भजन संहिता 127
पाठ
रात के पहरेदार की आँखें खुली हैं, दीवार पर कदम गूँज रहे हैं, और भजनकार कहता है: इसका कोई अर्थ नहीं, यदि परमेश्वर स्वयं उस नगर पर पहरा न दें। यही बात घर बनाने वालों पर लागू होती है, और उन पर भी जो भोर से पहले उठते हैं और रात गए तक "कठोर परिश्रम की रोटी" खाते हैं। भजन दो हिस्सों में बँटा है जो पहली नज़र में जुड़े नहीं लगते: पहले तीन पद व्यर्थता और विश्राम की बात करते हैं, अंतिम तीन बच्चों की, जिन्हें कवि "यहोवा के दिए हुए भाग" कहता है, वीर के हाथ के तीरों जैसे, और उस मनुष्य को धन्य कहता है जिसका तरकश उनसे भरा हो। बीच में एक चुपचाप रखी हुई कड़ी है: वह जो कुछ बनाता है, वही देता भी है।
मर्म
यह भजन आलस्य की वकालत नहीं करता। घर बनाने वाले बनाते ही रहते हैं, पहरेदार जागता ही रहता है; भजनकार उनसे काम छोड़ने को नहीं कहता। वह केवल यह कहता है कि परिश्रम अपने आप में कुछ उत्पन्न नहीं करता। हिब्रू का शब्द जो यहाँ "व्यर्थ" के लिए आया है, शाव, खोखलेपन की ध्वनि रखता है, वह चीज़ जो भरी हुई दिखती है पर भीतर से हवा है। और फिर आती है वह पंक्ति जो सबसे कठिन है: "वह अपने प्रियों को यों ही नींद प्रदान करता है।" नींद यहाँ पुरस्कार नहीं, प्रमाण है, कि सृष्टि आपके जागते रहने पर टिकी नहीं है। जो सो सकता है, वह मान चुका है कि वह परमेश्वर नहीं है। यही इस भजन का धार्मिक हृदय है, और यही इसका सबसे कड़वा घूँट भी।
सूत्र
यह भजन "घर" शब्द के साथ खेलता है, और वहीं इसका सबसे गहरा सूत्र छिपा है। इब्रानी में घर का अर्थ केवल दीवारें नहीं, वंश भी है। इसीलिए पहला भाग निर्माण की बात करता है और दूसरा संतान की; वे दो विषय नहीं, एक ही विषय के दो चेहरे हैं। और यहीं पुराने नियम की वह बड़ी कहानी प्रतिध्वनित होती है जब दाऊद ने परमेश्वर के लिए एक भवन बनाना चाहा और उत्तर मिला कि परमेश्वर स्वयं दाऊद के लिए एक घराना खड़ा करेंगे। मनुष्य ईंटें जोड़ना चाहता है, परमेश्वर पीढ़ियाँ जोड़ते हैं। मसीह उसी घराने से आते हैं, और वे भी कहते हैं कि कलीसिया उनका काम है, हमारा नहीं। हम राजमिस्त्री हैं; वास्तुकार कोई और है।
दर्पण
यह भजन उस जगह पर उँगली रखता है जहाँ हममें से अधिकांश दुखते हैं: उस भीतरी आवाज़ पर जो कहती है कि अगर मैंने हाथ ढीला किया तो सब ढह जाएगा। इसीलिए आप सुबह पाँच बजे जागते हैं, इसीलिए फ़ोन बिस्तर तक साथ आता है, इसीलिए बच्चों की परवरिश एक परियोजना बन गई है जिसका परिणाम आपकी योग्यता का प्रमाणपत्र है। भजनकार आपकी मेहनत को गाली नहीं देता, वह उसके नीचे छिपे भय को उघाड़ता है। "कठोर परिश्रम की रोटी" स्वादहीन होती है, क्योंकि उसमें कृतज्ञता नहीं, केवल आत्मरक्षा होती है। आज रात सोने से पहले एक कागज़ पर वह एक चिंता लिखिए जो आपको जगाए रखती है, उसके नीचे लिखिए "यह घर मेरा बनाया हुआ नहीं है", और कागज़ को मोड़कर रख दीजिए।
अंतर्पाठ
भजन 121 कहता है कि इस्राएल का रक्षक न ऊँघता है न सोता है। उसे इस भजन के साथ रखिए और तस्वीर पूरी हो जाती है: परमेश्वर जागते हैं, इसलिए आप सो सकते हैं। नींद अविश्वास नहीं, विश्वास का सबसे नाज़ुक रूप है। और नए नियम में वही चित्र मांस-मज्जा में उतरता है, जब तूफ़ान में डूबती नाव के भीतर यीशु तकिये पर सोते मिलते हैं और शिष्य घबराकर उन्हें जगाते हैं। शिष्य जाग रहे थे और डर रहे थे; वे सो रहे थे और डरे हुए नहीं थे। उस दृश्य को भजन 127 की रोशनी में पढ़िए और सवाल बदल जाता है: नाव में कौन सही जगह पर था?
मुख्य पात्र
इस भजन का असली पात्र वह है जो कहीं दिखाई नहीं देता। परमेश्वर मंच पर नहीं आते; वे निर्माण करते हैं पर हथौड़े की आवाज़ नहीं आती, वे पहरा देते हैं पर दीवार पर कोई पदचाप नहीं। उनका काम इतना छिपा हुआ है कि हम उसे अपना समझ बैठते हैं, और यही इस भजन की शिकायत है। वे जो देते हैं, वह भी छिपकर देते हैं: नींद, जो बेहोशी में मिलती है; गर्भ का फल, जो किसी के नियंत्रण में नहीं। ध्यान दीजिए कि पद 3 में बच्चे उपलब्धि नहीं, "भाग" कहे गए हैं, वह हिस्सा जो कनान में हर गोत्र को बाँटकर मिला था। मिला हुआ, कमाया हुआ नहीं। परमेश्वर का चरित्र यहाँ देने वाले का है, और देने वाला हमेशा हमारे हिसाब से बेहिसाब होता है।
प्रश्न
पर तब उनका क्या, जिनका तरकश खाली है? जिन्होंने वर्षों प्रार्थना की और गर्भ नहीं ठहरा, या ठहरा और चला गया? यह भजन उनके सामने बड़ी बेरहमी से खड़ा हो जाता है, और उसे मीठा बनाकर परोसना बेईमानी होगी। मैं यह नहीं कहूँगा कि "बच्चों" का अर्थ आत्मिक संतान है; भजनकार का मतलब असली बच्चे हैं, फाटक पर खड़े जवान बेटे। पर मैं यह ज़रूर कहूँगा कि यदि संतान भाग है, प्रतिफल नहीं, तो उसका अभाव दंड भी नहीं। यह भजन आशीष का गीत है, न्याय का नियम नहीं। और जो खाली हाथ इसे पढ़ता है, वह कम से कम एक बात इसके साथ बाँट सकता है: दोनों जानते हैं कि जीवन बनाया नहीं जाता, दिया जाता है। बाकी रहस्य है, और रहस्य को समझाया नहीं जाता, उसके सामने बैठा जाता है।
चिंतन
आपकी नींद की आदतें आपके परमेश्वर के बारे में क्या बताती हैं, न कि आपके कार्यक्रम के बारे में?
जिन लोगों को आप अपना "भाग" कहते हैं, क्या आप उन्हें उपहार की तरह देखते हैं या उस परियोजना की तरह जिसका परिणाम आपकी साख है?
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Psalms 127 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 127 का क्या अर्थ है?
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