नीतिवचन 1:28
पाठ
बवंडर आ चुका है। जो कल तक हँसी उड़ाते थे, आज गलियों में चीख रहे हैं, और उनकी पुकार में वही नाम है जिसे उन्होंने वर्षों तक टाला था: बुद्धि। सड़क के उसी चौक पर, जहाँ वह कभी ऊँचे स्वर से बोलती थी और वे कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाते थे, अब वे उसे ढूँढ़ रहे हैं। दरवाज़ा बंद है। पद कहता है: "उस समय वे मुझे पुकारेंगे, और मैं न सुनूँगी; वे मुझे यत्न से तो ढूँढ़ेंगे, परन्तु न पाएँगे।" ध्यान दीजिए, यह पुकार ईमानदार है, यह खोज गंभीर है, "यत्न से" ढूँढ़ना कोई हल्का शब्द नहीं। और फिर भी उत्तर नहीं आता। यही इस पद की चुभन है, और इसे कुंद करने की कोशिश करना बेईमानी होगी।
मर्म
हम आमतौर पर सोचते हैं कि परमेश्वर की उपलब्धता असीम है, कि जब भी मैं मुड़ूँ, वे वहीं खड़े मिलेंगे। यह पद उस भरोसे को तोड़ता नहीं, पर उसमें समय का काँटा गड़ा देता है। बुद्धि, जो यहाँ परमेश्वर की अपनी आवाज़ बनकर बोलती है, कोई सेवा नहीं है जिसे संकट के क्षण में बुला लिया जाए। वह एक संबंध है, और संबंधों की एक लय होती है। जो वर्षों तक "इन्कार" करता रहा (पद 24), वह अंततः स्वयं को उसी इन्कार के भीतर पाता है, जैसे कोई अपने ही खोदे गड्ढे में गिरे। यहाँ परमेश्वर मनमाने ढंग से मुँह नहीं मोड़ते; पद 31 साफ़ कहता है कि लोग "अपनी करनी का फल आप भोगेंगे।" ठुकराई गई कृपा अपने साथ एक कठोर तर्क लेकर चलती है: बार-बार कहा गया "नहीं" अंततः चरित्र बन जाता है, और चरित्र भाग्य।
सूत्र
बुद्धि का यह बंद दरवाज़ा पूरे बाइबल की कहानी में गूँजता है। यीशु मसीह ने भी दस कुँवारियों की कहानी में वही दृश्य रखा: देर से आने वाली आवाज़ें, और भीतर से उत्तर, "मैं तुम्हें नहीं जानता।" वे नीतिवचन की इस चेतावनी को रद्द नहीं करते, वे उसे और गहरा करते हैं। पर एक निर्णायक अंतर है। नीतिवचन में बुद्धि चौक में खड़ी होकर पुकारती है; सुसमाचार में वह देहधारी होकर उन्हीं गलियों में चलती है, और अंत में उसी शहर के बाहर क्रूस पर टाँग दी जाती है। जो दरवाज़ा यहाँ बंद होता है, वही मसीह में इतना चौड़ा खुलता है कि डाकू भी अंतिम घंटे में भीतर आ जाता है। पर वह खुलापन आज है, हमेशा नहीं। कृपा अनंत है; अवसर नहीं।
दर्पण
आप जानते हैं वह आवाज़ कैसी लगती है। वह डाँट जो आपके पिता ने दी थी और आपने उसे पुराने ज़माने की बात कहकर टाल दिया। वह मित्र जिसने आपके खर्च करने के तरीके पर, या उस रिश्ते पर, या उस देर रात की आदत पर सवाल उठाया और आप विषय बदल गए। वह बेचैनी जो रविवार को उठती है और सोमवार तक शांत हो जाती है। बुद्धि सुबह के ध्यान में फुसफुसाती नहीं, वह "बाजारों की भीड़ में पुकारती है", यानी वहाँ जहाँ आप वैसे भी हैं। यह पद पूछता है: आप कितनी बार टाल चुके हैं? आज कीजिए यह एक काम: उस आख़िरी सुधार को याद कीजिए जो किसी ने आपसे कहा था और जिसे आपने अनसुना किया, उसका एक वाक्य कागज़ पर लिखिए, और उसे परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़कर कहिए, "यह सच था।"
बारीकी
"यत्न से ढूँढ़ेंगे" वाला इब्रानी शब्द शाहर है, जिसकी जड़ में भोर का विचार है: सुबह होते ही, सबसे पहले, बेचैनी से खोजना। यही शब्द भजनों में उस भक्त के लिए आता है जो प्रभु को तड़के ढूँढ़ता है। तो यह कोई अधूरी, आधे मन की खोज नहीं है। ये लोग सचमुच सुबह-सुबह उठ रहे हैं, सचमुच पूरी शक्ति लगा रहे हैं। और यही बात असहनीय है। पद यह नहीं कहता कि उन्होंने ठीक से नहीं खोजा; वह कहता है कि उन्होंने ग़लत समय पर खोजा। तीव्रता समय की भरपाई नहीं करती। जिस भोर में वे उठ रहे हैं, वह पहले ही आँधी की भोर है।
पहले श्रोता
ये शब्द सबसे पहले उन युवाओं के कानों में पड़े जो यरूशलेम की गलियों में अपना रास्ता चुन रहे थे। पद 11 से 14 की आवाज़ें उनके लिए काल्पनिक नहीं थीं: लूट में हिस्सा, "एक ही बटुआ", तुरंत मिलने वाला पैसा और अपनापन। शहर के फाटक पर बुज़ुर्ग बैठते थे, वहीं न्याय होता था, और बुद्धि ठीक उसी जगह खड़ी होकर बोलती है, जैसे कोई अदालत के दरवाज़े पर चेतावनी टाँग दे। इस्राएल की स्मृति में यह चेतावनी और भारी थी, क्योंकि वे भविष्यद्वक्ताओं को जानते थे जिन्हें बार-बार भेजा गया और बार-बार ठुकराया गया, और फिर निर्वासन आया। यह पद उन्हें राष्ट्र का इतिहास व्यक्तिगत आकार में सुनाता है।
मुख्य पात्र
बुद्धि यहाँ ठंडी नहीं, आहत है। ध्यान दीजिए कि वह पहले क्या करती है: पुकारती है, हाथ फैलाती है, अपनी आत्मा उँडेल देने का वादा करती है। हाथ फैलाना निमंत्रण की मुद्रा है, लगभग गले लगाने की। और यह सब अनसुना रह जाता है। पद 26 की हँसी हमें चौंकाती है, पर वह विजय की हँसी नहीं, वह उस व्यक्ति की हँसी है जिसने सौ बार चेताया और अंत में देखा कि जो कहा गया था वही हुआ। बुद्धि, यानी परमेश्वर की अपनी आवाज़, यहाँ हमें बताती है कि परमेश्वर उदासीन नहीं हैं। उन्होंने पहले बोला। वे लंबे समय तक बोलते रहे। मौन उनका पहला शब्द नहीं, आखिरी है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय बुद्धि किस "चौक" पर खड़ी होकर पुकार रही है, और आप किस बहाने से उस गली से बचकर निकलते हैं?
यदि परमेश्वर का मौन उनकी उदासीनता नहीं बल्कि हमारे बार-बार कहे गए "नहीं" की गूँज है, तो आज आपका "हाँ" किस ठोस बात में दिखाई देगा?
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Proverbs 1:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
नीतिवचन 1:28 का क्या अर्थ है?
नीतिवचन 1:28 किस विषय में है?
नीतिवचन 1:28 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
नीतिवचन 1:28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
नीतिवचन 1:28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Proverbs 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आप हमें पहले से चेतावनी देते हैं, जब बुरे लोग कहते हैं, "हमारे संग चल, हम घात लगाएँ।" धन्यवाद कि आपने हमें ना कहने का साहस दिया, और धन्यवाद कि आप उस निर्दोष की भी रक्षा करते हैं जिसके लिये छिपकर घात लगाई जाती है।
बुद्धि सड़क पर पुकारती रही, और लोग चलते ही रहे। फिर वह दिन आता है: "आँधी के समान तुम पर भय आ पड़ेगा, और बवण्डर के समान विपत्ति आ पड़ेगी।" आँधी अचानक टूटती है, पर बनती धीरे धीरे है। जो चेतावनी तू आज टाल रहा है, वह तेरे विरुद्ध नहीं, तेरे बचाव के लिए दी गई है। सुनने का समय तूफान से पहले होता है।
पिता, मुझे ऐसा जीवन जीना सिखा जो समझ के साथ चले। जहाँ मैं सही और गलत के बीच उलझ जाता हूँ, वहाँ रास्ता दिखा। मेरे फैसलों में ईमानदारी हो, मेरे व्यवहार में न्याय, और किसी के साथ पक्षपात न हो। जब तू सुधारे, तो मुझे सुनने का मन दे।
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