नीतिवचन 13
पाठ
अध्याय 13 विरोधों की एक लम्बी लड़ी है: बुद्धिमान पुत्र जो पिता की शिक्षा सुनता है और ठट्ठा करनेवाला जो घुड़की भी नहीं सुनता; जो अपने मुँह की चौकसी करता है और जो गाल बजाता है; आलसी की खोखली लालसा और कामकाजी की हष्ट-पुष्ट देह; धोखे से कमाया धन जो घटता है और परिश्रम से बटोरा धन जो बढ़ता है। ठीक बीच में एक वाक्य आता है जो कहावत से अधिक कराह जैसा लगता है: "जब आशा पूरी होने में विलम्ब होता है, तो मन निराश होता है, परन्तु जब लालसा पूरी होती है, तब जीवन का वृक्ष लगता है।" और अन्त में तराजू के दोनों पलड़े: धर्मी पेट भर खाता है, दुष्ट भूखा रह जाता है।
मर्म
नीतिवचन का धर्मशास्त्र सृष्टि का धर्मशास्त्र है। परमेश्वर ने संसार को यों बुना है कि शब्द, श्रम, धन और डाँट अपने परिणाम लेकर आते हैं; यह अंधा कर्मफल नहीं, बल्कि उस सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता है जिसने जगत को व्यवस्था के साथ रचा। परन्तु ध्यान दें, पद 13 पूरे अध्याय की जड़ खोल देता है: "जो वचन को तुच्छ जानता, उसका नाश हो जाता है।" बुद्धि कोई कौशल नहीं जो जीवन को साध ले; वह उस परमेश्वर के साथ सम्बन्ध है जो बोलते हैं। और पद 15 में एक शब्द चुपके से आ जाता है जो कहावतों की दुनिया से बड़ा है: अनुग्रह। सुबुद्धि कमाई नहीं जाती, वह मिलती है।
साझा सूत्र
"जीवन का वृक्ष" उत्पत्ति की उस बारी से उठाया गया चित्र है जहाँ से मनुष्य निकाल दिया गया था। पद 12 इसलिए इतना गहरा चुभता है: पूरी हुई आशा अदन का एक टुकड़ा वापस लौटा देती है। बाइबल की पूरी कहानी विलम्बित आशा की कहानी है, इस्राएल पीढ़ियों तक वचन थामे प्रतीक्षा करता रहा। और पद 1 का वह बुद्धिमान पुत्र, जो पिता की शिक्षा सुनता है, अपनी पूर्णता उस एक पुत्र में पाता है जिसने गतसमनी में पिता की इच्छा सुनी जब सुनना ही सबसे कठिन था। जो वचन को तुच्छ जानता है वह नाश होता है; वही वचन देह धारण करके हमारे बीच आया, और उसमें विलम्बित आशा माँस-मज्जा बन गई।
दर्पण
यह अध्याय आपके बटुए और आपकी जीभ पर हाथ रखता है। पद 7 उस आदमी को जानता है जो सम्पन्न दिखता है पर भीतर से खाली है, और पद 11 उस शॉर्टकट को, जिससे आपने सोचा था कि सब सुलझ जाएगा। पद 4 आलसी का चित्र कामचोर का नहीं, इच्छा से भरे उस व्यक्ति का है जो योजनाएँ बनाता है, पोस्ट पढ़ता है, प्रार्थना भी करता है, पर हाथ नहीं चलाता। और पद 12 उस पर उँगली रखता है जिसे आप किसी से नहीं कहते: वह बच्चा जो लौटा नहीं, वह रिपोर्ट जो बदली नहीं, वह प्रार्थना जिसका उत्तर बीस साल से नहीं आया, और मन जो चुपचाप निराश हो गया है। आज एक कागज़ पर वह एक आशा लिखिए जो अब तक पूरी नहीं हुई, और उसे ज़ोर से बोलकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
प्रश्न
पद 25 कहता है धर्मी पेट भर खाता है और दुष्ट भूखा रहता है। पर दो पद पहले यही अध्याय स्वीकार करता है: "निर्बल लोगों को खेती-बारी से बहुत भोजनवस्तु मिलता है, परन्तु अन्याय से उसको हड़प लिया जाता है।" यानी लेखक स्वयं जानता है कि व्यवस्था टूटी हुई है, धर्मी भूखा सो सकता है। तो पद 25 झूठ है? नहीं, वह वादा नहीं, संसार का ढाँचा बता रहा है, और वह ढाँचा पाप से घायल है। नीतिवचन गारंटी नहीं देता, दिशा देता है। पद 24 की छड़ी भी यही कड़वाहट लिए है: प्रेम कभी दुखाता है। इब्रानियों 12 इसे परमेश्वर के अनुशासन पर लागू करता है, पर वह किसी की पीड़ा को सस्ता नहीं बनाता। कुछ भूख इस जीवन में नहीं मिटती; हम प्रतीक्षा में जीते हैं।
संदर्भ
ये कहावतें राजदरबार की छाया में गढ़ी और सिखाई गईं, वहाँ जहाँ युवा पुरुषों को प्रशासन, न्याय और व्यापार के लिए तैयार किया जाता था। पद 17 का "दूत" राजाओं के बीच सन्देश ले जाने वाला अधिकारी है, जिसकी एक गलत बात युद्ध करा सकती थी। पद 8 की "छुड़ौती" उस समाज की सच्चाई है जहाँ धनी अपने प्राण दाम देकर बचा लेता था और निर्धन के पास डराने योग्य कुछ था ही नहीं। पद 22 और 23 खेत की दुनिया हैं: भूमि पीढ़ियों की विरासत थी, परमेश्वर की दी हुई निज भूमि, और शक्तिशाली लोग कर्ज़ और अदालत के ज़ोर से गरीब के खेत हड़प लेते थे। यह आर्थिक सलाह नहीं, वाचा का मामला था।
श्रोताओं का चेहरा
पहले सुननेवालों के कानों में पद 13 का "वचन" कोई सामान्य उपदेश नहीं था, वह व्यवस्था थी, सीनै पर दी गई आज्ञा, और उसके साथ आशीष और शाप का वह दोहरा रास्ता जो व्यवस्थाविवरण में उनके सामने रखा गया था। इसलिए पद 21 और 25 उन्हें कहावत जैसा नहीं, वाचा के भीतर जीवन जैसा सुनाई देता था। पद 22 में नाती-पोतों के लिए छोड़ी सम्पत्ति उनके लिए भावुक बात नहीं थी, बल्कि इस्राएल में परमेश्वर के वादे की निरन्तरता का चिह्न। और पद 20, बुद्धिमानों की संगति, उस समाज में जहाँ पहचान कुल और संगति से बनती थी, जीवन-मरण का चुनाव था, न कि व्यक्तिगत पसंद।
चिंतन
कौन सी विलम्बित आशा आपके मन को चुपचाप निराश कर रही है, और आपने उसे परमेश्वर के सामने कहना कब से छोड़ दिया है?
आप किसकी संगति में बुद्धिमान बन रहे हैं, और आपके जीवन में वह कौन है जिसकी डाँट आप वास्तव में सुनते हैं?
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