भजन संहिता 133:1
पाठ
भजनकार एक उँगली उठाकर कहता है: "देखो, यह क्या ही भली और मनोहर बात है कि भाई लोग आपस में मिले रहें!" वह कोई आज्ञा नहीं देता, न कोई उपदेश; वह एक दृश्य की ओर इशारा करता है, जैसे कोई मित्र आपकी बाँह पकड़कर कहे, "ज़रा उधर देखिए।" और जो वह दिखाता है, वह भाइयों का एक साथ बना रहना है, जिसे वह दो चित्रों से बाँधता है: हारून के सिर पर उमड़ता अभिषेक का तेल, जो दाढ़ी से बहकर वस्त्र की छोर तक पहुँचता है, और हेर्मोन की ओस, जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है। वहीं, इस बहते और गिरते हुए के बीच, "यहोवा ने तो वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है।" एकता यहाँ उपलब्धि नहीं, उपहार है।
मूल बात
इस पद की धार वहाँ है जहाँ हम प्रायः नहीं देखते: "भाई" शब्द बाइबल में शांति का पर्याय नहीं है। उत्पत्ति की पुस्तक भाइयों के टूटने का इतिहास है, कैन और हाबिल से लेकर याकूब और एसाव तक, और यूसुफ के उन भाइयों तक जो उसे गड्ढे में डाल देते हैं। इसलिए जब भजनकार भाइयों के मिले रहने पर आश्चर्य करता है, तो वह किसी स्वाभाविक बात की प्रशंसा नहीं कर रहा, बल्कि एक चमत्कार की ओर उँगली उठा रहा है। और ध्यान दें कि पद की गति ऊपर से नीचे है: तेल सिर से वस्त्र तक बहता है, ओस आकाश से पहाड़ों पर गिरती है। एकता मनुष्यों के प्रयास से ऊपर नहीं चढ़ती; वह परमेश्वर के आशीर्वाद से नीचे उतरती है। यही कारण है कि इसके अंत में "सदा के जीवन" की बात आती है और मनुष्य की मेहनत की नहीं।
मुख्य सूत्र
हारून का तेल कोई सजावटी उपमा नहीं है। वह याजक के अभिषेक का तेल है, जिसे परमेश्वर ने निवासस्थान की सेवा के लिए ठहराया था, और भजनकार कहता है कि वह सिर से दाढ़ी से बहकर "उसके वस्त्र की छोर तक" पहुँचा। अभिषेक एक व्यक्ति पर होता है, पर वह एक पर रुकता नहीं; वह पूरे शरीर तक बहता है। यहीं से यह भजन आगे की ओर झुकता है। यूहन्ना 17 में यीशु अपनी मृत्यु से पहले जो प्रार्थना करते हैं, वह ठीक यही माँगती है: कि उनके लोग एक हों, जैसे पिता और पुत्र एक हैं। और वह एकता वे अपने शिष्यों से उत्पन्न करने को नहीं कहते, वह उन्हें दी जाती है। मसीह वह सिर हैं जिन पर आत्मा का अभिषेक उतरा, और वह अभिषेक वस्त्र की छोर तक, अर्थात कलीसिया के अंतिम सदस्य तक, बहता है। भजन 133 उस दिन की गंध है जो पिन्तेकुस्त में फूट पड़ी।
दर्पण
यह पद हमारे उन घावों पर हाथ रखता है जिन्हें हम आदरणीय नाम देकर छिपा लेते हैं। पिता की मृत्यु के बाद ज़मीन के बँटवारे में जो चुप्पी पड़ी, उसे हम "सिद्धांत" कहते हैं। कलीसिया की सभा में जिस भाई से हम आँख नहीं मिलाते, उसे हम "मतभेद" कहते हैं। पारिवारिक समूह में जिस बहन का संदेश हम बिना उत्तर छोड़ देते हैं, उसके लिए हमारे पास बहुत उचित कारण हैं। भजनकार हमारे कारणों से नहीं उलझता; वह केवल दिखाता है कि जहाँ भाई मिले रहते हैं, वहाँ परमेश्वर ने जीवन ठहराया है, और परोक्ष रूप से यह भी कि जहाँ हम अलग बैठते हैं, वहाँ हम स्वयं को उस आशीष से बाहर बिठा लेते हैं।
आज एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपका मिलना टूट गया है, और उस नाम के नीचे लिखिए: "यहोवा ने तो वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
मुख्य पात्र
ध्यान दीजिए कि इस भजन में परमेश्वर क्या नहीं करते। वे एकता की आज्ञा नहीं देते, न उसे शर्त बनाते हैं। वे "आशीष ठहराते" हैं, और वह क्रिया सम्राटों की भाषा है, किसी आदेश की घोषणा जैसी। परमेश्वर एक स्थान चुनते हैं और वहाँ जीवन नियुक्त कर देते हैं। और वह स्थान मंदिर की कोई कोठरी नहीं, बल्कि वह जगह है जहाँ भाई साथ बने रहते हैं। यह परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ असुविधाजनक कहता है: वे अलग-अलग भक्तों के बीच नहीं, बल्कि जुड़े हुए लोगों के बीच बसना पसंद करते हैं। जो व्यक्ति कहता है कि वह परमेश्वर से अकेले में ही मिल लेगा, वह उन्हें वहाँ खोज रहा है जहाँ उन्होंने रहने का वादा नहीं किया।
पहले श्रोता
यह "यात्रा का गीत" है, उन भजनों में से एक जो यरूशलेम की ओर चढ़ते तीर्थयात्री गाते थे। कल्पना कीजिए: गोत्रों के लोग अलग-अलग दिशाओं से आ रहे हैं, कुछ हेर्मोन के उत्तरी ढलानों से, कुछ दक्षिण के सूखे गाँवों से, और पर्व के दिनों में वे एक ही आँगन में, एक ही तंबू के पास, साथ खाते-सोते हैं। ये लोग जानते थे कि इसराएल का इतिहास भाइयों के फूटने का इतिहास है: दस गोत्र उत्तर में, दो दक्षिण में, एक ही वंश दो राज्यों में बँटा हुआ। उनके कानों में "भाई लोग आपस में मिले रहें" कोई भावुक कामना नहीं थी, बल्कि वर्ष में कुछ दिनों के लिए मिला हुआ वह अनुभव जिसमें राजनीति ने जो तोड़ा था, आराधना उसे जोड़ देती थी।
एक बारीकी
"मिले रहें" के पीछे इब्रानी में एक ऐसा मुहावरा है जिसका अर्थ है "एक साथ बसना", अर्थात एक ही भूमि पर, एक ही विरासत में रहना। यह भाषा उत्पत्ति 13 से आती है, जहाँ अब्राम और लूत की चरवाही में झगड़ा हो जाता है और उन्हें अलग होना पड़ता है, क्योंकि भूमि उन दोनों को साथ नहीं सँभाल सकती थी। साथ बसने की असमर्थता संपत्ति का प्रश्न थी: जब आशीष बढ़ती है, तो जगह घटती लगती है। भजन 133 उसी गाँठ को उलट देता है। यहाँ साथ बसना ही आशीष का स्थान बन जाता है, और जो बहता है वह पानी के कुएँ पर लड़ाई नहीं, बल्कि ऊपर से उतरता तेल और ओस है। कमी का डर ही भाइयों को अलग करता है; और भजनकार कहता है, ऊपर देखो, कमी नहीं है।
चिंतन के प्रश्न
जिस टूटे रिश्ते को आपने "व्यावहारिक निर्णय" कहकर स्वीकार कर लिया है, उसे इस भजन के प्रकाश में आप किस नाम से पुकारेंगे?
यदि एकता नीचे से चढ़ती नहीं बल्कि ऊपर से उतरती है, तो आपकी प्रार्थना और आपके प्रयास में क्या बदलना चाहिए?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
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Psalms 133:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 133:1 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 133:1 किस विषय में है?
भजन संहिता 133:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 133:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 133:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 133 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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