मलाकी 4
पाठ
भट्ठा दहक रहा है, और उसमें झोंकी जा रही है सूखी खूँटी: अभिमानी और दुराचारी लोग, जड़ भी नहीं बचेगी, शाखा भी नहीं। उसी दिन, उसी आँच में, जो परमेश्वर के नाम का भय मानते हैं उनके लिये कुछ और उगता है, "धार्मिकता का सूर्य", और उसकी किरणों में चंगाई है; वे बाड़े से छूटे बछड़ों की तरह कूदते-फाँदते बाहर आते हैं। और फिर दो आदेश: मूसा की व्यवस्था को स्मरण रखो, और प्रतीक्षा करो, क्योंकि उस बड़े और भयानक दिन से पहले एलिय्याह आएगा, पिताओं और बेटों के मन एक-दूसरे की ओर फेरने।
मर्म
यह एक ही दिन है, दो अलग दिन नहीं। वही ताप जो खूँटी को राख कर देता है, बीमार शरीर को धूप की तरह गरमाहट देता है। मलाकी परमेश्वर के न्याय को दो हिस्सों में नहीं बाँटता, बल्कि कहता है कि उनका आना ही सब कुछ प्रकट कर देगा: कौन खूँटी था और कौन बछड़ा। और ध्यान दें, बचाव का आधार वंश नहीं है, मन्दिर की सदस्यता नहीं है, बलिदानों की गिनती नहीं है, बल्कि "जो मेरे नाम का भय मानते हो"। यही मलाकी की पूरी पुस्तक की चुभती हुई बात है: परमेश्वर लोगों को उनकी धार्मिकता से नहीं, उनके प्रति सच्चे आदर से पहचानते हैं। और उनकी धार्मिकता झुलसाती नहीं, चंगा करती है।
सूत्र
पुराने नियम की अंतिम आवाज़ एक वादे पर रुकती है, पूर्ति पर नहीं। एलिय्याह आएगा, पर कब? चार सौ साल चुप्पी रही। फिर यरदन के किनारे एक ऊँट के बाल पहनने वाला आदमी खड़ा होता है और मन फिराने की पुकार लगाता है, और यीशु अपने सुननेवालों से कहते हैं कि जो सुनना चाहे, सुन ले: यही आनेवाला एलिय्याह है (मत्ती 11:14). यीशु इस भविष्यवाणी को अपने ऊपर मोड़ते हैं, यानी वह "बड़ा और भयानक दिन" उनके आने से जुड़ा है। और वह "धार्मिकता का सूर्य" जिसकी किरणों में चंगाई है? गलील के गाँवों में वह चलता-फिरता दिखाई दिया, अंधों की आँखों पर और कोढ़ियों की त्वचा पर हाथ रखते हुए। मलाकी का सूर्य एक व्यक्ति निकला।
दर्पण
अंतिम वचन में परमेश्वर पृथ्वी के सत्यानाश का ज़िक्र करते हैं, और उसकी वजह चौंकाने वाली है: टूटे हुए घर। पिता और बेटे एक-दूसरे से मुँह फेरे हुए। सोचिए उस रिश्तेदार के बारे में जिससे आपने पाँच साल से ठीक से बात नहीं की; उस पिता के बारे में जिसकी कड़वाहट अब आदत बन गई है; उस बेटे के बारे में जो शहर चला गया और फोन नहीं उठाता। हम इसे निजी दुख मानते हैं। परमेश्वर इसे भूमि पर उतरने वाले श्राप के स्तर की बात मानते हैं। और मलाकी के लोग शिकायत कर रहे थे कि परमेश्वर की सेवा से कोई लाभ नहीं (3:14). कहीं आपकी थकी हुई आस्था भी उसी हिसाब-किताब पर तो नहीं टिकी है, कि इससे मुझे क्या मिला?
प्रसंग
यह निर्वासन के बाद का यरूशलेम है, ईसा पूर्व पाँचवीं सदी के आसपास। फारसी साम्राज्य का एक छोटा, गरीब प्रांत। मन्दिर फिर से खड़ा है, पर वह सुलैमान का वैभव नहीं; दीवारें हैं, पर स्वतंत्रता नहीं। जो लोग बड़े सपनों के साथ बाबुल से लौटे थे, उनकी दूसरी-तीसरी पीढ़ी अब ऊब चुकी है। याजक लंगड़े और अंधे पशु वेदी पर चढ़ा रहे हैं, दसवाँ अंश रोक लिया गया है, पत्नियाँ त्यागी जा रही हैं, और लोग खुलकर कह रहे हैं कि दुष्ट फल-फूल रहे हैं। इस बासी, समझौतापरस्त धर्म के बीच मलाकी भट्ठे की बात करता है। यह डराने के लिये नहीं, जगाने के लिये है: परमेश्वर उदासीन नहीं हुए, वे आ रहे हैं।
एक बारीकी
"उसकी किरणों के द्वारा तुम चंगे हो जाओगे।" इब्रानी में जो शब्द है वह किरण नहीं, कानाफ़ है, यानी पंख, और साथ ही वस्त्र का छोर या आँचल। सूर्य के पंख: सुबह की पहली रोशनी जो क्षितिज पर फैलती है, जैसे कोई परिंदा अपने पंख खोलता है। पर उसी शब्द से वह चित्र भी बनता है जिसमें कोई ओढ़नी के छोर से किसी को ढँक लेता है, सुरक्षा और अपनापन देने के लिये। तो यह चंगाई दूर से पड़ने वाली गरमी नहीं है, यह ओढ़ लिये जाने का अनुभव है। जो लोग उजाड़ मन्दिर में ठिठुरते हुए खड़े थे, उनसे कहा जा रहा है: सुबह होगी, और वह सुबह तुम्हें ढँक लेगी।
अंतर्पाठ
पौलुस थिस्सलुनीकियों को लिखते हुए इसी भट्ठे की भाषा उठाते हैं: प्रभु यीशु "भड़कती हुई आग में" प्रकट होंगे, उनके लिये जो परमेश्वर को नहीं जानते (2 थिस्सलुनीकियों 1:8). यानी नया नियम मलाकी के इस दिन को रद्द नहीं करता, वह उसे मसीह के प्रकट होने से जोड़ देता है। और मलाकी के भीतर ही, अध्याय 3 में, वही आग सोने को शुद्ध करने वाली भट्ठी बन जाती है। एक ही आग, दो परिणाम, इसलिये कि आग बदलती नहीं, उसमें रखी चीज़ बदलती है। खूँटी जलकर राख होती है; सोना निखर आता है। सवाल यह नहीं कि परमेश्वर आएँगे या नहीं। सवाल यह है कि उस दिन आप उनके हाथ में क्या होंगे।
चिंतन
मलाकी के अनुसार बचाए जाने की पहचान "परमेश्वर के नाम का भय मानना" है। आपके रोज़मर्रा के फैसलों में यह भय कहाँ दिखता है, और कहाँ आप उसकी जगह केवल धार्मिक आदत रख देते हैं?
आपके परिवार में कौन सा मन किसकी ओर फेरा जाना बाकी है, और उस दिशा में पहला छोटा कदम इस हफ्ते क्या हो सकता है?
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Malachi 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
भविष्यद्वक्ताओं की आवाज़ अब चुप होने वाली थी, चार सौ साल की शान्ति आने वाली थी। और परमेश्वर का अन्तिम वचन कोई नई बात नहीं, बल्कि यह था: "मेरे दास मूसा की व्यवस्था... उनको स्मरण रखो।"
कभी सोचा है? तुम्हें नए दर्शन की ज़रूरत नहीं, जो कहा गया है उसे याद रखने की ज़रूरत है। जो बात तुम भूल चुके हो, वही अकसर वह होती है जो परमेश्वर ने आज के दिन के लिए तुम्हें दी थी।
देखो, यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहले, मैं तुम्हारे पास एलिय्याह नबी को भेजूँगा।" पुराने नियम का आखिरी पन्ना धमकी से नहीं, एक वादे से बंद होता है। न्याय का दिन आने से पहले परमेश्वर किसी को भेजता है, ताकि तू तैयार हो सके। सोच, आज तेरे जीवन में वह चेतावनी देनेवाली आवाज़ कौन है, जिसे तू अनसुना कर रहा है?
हे परमेश्वर, मेरे भीतर जो थकान और घाव हैं, उन्हें तू जानता है। तेरा प्रकाश मुझ पर उदय हो और उसकी किरणों में चंगाई लेकर आए। मुझे फिर से खुली हवा में, बछड़ों की तरह उछलते हुए जीने की आज़ादी दे। मैं तेरे नाम का भय मानते हुए तुझ पर भरोसा रखता हूँ।
देखो, वह दिन आता है जो भट्ठे के समान धधकता होगा।" मलाकी के दिनों में लोग कुड़कुड़ा रहे थे कि घमंडी ही फल फूल रहे हैं। परमेश्वर उनकी असलियत एक शब्द में खोल देते हैं: भूसा। बाहर से लहलहाता पेड़, भीतर से सूखी भूसी, "न जड़ बचेगी और न शाखा।" जिन बातों पर तू आज इतराता है, ज़रा पूछ, उनकी जड़ कहाँ है?
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