया, अपमानित किया गया, तमाशे के लिए खड़ा किया गया, और जो दो लकड़ियों, पत्थर के दो खम्भों के बीच हाथ फैलाकर मरता है। और पद 30 कहता है कि मरते समय उसने जितनों को मारा, वे उससे अधिक थे जिन्हें उसने जीवन में मारा। मृत्यु में जीवन से बड़ी जीत, यही वह पैटर्न है जो पूरे शास्त्र में चलता है और क्रूस पर पूरा होता है। पर फर्क भी उतना ही तीखा है: शिमशोन की आखिरी प्रार्थना बदले की है, मसीह की आखिरी प्रार्थना क्षमा की। शिमशोन अपने शत्रुओं को कुचलकर मरता है, मसीह अपने शत्रुओं के बदले में मरता है।
दर्पण
शिमशोन की प्रार्थना इसलिए चुभती है क्योंकि हम उसकी भाषा पहचानते हैं। जब बॉस ने सबके सामने बेइज़्ज़त किया, जब भाई ने विरासत में धोखा दिया, जब शरीर ने साथ छोड़ दिया और डॉक्टर की रिपोर्ट ने सब योजनाएँ रद्द कर दीं, तब हमारी प्रार्थना भी साफ़-सुथरी नहीं होती। उसमें हिसाब होता है, गुस्सा होता है, "मेरी दोनों आँखों का बदला" होता है। और हममें से बहुत लोग ऐसी प्रार्थना करने से शर्माते हैं, इसलिए चुप रह जाते हैं और परमेश्वर से दूरी बढ़ा लेते हैं। यह पद कहता है: गंदी प्रार्थना भी प्रार्थना है, और मौन से बेहतर है। परमेश्वर आपके शुद्ध होने तक इंतज़ार नहीं करते; वे आपके मुड़ने का इंतज़ार करते हैं। आज: एक कागज़ पर वह एक घटना लिखिए जिसमें आप अपने आपको सबसे ज़्यादा अंधा और अपमानित महसूस करते हैं, और उसे हाथ में लेकर ज़ोर से कहिए, "हे प्रभु यहोवा, मेरी सुधि ले।"
अंतर्पाठ
इसी पाठ के अंत में इब्रानियों 11:32 का हवाला दिया गया है, और यह चौंकाने वाला है: विश्वास के नायकों की सूची में शिमशोन का नाम है। उसके जीवन का हिसाब नहीं, बल्कि वह आखिरी क्षण जब उसने अपना सब कुछ परमेश्वर के हाथ में सौंप दिया, विश्वास गिना गया। दूसरा गूँज लूका 23 में सुनाई देती है, जहाँ क्रूस पर टँगा अपराधी यीशु से ठीक यही माँगता है कि मुझे याद रखना, मेरी सुधि लेना। इब्रानी शब्द ज़ाख़ार, याद करना, कभी भूली हुई बात को फिर सोच लेना नहीं है; यह परमेश्वर का अपनी वाचा के अनुसार हस्तक्षेप करना है। दोनों जगह एक मरता हुआ, टूटा हुआ आदमी यही एक शब्द पकड़ता है, और दोनों जगह उत्तर मिलता है।
मुख्य पात्र
शिमशोन की त्रासदी यह नहीं कि वह कमज़ोर था, बल्कि यह कि वह इतना बलवान था कि उसे परमेश्वर की ज़रूरत महसूस ही नहीं हुई। पूरे अध्याय में वह अपने शरीर पर भरोसा करता है, "मैं पहले के समान बाहर जाकर झटकूँगा," और पाठ ठंडे शब्दों में जोड़ता है कि वह नहीं जानता था कि यहोवा उसके पास से चले गए हैं। यह आदमी सब कुछ हल्के में लेता है: व्रत, रहस्य, प्रेम, बुलाहट। और जब सब छिन जाता है, आँखें, बाल, आज़ादी, तब पहली बार उसके मुँह से प्रार्थना निकलती है। उसका आध्यात्मिक नक्शा कड़वाहट और अचानक जागी हुई निर्भरता का मिश्रण है। वह संत नहीं बनता; वह बस अंत में सही जगह पर हाथ बढ़ाता है।
संदर्भ
यह न्यायियों के युग का अंतिम और सबसे अँधेरा हिस्सा है, जब इस्राएल के पास न राजा था न स्थिर नेतृत्व, और पलिश्ती तट के पाँच शक्तिशाली नगरों से उन पर दबाव बनाए हुए थे। गाज़ा उन्हीं में से एक था, और दागोन का मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, राजनीतिक शक्ति का प्रतीक था। शिमशोन को वहाँ लाना धार्मिक प्रचार था: देखो, हमारे देवता ने इस्राएल के परमेश्वर को हरा दिया। अंधा करना युद्धबंदियों के साथ आम व्यवहार था, और चक्की पीसना स्त्रियों और दासों का काम था, यानी दोहरा अपमान। छत पर तीन हजार लोग, सरदार नीचे, और बीच में एक तमाशा बना हुआ न्यायी। इस दृश्य में इस्राएल का परमेश्वर हारा हुआ दिख रहा है। पद 28 के बाद वह धारणा मलबे में बदल जाती है।
चिंतन
आपकी कौन सी प्रार्थना आपने इसलिए रोक रखी है क्योंकि वह बहुत गंदी, बहुत गुस्सैल या बहुत स्वार्थी लगती है, और यह पद उस चुप्पी के बारे में क्या कहता है?
शिमशोन ने अपने शत्रुओं को कुचलकर जीत पाई, मसीह ने अपने शत्रुओं के लिए मरकर; आपके जीवन में इस समय कौन सी जीत आप शिमशोन के तरीके से चाह रहे हैं?
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Judges 16:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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न्यायियों 16:28 किस विषय में है?
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न्यायियों 16:28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Judges 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
तीसरी बार शिमशोन उसी गोद में सोया, और तीसरी बार चौंककर उठ खड़ा हुआ, खूँटी और ताना उखाड़ता हुआ। ताकत तो बची रही, पर सतर्कता नहीं। हर बार बच निकलना उसे यही समझाता रहा कि खतरा कुछ भी नहीं। कहीं तू भी इसलिए तो निश्चिंत नहीं कि अब तक कुछ बिगड़ा नहीं? जिस गोद में तू बार-बार लौटता है, वह एक दिन कैंची उठा लेगी।
पिता, धन्यवाद कि शिमशोन की कहानी हमें चेताती है। दलीला ने "अपने मन की सारी बात" सुनकर उसे चाँदी के लिये बेच दिया, पर आपका प्रेम कभी बिकाऊ नहीं। धन्यवाद कि आपके सामने हम अपना मन खोल सकते हैं और आप उसे कभी हमारे विरुद्ध इस्तेमाल नहीं करते। ऐसे सच्चे साथियों के लिये भी धन्यवाद जो हमें गिराते नहीं, थामते हैं।
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