नहेम्याह 2
पाठ
नीसान महीने में, राजा को दाखमधु देते समय नहेमायाह का चेहरा पहली बार उतरा हुआ दिखता है, और अर्तक्षत्र उसे पकड़ लेता है। डर के बीच नहेमायाह मन ही मन प्रार्थना करता है और फिर बहुत ठोस बातें माँगता है: यहूदा जाने की अनुमति, रास्ते के अधिपतियों के लिए चिट्ठियाँ, और आसाप के जंगल से लकड़ी। यरूशलेम पहुँचकर वह तीन दिन चुप रहता है, रात में अकेले टूटी शहरपनाह का मुआयना करता है, और तब लोगों को बुलाकर कहता है, "आओ, हम यरूशलेम की शहरपनाह को बनाएँ।" विरोध उसी घड़ी शुरू हो जाता है, ठट्ठे और राजद्रोह के आरोप के रूप में।
मर्म
यह अध्याय दिखाता है कि परमेश्वर की कृपादृष्टि कैसी दिखती है: वह चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि एक अनुमति-पत्र, कुछ कड़ियों की लकड़ी और एक राजा के भले मूड के रूप में आती है। दो बार नहेमायाह कहता है, "मेरे परमेश्वर की कृपादृष्टि मुझ पर थी।" वह इसे कहता है ठीक उस जगह जहाँ हम कहते, "मेरी योजना काम कर गई।" यहाँ भक्ति और व्यवहारकुशलता विरोधी नहीं हैं; प्रार्थना और नाप-तौल एक ही आदमी में साथ बसते हैं। परमेश्वर साम्राज्य के ढाँचे को बाइपास नहीं करते, वे उसके भीतर से काम करते हैं। इसलिए विश्वास का जीवन दफ़्तर, बजट और अनुमति के कागज़ों से ऊपर नहीं उठता, वह उन्हीं के बीच से गुज़रता है।
मूल सूत्र
यरूशलेम की दीवार अपने आप में कोई पवित्र वस्तु नहीं थी। वह इसलिए मायने रखती थी क्योंकि परमेश्वर ने उस लोग के साथ वाचा बाँधी थी, और उजड़ा नगर उस वाचा पर लगा कलंक था; नहेमायाह इसे "नामधराई" कहता है। एक आदमी सुरक्षित पद छोड़कर खंडहर में उतरता है, ताकि दूसरों को शर्म से निकाला जा सके। यही पैटर्न मसीह में अपनी पूर्णता पाता है, जो स्वर्ग के दरबार से हमारी टूटी हालत में उतरे, और यही पैटर्न शरीर पर लागू होता है: कलीसिया दीवार गिरने पर मरम्मत करने वाला समुदाय है। नहेमायाह की पहचान भी बदल जाती है, वह राजा का पिलानेहारा नहीं, "उसके दास" कहलाना चुनता है।
दर्पण
नहेमायाह ने चार महीने प्रार्थना की, फिर तीन दिन चुप रहा, फिर रात में अकेले जाकर मलबा नापा। हम में से बहुत लोग उलटा करते हैं: पहले घोषणा, फिर उत्साह, फिर पता चलता है कि लागत का अंदाज़ा ही नहीं था। आपके सामने भी कुछ टूटा पड़ा है, कोई रिश्ता, कोई कर्ज़, बच्चों के साथ बिगड़ा संवाद, कोई नशा। रात के मुआयने का मतलब है ईमानदारी से पूरी क्षति देखना, इससे पहले कि आप दूसरों को उत्साहित करें। और ध्यान दें, वह सोता है भी: तीन दिन ठहरता है। जोश जो योजना नहीं बनाता, वह छह हफ़्ते चलता है। नहेमायाह ने लकड़ी तक की सूची बना ली थी, क्योंकि परमेश्वर पर भरोसा आलस्य का दूसरा नाम नहीं है।
प्रश्न
एक बात खटकती है: नहेमायाह ने सम्बल्लत और तोबियाह से कहा, "यरूशलेम में तुम्हारा न तो कोई भाग, न हक़ और न स्मारक है।" यह कठोर है, और आज के कानों को अपवर्जक लगता है। क्या यह जातीय घमंड नहीं? पूरी तरह इसका उत्तर नहीं मिलता। पर ध्यान दें कि यह उत्तर उपहास के बाद आता है और राजद्रोह के आरोप के जवाब में, जो जानलेवा आरोप था। नहेमायाह उन्हें मानवता से नहीं, परियोजना से बाहर करता है। कहीं-कहीं सहयोग करना ही विश्वासघात होता है, और हर आवाज़ को मेज़ पर बैठाना विवेक नहीं, कायरता है। यह असुविधाजनक रहता है, और रहना भी चाहिए, ताकि हम इसे अपने पूर्वग्रहों का बहाना न बना लें।
संदर्भ
समय है लगभग 445 ईसा पूर्व, फारसी साम्राज्य की राजधानी शूशन। यरूशलेम की दीवार डेढ़ सदी पहले बेबीलोन ने गिराई थी, और हाल ही में मरम्मत की एक कोशिश ज़ोर से रोकी गई थी, इसलिए "बलवा" का आरोप हवा में नहीं था। पिलानेहारा होना छोटा काम नहीं था; वह राजा के सबसे भरोसेमंद घेरे में था, ज़हर से बचाने वाला व्यक्ति। दरबार में उदास चेहरा दिखाना खतरा था, क्योंकि राजा की उपस्थिति में उदासी उसके शासन पर टिप्पणी मानी जाती थी। इसलिए पद 2 का "मैं अत्यन्त डर गया" अलंकार नहीं है। और महानद के पार के अधिपति, जिनमें सम्बल्लत जैसे लोग थे, अपने इलाके में एक नए मज़बूत यरूशलेम को अपने नुकसान के रूप में देखते थे।
मुख्य पात्र
नहेमायाह एक ऐसा आदमी है जिसमें डर और साहस एक साथ रहते हैं। वह डरता है और फिर भी बोलता है; वह प्रार्थना करता है और फिर भी लकड़ी की माँग रखता है। उसकी प्रार्थना पद 4 में एक साँस भर की है, राजा के दो सवालों के बीच, और यही उसकी आत्मिकता की सबसे सच्ची तस्वीर है: परमेश्वर उसके लिए संकट के क्षण में सबसे पास हैं। वह रुतबे को साधन बनाता है, न कि लक्ष्य। और वह श्रेय बाँटता है: लोगों को बुलाते समय वह अपनी योजना नहीं, बल्कि कृपादृष्टि और राजा की बातें सुनाता है। नेतृत्व यहाँ आत्म-प्रदर्शन नहीं, बल्कि दूसरों को यह विश्वास देना है कि काम संभव है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी "टूटी शहरपनाह" है जिसका आपने अभी तक रात में जाकर ईमानदार मुआयना नहीं किया, क्योंकि पूरी क्षति देखना दर्द देगा?
जब कोई आपके भले काम का उपहास करता है या नीयत पर सवाल उठाता है, तो आपका पहला वाक्य आत्मरक्षा होता है या "स्वर्ग का परमेश्वर हमारा काम सफल करेगा"?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
नहेम्याह ने राजा से लकड़ी तक माँग ली, कि कौन से फाटक, कौन सी शहरपनाह, कौन सा घर। प्रार्थना उसे आलसी नहीं, तैयार बनाती है। पर जब राजा हाँ कहता है, तो वह अपनी चतुराई की तारीफ नहीं करता, लिखता है, "राजा ने मेरे परमेश्वर की भली कृपादृष्टि मुझ पर होने के कारण मेरी विनती स्वीकार की।" तेरी आखिरी सफलता के पीछे तूने किसका हाथ देखा?
सनब्बल्लत और तोबियाह के तानों का जवाब नहमयाह ने सफाई देकर नहीं दिया। उसने कहा, "स्वर्ग का परमेश्वर हमारा काम सफल करेगा, इसलिए हम उसके दास उठकर बनाएँगे।" पहले परमेश्वर की सफलता, फिर हमारा हाथ लगाना। जो काम तुझे सौंपा गया है, उस पर हँसी सुनकर रुक मत। तेरी पहचान बहस से तय नहीं होती, तेरे स्वामी से होती है।
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