मत्ती 28
पाठ
सब्त बीतने पर, पौ फटते ही दो स्त्रियाँ कब्र पर आती हैं। भूकम्प होता है, स्वर्गदूत पत्थर लुढ़का कर उस पर बैठ जाता है, और पहरेदार भय से "मृतक समान" हो जाते हैं, जबकि जो सचमुच मरा था वह जी उठा है। स्त्रियाँ भय और आनन्द के साथ दौड़ती हैं, रास्ते में स्वयं यीशु उन्हें मिलते हैं; उधर याजक चाँदी देकर एक झूठी कहानी गढ़वाते हैं। अन्त में गलील के पहाड़ पर ग्यारह चेलों को वह अधिकार सौंपा जाता है जिससे मत्ती की पूरी पुस्तक बँधी हुई थी।
मर्म
यह अध्याय पुनरुत्थान को केवल एक चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि सत्ता के हस्तान्तरण की तरह सुनाता है। "स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है" यह वाक्य कब्र के खाली होने का अर्थ है। मृत्यु रोम का सबसे बड़ा हथियार थी, और महासभा की सबसे अन्तिम दलील भी; दोनों को खाली कब्र ने निहत्था कर दिया। ध्यान दीजिए, यीशु अधिकार पाकर सिंहासन पर नहीं बैठते, वे भेजते हैं। जो अधिकार सचमुच परमेश्वर का है वह सदा मिशन में बदल जाता है, दबदबे में नहीं। और उस अधिकार का आखिरी शब्द धमकी नहीं, संगति है: "मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।"
सूत्र
मत्ती अपनी पुस्तक को दोनों सिरों से एक ही कील से ठोंकता है। पहले अध्याय में बच्चे का नाम इम्मानुएल रखा जाता है, जिसका अर्थ है परमेश्वर हमारे साथ; अन्तिम वाक्य में वही वादा चेलों के कंधों पर रखा जाता है। बीच में क्रूस है। यानी "परमेश्वर हमारे साथ" कोई भावुक तसल्ली नहीं, वह एक कब्र से होकर गुज़री हुई प्रतिज्ञा है। और "सब जातियों के लोगों" वाला आदेश अचानक नहीं आता: अब्राहम को दिया गया वचन कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे, यहाँ अपनी मंज़िल पर पहुँचता है। इस्राएल का मसीहा इस्राएल तक सीमित रहकर मसीहा नहीं रह सकता था।
आईना
यह पाठ हमारी सबसे सभ्य कायरता को उजागर करता है: सच्चाई को जानना और फिर उसे सुविधाजनक रूप से पुनः लिख देना। याजकों ने पुनरुत्थान का इनकार नहीं किया, उन्होंने उसकी कीमत लगाई; "बहुत चाँदी" देकर एक कहानी खरीदी गई। हम भी यही करते हैं जब दफ़्तर में किसी असुविधाजनक तथ्य पर पर्दा डालते हैं, या परिवार में किसी पुराने अन्याय को "अब क्या फ़ायदा" कहकर दबा देते हैं। दूसरी तरफ़ वे स्त्रियाँ हैं, जो "भय और बड़े आनन्द के साथ" दौड़ीं। ध्यान रखिए, भय गया नहीं; वह आनन्द के साथ चलता रहा। और सत्रहवीं आयत ईमानदार है: प्रणाम करने वालों में भी कुछ को सन्देह हुआ, और उन्हीं सन्देह करने वालों को यीशु ने भेजा।
मुख्य पात्र
जी उठे यीशु का व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से शान्त है। वे कोई विजय-जुलूस नहीं निकालते, पीलातुस या कैफा के सामने नहीं जाते। उनका पहला शब्द दो स्त्रियों से है, और वह शब्द है "सुखी रहो", उस समय का साधारण अभिवादन, जैसे बाज़ार में कोई मिल जाए। दूसरा शब्द है "मत डरो"। तीसरा सबसे मार्मिक है: "मेरे भाइयों से जाकर कहो"। जिन भाइयों ने उन्हें छोड़कर भाग जाने का काम किया था, वे अब भी भाई हैं। यहाँ हम परमेश्वर का असली स्वभाव देखते हैं: अधिकार का शिखर और क्षमा की गहराई एक ही व्यक्ति में, बिना किसी शर्त के, बिना किसी उलाहने के।
अन्तर्पाठ
अठारहवीं आयत दानिय्येल के सातवें अध्याय की गूँज है, जहाँ "मनुष्य के पुत्र" जैसा कोई प्राचीन के पास लाया जाता है और उसे सब जातियों पर अधिकार और अनन्त राज्य दिया जाता है। मत्ती कह रहा है: वह दर्शन आज पूरा हुआ, और वह पहाड़ पर खड़ा है। दूसरी गूँज उलटी दिशा में जाती है। सिनै पर मूसा को पत्थर की पटियाएँ मिलीं; यहाँ गलील के पहाड़ पर यीशु कहते हैं कि "सब बातें जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी है" सिखाना, अपने आपको व्यवस्था के देनेवाले की जगह रखते हुए। एक तनाव भी बना रहता है: मत्ती 10 में यीशु ने चेलों को अन्यजातियों की ओर जाने से मना किया था। वह मनाही समय की थी, सिद्धान्त की नहीं; क्रूस से पहले का द्वार अब चौड़ा खुल गया है।
श्रोता
पहले पाठक यहूदी मसीही थे, आराधनालय से निकाले जाने की पीड़ा झेलते हुए, और यह ताना सुनते हुए कि चेले लाश चुरा ले गए थे। पन्द्रहवीं आयत का "आज तक" उसी जीवित बहस का निशान है। मत्ती उन्हें केवल तर्क नहीं देता, वह गवाहों का नाम देता है: दो स्त्रियाँ। उस समाज में स्त्री की गवाही अदालत में हलकी मानी जाती थी, और व्यवस्था दो गवाहों की माँग करती थी। कोई कहानी गढ़ने वाला ऐसे गवाह कभी न चुनता। इसीलिए यह असुविधाजनक विवरण ही सबसे भरोसेमन्द है, और उन सताए हुए पाठकों के लिए सबसे बड़ा दिलासा: परमेश्वर अपनी सबसे बड़ी खबर उन्हीं के हाथ सौंपते हैं जिन्हें दुनिया अनसुना करती है।
चिन्तन
आपके जीवन में वह कौन सा सच है जिसे आपने इनकार नहीं किया, पर चुपचाप उसकी कीमत लगा दी है?
"किसी किसी को सन्देह हुआ" और फिर भी वे भेजे गए। आपका कौन सा सन्देह आपको आज्ञा मानने से रोक रहा है, जबकि यीशु उसे रुकावट नहीं मानते?
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Matthew 28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 28 का क्या अर्थ है?
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मत्ती 28 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 28 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पद 17 कहता है, "उन्होंने उसे देखकर दण्डवत् किया, पर कुछ ने सन्देह किया।" और उन्हीं सन्देह करने वालों से यीशु कहता है, "इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।" वह पहले तुम्हारा विश्वास पक्का होने का इन्तज़ार नहीं करता। अधूरे मन वाले हाथों में ही उसने अपना सबसे बड़ा काम सौंप दिया। तुम्हारे डगमगाते कदम भी उसकी सेवा में चल सकते हैं।
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