1 शमूएल 15:22
पाठ
मिमियाती भेड़ों के शोर के बीच शमूएल एक प्रश्न रखता है, और वह प्रश्न उत्तर से भी भारी है: "क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है?" शाऊल ने अभी-अभी समझाया था कि लूट का सबसे अच्छा हिस्सा बलिदान के लिए बचाया गया है, मानो यह आज्ञा न मानने का कोई पवित्र संस्करण हो। शमूएल उस तर्क को बीच में ही काट देता है और एक वाक्य में तौल कर रख देता है: "सुन, मानना तो बलि चढ़ाने से और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।" दो क्रियाएँ, मानना और कान लगाना, वेदी पर चढ़ाई गई सारी चर्बी से भारी निकलती हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए कि शमूएल बलिदान को रद्द नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि होमबलि व्यर्थ है; वह कहता है कि वह दूसरे स्थान पर है। और यही बात चुभती है, क्योंकि धर्म का सबसे सूक्ष्म रूप यही है कि हम परमेश्वर को कुछ देकर उनसे सुनने की ज़रूरत खरीद लें। बलिदान में पहल मेरी होती है, मैं चुनता हूँ कि क्या, कब और कितना। सुनने में पहल उनकी होती है, और मेरे हाथ खाली रह जाते हैं। इब्रानी में जिस शब्द का अनुवाद "मानना" है, वह शमा है, जिसका अर्थ पहले सुनना है और फिर उस सुनने के अधीन हो जाना। आज्ञाकारिता कोई प्रदर्शन नहीं, वह एक खुला कान है। परमेश्वर उपासक की संपत्ति नहीं, उसका ध्यान चाहते हैं। और यह प्रश्न खुला छोड़ने लायक है: मेरी भक्ति में कितना चढ़ावा है और कितना सुनना?
सूत्र
इस वाक्य की गूँज पूरे पुराने नियम में सुनाई देती है, और यह संयोग नहीं कि बाद में एक शास्त्री यीशु के सामने लगभग यही बात दोहराता है, कि परमेश्वर से प्रेम करना सारे होमबलियों से बढ़कर है, और यीशु उसे परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं बताते। वही धागा यहाँ से वहाँ तक जाता है। परन्तु सूत्र केवल शिक्षा का नहीं है। शाऊल वह राजा है जिसने सुना नहीं और चढ़ाया बहुत; मसीह वह राजा हैं जिनमें सुनना और चढ़ाना एक हो जाते हैं। उनका बलिदान इसलिए स्वीकार्य है क्योंकि वह आज्ञाकारिता का ही दूसरा नाम है, पिता की बात का पूरा होना। गतसमनी में कोई मेढ़ा नहीं बचाया गया, केवल एक खुला कान था।
आईना
यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे धार्मिक दिखते हैं। रविवार को सेवा में हाज़िर रहना आसान है जब घर पर वह बातचीत टल रही हो जिसे आप टालते आए हैं। चंदा देना आसान है जब आप जानते हैं कि असली आज्ञा पैसे के बारे में नहीं, समय के बारे में थी। समूह का नेतृत्व करना आसान है जब आप भीतर से जानते हैं कि परमेश्वर ने आपसे कुछ कहा था और आपने उसका एक सुंदर, अधिक सुविधाजनक संस्करण बना लिया है, ठीक वैसे ही जैसे शाऊल ने "तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये बलि" कहकर अपनी लूट को पवित्र बना दिया। शाऊल झूठ नहीं बोल रहा था; वह स्वयं पर विश्वास कर चुका था। यही सबसे डरावना है। आज एक काग़ज़ पर वह एक वाक्य लिखिए जो आप जानते हैं कि परमेश्वर आपसे कह चुके हैं और आपने अब तक टाल रखा है, और उसे ज़ोर से पढ़िए।
प्रश्न
लेकिन यहाँ एक काँटा है जिसे निकालना मुश्किल है। जिस आज्ञा को न मानने पर शाऊल की भर्त्सना हो रही है, वह आज्ञा थी "क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बच्चा, क्या दूध पीता… सब को मार डाल।" और पद 22 उसी आज्ञा के मानने को बलिदान से उत्तम कहता है। इसे सहज बना देना बेईमानी होगी। हम यह कहकर बच नहीं सकते कि शाऊल दयालु था; उसने स्त्रियों और बच्चों को नहीं, मोटे पशुओं और राजा को बचाया, यानी जो लाभदायक और प्रतिष्ठाजनक था। उसकी कोमलता चुनिंदा थी। फिर भी वह कठोर आज्ञा अपनी जगह खड़ी रहती है और हमें असहज करती है। मैं इसका हल देने का दिखावा नहीं करूँगा। मैं केवल कहूँगा कि यह पाठ हमें परमेश्वर के न्याय के सामने चुप कराता है, और क्रूस को देखे बिना उस चुप्पी को सहना लगभग असंभव है।
बारीकी
"मेढ़ों की चर्बी" वाला वाक्यांश यूँ ही नहीं आया। लैव्यव्यवस्था में चर्बी वह हिस्सा था जिसे कोई इस्राएली खा नहीं सकता था; वह विशेष रूप से यहोवा के लिए वेदी पर जलाई जाती थी। यानी शमूएल सबसे घटिया चढ़ावे की बात नहीं कर रहा, बल्कि उस अंश की जो पूरी तरह और केवल परमेश्वर का था। सबसे पवित्र हिस्सा भी सुनने से नीचे रखा गया है। यह तुलना का स्तर ऊँचा कर देती है: बात यह नहीं कि बुरी भक्ति बेकार है, बात यह है कि सर्वोत्तम भक्ति भी खुले कान की जगह नहीं ले सकती। और शाऊल के पास तो "अच्छी से अच्छी भेड़-बकरियाँ" थीं। उसके पास सब कुछ था, एक चीज़ को छोड़कर।
मुख्य पात्र
शमूएल इस दृश्य में ठंडा न्यायाधीश नहीं है। एक रात पहले वह "रात भर यहोवा की दुहाई देता रहा" था, और उसका क्रोध भड़का हुआ था, और अध्याय के अंत में हम पढ़ते हैं कि वह जीवन भर शाऊल के लिए विलाप करता रहा। जो आदमी यह सख़्त वाक्य बोलता है, वही आदमी उस पर रोया है। यहीं भविष्यद्वक्ता का असली चेहरा दिखता है: सच्चाई कहने का अधिकार उसी को है जिसने पहले उसके बोझ को अपने ऊपर उठाया हो। शमूएल ने शाऊल का अभिषेक किया था, उसे बड़ा होते देखा था, और अब उसे गिरते देखना पड़ रहा है। उसकी आवाज़ में फटकार है, पर उसके भीतर टूटन है। परमेश्वर की बात कहनेवाले लोग अक्सर रात को सो नहीं पाते।
चिंतन
पिछले महीने मैंने परमेश्वर के लिए जो कुछ किया, उसमें से कितना मेरा चुना हुआ चढ़ावा था और कितना उनकी कही हुई बात का पालन?
जिस बात को मैं "प्रजा के लोगों का भय" कहकर टाल रहा हूँ, क्या वह सचमुच दूसरों का दबाव है, या मेरी अपनी इच्छा का पवित्र नाम?
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