मत्ती 17
पाठ
छः दिन के बाद यीशु तीन शिष्यों को एक ऊँचे पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहाँ उनका रूप बदल जाता है: चेहरा सूर्य जैसा, वस्त्र ज्योति जैसे उजले। मूसा और एलिय्याह उनसे बातें करते हैं, पतरस तीन तम्बू बनाना चाहता है, और बादल में से आवाज़ आती है, "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ: इसकी सुनो।" फिर वे उतरते हैं, नीचे एक पिता अपने पीड़ित बेटे को लेकर खड़ा है जिसे शिष्य अच्छा नहीं कर सके, यीशु उसे चंगा करते हैं, दूसरी बार अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान की बात कहते हैं, और अंत में एक मछली के मुँह से निकले सिक्के से मन्दिर का कर चुकाते हैं।
मूल बात
पहाड़ पर परमेश्वर की आवाज़ यीशु की महिमा की पुष्टि नहीं करती, वह उनके वचन की पुष्टि करती है: "इसकी सुनो।" ठीक छः दिन पहले यीशु ने कहा था कि उन्हें दुःख उठाना और मारा जाना है, और पतरस ने विरोध किया था। अब पिता कहते हैं: जो यह क्रूस की बात कह रहा है, वही मेरा प्रिय पुत्र है। महिमा क्रूस का विकल्प नहीं, उसकी पुष्टि है। इसीलिए दर्शन के तुरंत बाद उतराई आती है, और उतराई के तुरंत बाद एक ऐसा बच्चा जिसे शिष्य छू भी नहीं सके। परमेश्वर का पुत्र चोटी पर चमकता है ताकि वह घाटी में उतरकर मरने जा सके।
साझा सूत्र
मूसा और एलिय्याह वहाँ सजावट के लिए नहीं खड़े हैं। दोनों ने पहाड़ पर परमेश्वर की महिमा का किनारा देखा था, मूसा सीनै पर, एलिय्याह होरेब पर, और दोनों को टाल दिया गया, ढँक दिया गया, गुफा में छिपाया गया। अब वही दोनों उस व्यक्ति से बात कर रहे हैं जिसे ढँकने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि महिमा उनकी अपनी है। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता यहाँ अपने गंतव्य से मिलते हैं और फिर हट जाते हैं: "उन्होंने अपनी आँखें उठाकर यीशु को छोड़ और किसी को न देखा।" पूरे पुराने नियम का तीर एक ही व्यक्ति की ओर है, और उस व्यक्ति का रास्ता यरूशलेम की ओर जाता है।
दर्पण
पतरस की प्रतिक्रिया बहुत जानी-पहचानी है। एक शिविर, एक सम्मेलन, एक ऐसी सुबह जब प्रार्थना में सचमुच कुछ खुला: और तुरंत मन कहता है, यहीं रह जाएँ, तीन तम्बू बना लें। पर पहाड़ का मकसद यही था कि तुम नीचे उतर सको, वहाँ जहाँ एक पिता घुटने टेककर कह रहा है कि मेरा बेटा बार बार आग में और पानी में गिर पड़ता है, और तुम्हारे पास कोई इलाज नहीं। मिरगी, मानसिक बीमारी, लत, वह रिश्ता जो सालों से नहीं सुधरा: शिष्य भी हारते हैं। यीशु का उत्तर तकनीक नहीं देता, वह विश्वास की बात करता है, इतना छोटा विश्वास जितना राई का दाना, पर जीवित परमेश्वर पर टिका हुआ।
श्रोताओं का चेहरा
मत्ती के पहले पाठक यहूदी मसीही थे जिनके लिए मन्दिर का कर कोई सैद्धांतिक सवाल नहीं था। हर वयस्क यहूदी सालाना आधा शेकेल देता था, और मत्ती के लिखने के समय तक रोम ने वही कर अपने मंदिर के लिए वसूलना शुरू कर दिया था। "क्या तुम्हारा गुरु मन्दिर का कर नहीं देता?" यह सवाल उनके अपने घरों में गूँज रहा था। साथ ही एलिय्याह वाला प्रश्न भी उनका अपना था: शास्त्री कहते थे कि मसीह से पहले एलिय्याह आएगा और सब सुधारेगा, तो फिर यह कैसा मसीह है जो मारा जाता है? यीशु का उत्तर उनके नक्शे को उलट देता है: एलिय्याह आ चुका, और उसके साथ भी वही हुआ जो पुत्र के साथ होगा।
एक बारीकी
चेले मुँह के बल गिरे और अत्यन्त डर गए, और तब कुछ ऐसा होता है जो पूरे अध्याय की कुंजी है: "यीशु ने पास आकर उन्हें छुआ, और कहा, 'उठो, डरो मत।'" महिमा में लिपटा हुआ पुत्र आवाज़ नहीं देता, वह पास आता है और हाथ लगाता है, उसी तरह जैसे उसने कोढ़ियों और मुर्दों को छुआ। और "उठो" के लिए जो शब्द है, इगेइरो, वही शब्द मत्ती बार बार मृतकों के जी उठने के लिए इस्तेमाल करता है। पहाड़ पर, डर से गिरे हुए तीन आदमियों को, यीशु पहले से ही पुनरुत्थान का शब्द बोल रहे हैं। यही शब्द उन्हें तीसरे दिन के बाद फिर सुनाई देगा।
शास्त्र में गूँज
"छः दिन के बाद" कोई भरती का वाक्यांश नहीं है। निर्गमन 24 में मूसा छः दिन बादल से ढँके पहाड़ पर प्रतीक्षा करता है और सातवें दिन परमेश्वर उसे पुकारते हैं; मत्ती जानबूझकर वही घड़ी दोहराता है, वही पहाड़, वही बादल, वही आवाज़, केवल केंद्र बदल गया है। फिर एक तीखा अंतर: मूसा का चेहरा उधार की चमक से दमकता था, यीशु का चेहरा अपनी। और अंत में सबसे सूक्ष्म गूँज, मन्दिर का कर। निर्गमन 30 में वह आधा शेकेल इस्राएल के हर व्यक्ति के "प्राण की छुड़ौती" था। जो इस छुड़ौती का असली मालिक है, वही उसे चुकाता है, ताकि किसी को ठोकर न लगे, और थोड़े ही दिनों बाद वह सिक्के से नहीं, अपने जीवन से चुकाएगा।
चिंतन
पतरस का तम्बू बनाने का मन आपमें कहाँ काम करता है: कौन-सा आत्मिक अनुभव आप पकड़कर रखना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर आपको नीचे घाटी में भेज रहे हैं?
यीशु ने अपना अधिकार जताने के बजाय ठोकर से बचना चुना। आपके जीवन में वह कौन-सा "हक" है जिसे छोड़ देना दूसरों के लिए रास्ता खोल देगा?
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