मरकुस 12:33
पाठ
मन्दिर के आँगन में, जहाँ दिन भर बलि के पशुओं की आवाज़ और धुएँ की गंध हवा में टँगी रहती है, एक शास्त्री यीशु की बात दोहराता है और उसमें एक वाक्य जोड़ देता है। वह कहता है कि परमेश्वर से सारे मन, सारी बुद्धि, सारे प्राण और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना, और पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना, "सारे होमबलियों और बलिदानों से बढ़कर है।" यह आदमी किसी बाहर के मैदान में खड़ा होकर यह नहीं कह रहा। वह उसी व्यवस्था के भीतर खड़ा है जो बलिदान माँगती है, और वहीं खड़े होकर कहता है कि प्रेम उससे ऊपर है। यीशु उसे टोकते नहीं। वे उससे कहते हैं कि वह परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं।
मूल बात
यहाँ एक पैमाना रखा जा रहा है, और वह पैमाना भयानक रूप से सरल है। परमेश्वर को किसी चीज़ की कमी नहीं कि हमारे चढ़ावे उन्हें भरें; वे जो माँगते हैं वह चढ़ावा नहीं, चाहने वाला है। मन, बुद्धि, प्राण, शक्ति, यह सूची किसी एक हिस्से को बाहर नहीं छोड़ती। सोचने वाला दिमाग़, थकी हुई देह, भावनाओं का उथल-पुथल, सब उसी एक प्रेम के दायरे में खींच लिए जाते हैं। और फिर, बिना साँस लिए, पड़ोसी जुड़ जाता है। मानो परमेश्वर से प्रेम का कोई शुद्ध, अलग-थलग रूप होता ही नहीं जो किसी पड़ोसी के चेहरे से होकर न गुज़रे। यह बलिदान को रद्द नहीं करता; यह बलिदान से पूछता है कि वह किसके लिए चढ़ाया जा रहा है। धर्म की सारी मशीनरी एक प्रश्न के सामने चुप हो जाती है: क्या तुम सचमुच प्रेम करते हो?
साझा सूत्र
ध्यान दीजिए कि यह बातचीत कहाँ हो रही है। मन्दिर में, उस जगह जहाँ बलिदान की पूरी व्यवस्था चल रही है, एक आदमी कहता है कि प्रेम इन सबसे बढ़कर है, और परमेश्वर का पुत्र सिर उठाकर सहमति देता है। इस्राएल के भविष्यद्वक्ता सदियों से यही कहते आए थे कि परमेश्वर को मेढ़ों की चर्बी से नहीं, करुणा से प्रसन्नता होती है; शास्त्री उस लम्बी परम्परा की आवाज़ है। पर अब कुछ नया है। जिस दाख की बारी के दृष्टान्त में प्रिय पुत्र बारी के बाहर फेंक दिया जाता है, उसी अध्याय में यह संवाद हो रहा है। कुछ ही दिनों में वह पुत्र स्वयं नगर के बाहर मारा जाएगा। तब पहली बार कोई ऐसा बलिदान होगा जो पूरी तरह प्रेम ही है, जिसमें चढ़ावा और चढ़ाने वाला अलग नहीं। प्रेम बलिदान से बढ़कर है, और क्रूस पर वह दोनों एक हो जाते हैं।
दर्पण
यह आयत उस व्यक्ति के लिए सबसे असहज है जो धर्म में कुशल हो चुका है। आप समय पर पहुँचते हैं, बाइबल पढ़ने का क्रम नहीं टूटता, दशमांश सही जाता है, समूह आपके भरोसे चलता है। और फिर यह वाक्य आता है और आपके सारे चढ़ावों को तराज़ू के एक पलड़े पर रख देता है, दूसरे पलड़े पर आपकी पत्नी का वह प्रश्न जिसे आपने तीन बार टाल दिया, वह कर्मचारी जिसका नाम आपको आज तक नहीं पता, वह बूढ़ी पड़ोसन जिसकी बत्ती देर रात तक जलती रहती है। "सारी शक्ति" में वह शक्ति भी शामिल है जो आप थकान के नाम पर बचा रखते हैं। प्रेम माँगता है कि आप किसी के पास तक जाएँ, और यही सबसे महँगा पड़ता है।
आज, अभी, उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसे आप रोज़ देखते हैं पर जिसका हाल आपने महीनों से नहीं पूछा, और नाम लिखने के दस मिनट के भीतर उसे फ़ोन कीजिए या संदेश भेजकर पूछिए कि वह कैसा है।
शास्त्र की गूँज
यह शास्त्री अकेला नहीं बोल रहा। जब शमूएल ने शाऊल से कहा था कि आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है, तब भी यही तराज़ू रखा गया था: परमेश्वर को चढ़ावे से अधिक वह मनुष्य चाहिए जो उनकी सुनता है। और होशे के द्वारा परमेश्वर ने कहा था कि उन्हें बलिदान नहीं, करुणा चाहिए। पर सबसे तीखी गूँज इसी अध्याय के अन्त में है। कुछ पंक्तियों बाद यीशु उन शास्त्रियों के विषय में चेतावनी देते हैं जो "विधवाओं के घरों को खा जाते हैं, और दिखाने के लिये बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं", और फिर उस गरीब विधवा की ओर इशारा करते हैं जिसने "अपनी सारी जीविका डाल दी"। एक ओर धर्म जो पड़ोसी को खा जाता है, दूसरी ओर एक स्त्री जो सब कुछ दे देती है। आयत 33 इन दोनों के बीच खड़ी होकर पूछती है कि आप किस तरफ़ हैं।
मुख्य पात्र
यह शास्त्री अजीब आदमी है। उसके साथी यीशु को फँसाने आए थे, पर वह विवाद सुनता है और प्रभावित होता है। उसकी प्रशंसा में कोई चापलूसी नहीं, "हे गुरु, बहुत ठीक!" में एक विद्यार्थी की सच्ची राहत है, जैसे किसी ने वर्षों से उसके भीतर पड़े प्रश्न को ठीक शब्द दे दिए हों। वह पूरी ज़िंदगी पाठों के बीच बिता चुका है और अब एक सीधी बात पर आ पहुँचा है। उसमें वह बौद्धिक ईमानदारी है जो अपने ही वर्ग के हितों के विरुद्ध बोल सके, क्योंकि जो वह कह रहा है वह मन्दिर की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाता है। और फिर यीशु का उत्तर उसे बीच रास्ते में खड़ा छोड़ देता है: "तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं।" प्रशंसा भी, और एक खुला दरवाज़ा भी, जिसे पार करना अभी बाकी है।
कठिन प्रश्न
"दूर नहीं" का क्या अर्थ है? यह वाक्य गले लगाता भी है और रोक भी देता है। आदमी ने सही उत्तर दिया, यीशु ने माना कि उसने समझ से उत्तर दिया, फिर भी वह भीतर नहीं है। क्या कमी रह गई? मरकुस हमें नहीं बताता। वह उस शास्त्री को हमेशा के लिए दहलीज़ पर खड़ा छोड़ देता है, और शायद यह चुप्पी जानबूझकर है। सही धर्मशास्त्र आपको दरवाज़े तक ले आता है; भीतर ले जाने वाली चीज़ कुछ और है, और वह कुछ और उस समय उसके सामने खड़ा था। दूसरा काँटा यह है कि हममें से किसने कभी सारे मन, सारी बुद्धि, सारे प्राण और सारी शक्ति से प्रेम किया है? यदि यह पैमाना है तो हम सब "दूर नहीं" में ही रह जाते हैं। इसका उत्तर कोशिश बढ़ाने में नहीं, उस पुत्र में है जिसने यह आज्ञा हमारे बदले पूरी तरह जी।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में कौन सा धार्मिक "होमबलि" है, कोई आदत या सेवा, जिसे आप इसलिए बनाए रखते हैं ताकि किसी ठोस प्रेम से बचा जा सके?
यदि यीशु आज आपसे कहें "तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं", तो आपके भीतर पहली प्रतिक्रिया राहत होगी या बेचैनी, और क्यों?
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Mark 12:33 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 12:33 का क्या अर्थ है?
मरकुस 12:33 किस विषय में है?
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मरकुस 12:33 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 12:33 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि दाऊद ने पवित्र आत्मा में होकर यीशु के विषय में कहा, "प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, मेरे दाहिने बैठ।" धन्यवाद कि मेरा उद्धारकर्ता आज भी आदर के स्थान पर बैठा है, और आप ही उसके बैरियों को उसके पाँवों तले कर देंगे। यह आश्वासन मेरे डर को शांत करता है।
पिता, उस स्त्री की कहानी में जो सात बार विधवा हुई और नि:सन्तान रही, मैं देखता हूँ कि आपकी नज़र उन पर भी थी जिन्हें संसार भूल जाता है। धन्यवाद कि मेरी पहचान मेरे नुकसानों से नहीं, आपके प्रेम से तय होती है, और कब्र आपकी कहानी का अन्त नहीं।
परन्तु उसने उनका कपट जानकर उनसे कहा, 'मुझे क्यों परखते हो? एक दीनार मेरे पास लाओ, कि मैं देखूँ।'" सवाल सच्चा लग रहा था, पर नीयत जाल थी। यीशु शब्दों के पीछे का दिल पढ़ लेते हैं। सोचो, तुम्हारी आखिरी प्रार्थना खोज थी या बहाना? वह फिर भी बात करते हैं, पर पहले तुम्हारे भीतर का सच नाम लेकर सामने रखते हैं।
इसलिए दाख की बारी का स्वामी क्या करेगा? वह आएगा और उन किसानों का नाश करेगा, और दाख की बारी दूसरों को सौंपेगा।" ध्यान दे, बारी नष्ट नहीं होती, सिर्फ हाथ बदलते हैं। परमेश्वर का काम रुकता नहीं। खतरा तब आता है जब सौंपी हुई चीज़ को हम अपनी समझ बैठते हैं। आज तू किस भाव से सेवा कर रहा है, मालिक बनकर या सेवक बनकर?
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