मत्ती 28:18
पाठ
गलील के पहाड़ पर ग्यारह चेले खड़े हैं। कुछ झुककर प्रणाम कर रहे हैं, कुछ के मन में अब भी सन्देह है। तभी यीशु स्वयं उनके पास आते हैं, दूरी मिटाते हैं, और एक वाक्य कहते हैं जो सब कुछ बदल देता है: "स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है।" कोई सफाई नहीं, कोई तर्क नहीं, केवल एक घोषणा। और उसी घोषणा से अगली आयत की आज्ञा निकलती है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यीशु यह नहीं कहते कि उनके पास कुछ अधिकार है, या धार्मिक क्षेत्र का अधिकार है। "सारा अधिकार", और वह भी "स्वर्ग और पृथ्वी" का। यानी वहाँ भी जहाँ आप उन्हें मानते हैं, और वहाँ भी जहाँ आप उन्हें भूल जाते हैं: दफ्तर की मीटिंग, बैंक का खाता, आपके शरीर की भूख, आपका कैलेंडर, आपके दुश्मन का नाम। "मुझे दिया गया है" शब्द भी महत्वपूर्ण है। यह अधिकार छीना नहीं गया, पिता की ओर से सौंपा गया है, और उस व्यक्ति को सौंपा गया है जिसके हाथों में कीलों के निशान हैं। जिसके पास सारा अधिकार है, वह वही है जिसने अपना अधिकार त्यागकर क्रूस स्वीकारा। इसलिए यह सत्ता डराने वाली नहीं, भरोसे लायक है।
सूत्र
दानिय्येल ने रात के दर्शन में "मनुष्य के सन्तान जैसा" एक व्यक्ति देखा था, जिसे प्राचीन काल के परमेश्वर के सामने लाया गया और उसे राज्य, अधिकार और सब जातियों की प्रजा सौंपी गई। मत्ती की यह आयत उसी दर्शन का पूरा होना है, और इसीलिए अगला वाक्य "सब जातियों" की बात करता है। बाइबल की पूरी कहानी अधिकार की कहानी है: आदम को सृष्टि सौंपी गई और उसने उसे खो दिया, राजा दाऊद को सिंहासन मिला और उसकी सन्तान भटक गई। अब एक ऐसा व्यक्ति खड़ा है जो अधिकार को अपने लिए नहीं, बल्कि सेवा और मुक्ति के लिए चलाता है। सृष्टि पर मनुष्य का टूटा हुआ शासन मसीह में फिर जुड़ जाता है।
दर्पण
अगर यीशु के पास सारा अधिकार है, तो आपके जीवन में कोई ऐसा कोना नहीं जिस पर आप कह सकें, "यह मेरा निजी मामला है।" यही इस आयत की धार है। पैसा कैसे कमाया जाता है, यह आत्मिक प्रश्न है। बॉस के सामने बोला गया आधा सच उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। जिस रिश्तेदार से आपने दस साल से बात नहीं की, वह उनके राज्य का नागरिक है। आपका फोन, आपकी नींद, आपकी नज़र, ये सब किसी और के हैं। हम अक्सर मसीह को सलाहकार बनाते हैं, प्रभु नहीं; सलाह मानी भी जा सकती है, ठुकराई भी। पर यहाँ सलाह नहीं, अधिकार है। साथ ही यह राहत भी है: जिस स्थिति से आप डरते हैं, वह भी उन्हीं के अधिकार में है।
आज: कागज़ पर अपने जीवन का वह एक क्षेत्र लिखिए जिसे आप अब तक अपना "निजी" मानते आए हैं, और उसके ऊपर लिखिए, "इसका भी सारा अधिकार यीशु मसीह का है।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
बारीकी
"यीशु ने उनके पास आकर कहा" पर रुकिए। उससे ठीक पहले लिखा है कि "किसी किसी को सन्देह हुआ।" यीशु सन्देह करने वालों को पहले ठीक नहीं करते, न ही उन्हें अलग करते हैं। वे पास आते हैं। सम्राट पास नहीं आते; लोग सम्राटों के पास लाए जाते हैं। यहाँ सारे अधिकार का स्वामी स्वयं चलकर उन ग्यारह अधूरे लोगों तक पहुँचता है और फिर उन्हीं को दुनिया भेजता है। इसका नैतिक अर्थ बड़ा है: मसीह का अधिकार दूरी बनाकर नहीं, नज़दीक आकर काम करता है। जो लोग आपके नीचे हैं, आपके अधीन हैं, आपके कर्मचारी या बच्चे हैं, उनके साथ आपका व्यवहार इसी नमूने से नापा जाएगा।
चेहरे
मत्ती के पहले पाठक यहूदी मसीही थे, जो रोमी साम्राज्य के भीतर रहते थे। उनके लिए "अधिकार" कोई अमूर्त शब्द नहीं था। कैसर के पास सेना थी, मन्दिर के प्रधान याजकों के पास प्रभाव और चाँदी थी, जैसा इसी अध्याय में पहरेदारों को दी गई रिश्वत से दिखता है। ये ग्यारह लोग किसी संस्था के मालिक नहीं थे। उनके पास न मन्दिर था, न सेना, न पैसा। और फिर भी उनसे कहा गया कि सब जातियों के पास जाओ। यह आयत उनके लिए साहस की जड़ थी: जिस नाम पर वे सताए जा रहे थे, उसी नाम के पास वह अधिकार है जो कैसर के पास कभी नहीं था। मरे हुओं में से जी उठना उसका प्रमाण था।
प्रश्न
अगर सारा अधिकार मसीह को मिल चुका है, तो दुनिया ऐसी क्यों दिखती है? भ्रष्ट लोग जीतते हैं, बच्चे भूखे मरते हैं, बीमारी नहीं पूछती कि आप विश्वासी हैं या नहीं। यह प्रश्न टालने लायक नहीं। ईमानदार उत्तर यह है कि अधिकार मिल चुका है, पर उसका पूरा प्रकट होना अभी बाकी है। मसीह इस बीच के समय में अपना राज्य सेना से नहीं, चेले बनाने से फैलाते हैं, और यह धीमा तरीका है। यह हमें अच्छा नहीं लगता। पर यही धैर्य ही अनुग्रह है, क्योंकि अगर वे आज ही पूरा अधिकार चलाते, तो हममें से कौन खड़ा रह पाता? हमें इस तनाव में जीना सीखना है: घोषणा सच है, आँखें अभी उसे पूरी तरह नहीं देखतीं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन सा निर्णय अलग होता अगर आप सचमुच मानते कि उस क्षेत्र का सारा अधिकार मसीह का है?
यीशु सन्देह करने वालों के पास चलकर आए। आप किसके पास चलकर जाने से बच रहे हैं, और क्यों?
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Matthew 28:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 28:18 का क्या अर्थ है?
मत्ती 28:18 किस विषय में है?
मत्ती 28:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 28:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 28:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 28 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पद 17 कहता है, "उन्होंने उसे देखकर दण्डवत् किया, पर कुछ ने सन्देह किया।" और उन्हीं सन्देह करने वालों से यीशु कहता है, "इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।" वह पहले तुम्हारा विश्वास पक्का होने का इन्तज़ार नहीं करता। अधूरे मन वाले हाथों में ही उसने अपना सबसे बड़ा काम सौंप दिया। तुम्हारे डगमगाते कदम भी उसकी सेवा में चल सकते हैं।
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