मत्ती 17:20
पाठ
भीड़ छँट चुकी है, लड़का चंगा हो चुका है, और चेले यीशु को एक ओर ले जाकर दबी आवाज़ में वही सवाल पूछते हैं जो उनके गले में अटका था: "हम इसे क्यों नहीं निकाल सके?" उत्तर कोमल नहीं है। यीशु कहते हैं, यह तुम्हारे "विश्वास की कमी के कारण" हुआ। और फिर वे एक ऐसी तस्वीर खींचते हैं जो उनके सवाल को उलट देती है: अगर विश्वास राई के दाने जितना छोटा भी हो, तो पहाड़ से कहा जा सकता है, "यहाँ से सरककर वहाँ चला जा," और वह चला जाएगा। समस्या मात्रा की नहीं थी। समस्या यह थी कि जो चीज़ सरसों के बीज जितनी भी होनी चाहिए थी, वह उस दिन उनके भीतर बिलकुल नहीं थी।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यीशु ने यह नहीं कहा कि तुम्हारा विश्वास छोटा था; उन्होंने कहा कि तुम्हारे पास विश्वास की कमी थी, और फिर सबसे छोटे संभव नाप की बात की। यह तुलना चुभती है, क्योंकि वह हर उस हिसाब को तोड़ देती है जिसमें हम विश्वास को ईंधन की तरह नापते हैं, मानो पर्याप्त मात्रा जमा हो जाए तो चमत्कार अपने आप चालू हो जाए। बीज की तस्वीर का पूरा मर्म यही है कि बीज अपनी ताक़त से नहीं, बल्कि उस मिट्टी और जीवन से काम करता है जिसमें वह गिरता है। विश्वास कोई आत्मिक शक्ति नहीं जो आपके भीतर जमा होती है; वह एक दिशा है, एक झुकाव, एक ऐसा भरोसा जो अपने से हटकर परमेश्वर पर टिक जाता है। चेले असफल हुए क्योंकि वे अपने ही अनुभव पर, अपने पिछले सफल दिनों पर टिके रह गए थे, और वहाँ परमेश्वर के लिए जगह ही नहीं बची थी।
सूत्र
राई का दाना और पहाड़: यह जोड़ी संयोग से नहीं चुनी गई। पूरे बाइबल में परमेश्वर छोटे को चुनते हैं ताकि बड़े का दावा टूटे। एक बूढ़े निःसंतान जोड़े से एक जाति, एक चरवाहे लड़के की गोफन से एक दैत्य का अंत, एक कुँवारी की कोख से राजा। और अब, इसी अध्याय में, वह पुत्र जो पहाड़ पर सूर्य के समान चमका था, उसी पहाड़ से उतरकर कहता है कि वह मनुष्यों के हाथ में पकड़वाया जाएगा। जो सबसे बड़ी अनहोनी लगती थी, मृत्यु, वह तीसरे दिन सरका दी गई। इसलिए यह वचन जादू का सूत्र नहीं है; यह उस राज्य का नियम है जहाँ छोटा बीज क्रूस की मिट्टी में गिरकर पहाड़ हिलाता है।
दर्पण
हम में से अधिकतर पहाड़ हटाना नहीं चाहते; हम केवल चाहते हैं कि वे थोड़े छोटे लगें। इसलिए हम धीरे-धीरे प्रार्थना करना बंद कर देते हैं उस बेटे के लिए जो घर लौटता ही नहीं, उस विवाह के लिए जो बारह साल से ठंडा है, उस रिपोर्ट के लिए जो डॉक्टर ने अभी दी है। हम इसे परिपक्वता कहते हैं, पर अक्सर यह वही चीज़ है जिसे यीशु "विश्वास की कमी" कहते हैं: अपने अनुभव के भीतर सिमट जाना, जहाँ परमेश्वर के हस्तक्षेप की कोई जगह ही नहीं बची। चेलों ने भी कभी दुष्टात्माएँ निकाली थीं; उनकी समस्या अनुभवहीनता नहीं, आत्मनिर्भरता थी। आज ही, दिन ढलने से पहले, उस एक नाम या परिस्थिति को ज़ोर से बोलकर परमेश्वर के सामने रखिए जिसके लिए आपने प्रार्थना करना चुपचाप छोड़ दिया था।
संदर्भ
यह दृश्य पहाड़ की तलहटी में घटता है, धूल, भीड़ और शर्मिंदगी के बीच। तीन चेले ऊपर महिमा देख रहे थे; बाकी नौ नीचे एक तड़पते लड़के के सामने खड़े थे और कुछ नहीं कर पा रहे थे। पहली सदी के गलील में यह केवल असफलता नहीं, सार्वजनिक अपमान था: गुरु की प्रतिष्ठा उसके शिष्यों के काम से नापी जाती थी, और भीड़ देख रही थी। पिता घुटने टेक चुका था, यानी उसने अपनी आख़िरी उम्मीद इन लोगों पर लगाई थी। इसीलिए चेले "एकान्त में" पूछते हैं; यह सवाल भीड़ के सामने पूछा नहीं जा सकता था। और "पहाड़ हटाना" उस समय की रब्बीनी बोलचाल में मुहावरा था: जो शिक्षक असंभव उलझनें सुलझा देता, उसे "पहाड़ उखाड़नेवाला" कहा जाता था।
अंतर्पाठ
इसी सुसमाचार में आगे, अंजीर के पेड़ के सूखने पर, यीशु फिर यही तस्वीर दोहराते हैं, पर इस बार पहाड़ को समुद्र में डालने की बात कहते हैं और उसे प्रार्थना से जोड़ते हैं। यह जोड़ ज़रूरी है: पहाड़ हिलाने वाला विश्वास वह है जो माँगता है, न कि वह जो आदेश देना सीख जाता है। दूसरी ओर जकर्याह की भविष्यवाणी में, जब मंदिर का पुनर्निर्माण असंभव लगता था, परमेश्वर उस विशाल पहाड़ को समतल मैदान घोषित करते हैं, और वह भी बल या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि अपने आत्मा से। दोनों जगह पहाड़ प्रतीक है उस रुकावट का जो परमेश्वर के काम के रास्ते में खड़ी है, और दोनों जगह उसे हटाने वाला हाथ मनुष्य का नहीं है।
मुख्य पात्र
इस पूरे अध्याय में यीशु का स्वर दो रंगों में बँटा है, और दोनों सच्चे हैं। कुछ ही पल पहले उन्होंने कहा था, "हे अविश्वासी और हठीले लोगों, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूँगा?" यह थकी हुई, लगभग व्यथित आवाज़ है, किसी ऐसे की जो अकेला खड़ा है उन लोगों के बीच जो देखकर भी नहीं देखते। पर पहाड़ पर, जब चेले डर से मुँह के बल गिरे थे, उन्होंने पास आकर उन्हें छुआ और कहा, "उठो, डरो मत।" वही हाथ जो डाँटता है, वही उठाता है। यीशु चेलों की असफलता को ढँकते नहीं, पर उन्हें छोड़ते भी नहीं; वे उनकी नाकामी को नाम देकर उन्हें फिर से भेजने की तैयारी करते हैं। यही अनुग्रह है: बिना झूठ बोले, बिना छोड़े।
मनन
आपके जीवन में वह कौन सा "पहाड़" है जिसके बारे में आपने प्रार्थना करना नहीं, बल्कि उम्मीद करना छोड़ दिया है, और आप उसे परिपक्वता क्यों कहते हैं?
चेलों की तरह, आप कहाँ अपने पिछले अनुभव और कौशल पर टिककर सेवा कर रहे हैं, जहाँ परमेश्वर के बिना भी काम चल जाता है?
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Matthew 17:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 17:20 का क्या अर्थ है?
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Matthew 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धन्यवाद यीशु, कि आपने हमें खाली हाथ नहीं छोड़ा, बल्कि प्रार्थना और उपवास का रास्ता दिखाया। जो बंधन हमारी कोशिशों से नहीं टूटते, वे आपके सामने झुककर मांगने से टूटते हैं। धन्यवाद कि आप सुनते हैं और उत्तर देते हैं।
पिता, मेरा विश्वास बहुत छोटा लगता है, राई के दाने जितना भी नहीं। फिर भी तू कहता है कि इतना ही काफी है। जो पहाड़ मेरे सामने खड़े हैं, उन्हें देखकर मैं डरता हूँ, पर आज मैं अपनी थोड़ी सी आस्था तेरे हाथों में रखता हूँ। तू ही इसे बढ़ा दे।
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