भजन संहिता 133
पाठ
तीर्थयात्रियों के गीतों की इस माला में यह भजन एक छोटी, लगभग फुसफुसाती हुई पुकार है: "देखो, यह क्या ही भली और मनोहर बात है कि भाई लोग आपस में मिले रहें!" कवि इस मेल की तुलना दो चीज़ों से करता है, जो दोनों ऊपर से नीचे बहती हैं। पहली, वह अभिषेक का तेल जो हारून के सिर पर उड़ेला गया और दाढ़ी से बहकर वस्त्र की छोर तक पहुँचा। दूसरी, हेर्मोन की ओस, जो उत्तर के ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ से उतरकर सिय्योन की सूखी ढलानों पर गिरती है। और अंत में वह कारण बताता है: वहीं, उस मेल के स्थान पर, "यहोवा ने तो वहीं सदा के जीवन की आशीष ठहराई है।" तीन पद, एक साँस, एक चित्र।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि भजनकार भाईचारे को कर्तव्य नहीं, बल्कि आशीष का पात्र कहता है। वह यह नहीं कहता कि मिले रहने से आशीष कमाई जाती है; वह कहता है कि जहाँ मेल है, वहाँ परमेश्वर ने अपनी आशीष ठहरा दी है। तेल और ओस, दोनों नीचे की ओर बहते हैं, कोई भी नीचे से ऊपर नहीं चढ़ता। यही इस भजन का धर्मशास्त्र है: एकता मनुष्यों की उपलब्धि नहीं, ऊपर से उतरता उपहार है, जिसमें मनुष्य ठहरे रह सकते हैं या जिससे बाहर निकल सकते हैं। और यह छोटी बात नहीं है। इस्राएल का इतिहास भाइयों के बिगड़ने का इतिहास है, कैन से लेकर यूसुफ के भाइयों तक, राज्य के दो टुकड़े होने तक। इसलिए जब कवि "देखो" कहता है, तो वह किसी स्वाभाविक बात की ओर नहीं, बल्कि एक चमत्कार की ओर उँगली उठाता है, जिसमें सदा का जीवन बहता है।
जोड़ने वाला धागा
तेल हारून पर उँडेला गया, और वह महायाजक था, पूरे लोगों का प्रतिनिधि। जो अभिषेक एक सिर पर होता है, वह दाढ़ी से बहकर वस्त्र की छोर तक जाता है, यानी एक व्यक्ति का अभिषेक पूरे शरीर को ढँक लेता है। यह चित्र बिना खींचतान के मसीह तक पहुँचता है, क्योंकि "मसीह" शब्द का अर्थ ही अभिषिक्त है। नया नियम उसी तर्क पर चलता है: सिर पर जो उँडेला गया, वह देह के अंतिम छोर तक पहुँचता है। पिन्तेकुस्त के दिन जो आत्मा उतरा, उसने बिखरी हुई भाषाओं को एक कमरे में जोड़ दिया। कलीसिया की एकता इसलिए सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि अभिषेक का रिसाव है। और भजन का अंत, "सदा के जीवन की आशीष", वहीं जाकर पूरा होता है जहाँ मसीह अपने लोगों को अनन्त जीवन देते हैं।
दर्पण
हम मेल को अक्सर तब तक भला मानते हैं जब तक उसकी कीमत हमारी सुविधा से कम हो। परिवार में वह चाचा जिससे ज़मीन के बँटवारे के बाद बात बंद है; कलीसिया में वह व्यक्ति जिसने आपकी सेवा पर टिप्पणी की थी और आप अब जानबूझकर दूसरी पंक्ति में बैठते हैं; दफ़्तर में वह सहकर्मी जिसकी तरक्की आपको आज भी चुभती है। हम इन दूरियों को सिद्धांत का नाम दे देते हैं, "मैं सच्चाई पर खड़ा हूँ", जबकि असल में वे चोट और अहंकार हैं। भजनकार कहता है, देखो। यानी आँख उठाकर देखो कि तुम्हारी दूरी के कारण क्या नहीं बह रहा। तेल ऊपर से नीचे बहता है; झुकना उसकी दिशा है।
आज ही उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिससे आपने चुपचाप दूरी बना ली है, और उसके नाम पर ज़ोर से, बोलकर परमेश्वर से आशीष माँगिए। लिखना और बोलना, दोनों।
मुख्य पात्र
इस भजन में मुख्य पात्र न दाऊद है, न हारून, बल्कि वह परमेश्वर हैं जो आशीष "ठहराते" हैं। यह क्रिया आकस्मिक नहीं है; इसमें निर्णय है, नियुक्ति है, मानो कोई राजा अपने आदेश पर मुहर लगा रहा हो। परमेश्वर यहाँ एकता की प्रशंसा करने वाले दर्शक नहीं, बल्कि वह स्रोत हैं जिनसे तेल और ओस दोनों उतरते हैं। और ध्यान दीजिए कि वे कितने उदार हैं: तेल सिर पर रुकता नहीं, वह वस्त्र की छोर तक जाता है, जहाँ शायद कोई नहीं देखता। ओस भी चुपचाप गिरती है, रात में, बिना किसी के देखे। यही परमेश्वर का स्वभाव है, फैलना, नीचे तक पहुँचना, सूखी जगह को जीवित रखना। वे कंजूस नहीं हैं; हम ही अपने दरवाज़े बंद रखते हैं।
पहले सुननेवाले
इसे गाने वाले थके हुए तीर्थयात्री थे। पर्व के दिनों में यरूशलेम की आबादी कई गुना बढ़ जाती थी। कल्पना कीजिए: धूल भरी सड़कें, गलियों में भेड़-बकरियों और बलि की गंध, छतों पर सोते हुए अजनबी, कुओं पर पानी के लिए भीड़, और अलग-अलग गोत्रों की अलग बोलियाँ। ये लोग साल भर एक-दूसरे से दूर, कभी-कभी झगड़ते हुए रहते थे; सीमा के विवाद, चरागाह के झगड़े, उत्तर और दक्षिण की पुरानी कड़वाहट। और अब वे एक ही आँगन में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। ऐसे में "भाई लोग आपस में मिले रहें" कोई भावुक वाक्य नहीं था, बल्कि एक असंभव-सी वास्तविकता का आश्चर्य, जो साल में कुछ दिनों के लिए सच होती थी और जिसे देखकर गला भर आता था।
एक बारीकी
"हेर्मोन की ओस, जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है" भूगोल की दृष्टि से असंभव है। हेर्मोन उत्तर में है, लगभग दो सौ किलोमीटर दूर, बर्फ़ से ढका, नमी से भारी। सिय्योन दक्षिण में, सूखा, पथरीला, जहाँ गर्मियों में महीनों बारिश नहीं होती। ओस इतनी दूर यात्रा नहीं करती। पर कवि ठीक यही चाहता है कि आप ठिठक जाएँ। वह कह रहा है: जब भाई मिलकर रहते हैं, तो कुछ ऐसा होता है जो भूगोल तोड़ देता है, उत्तर की ताज़गी दक्षिण की सूखी ज़मीन पर उतर आती है। फ़िलिस्तीन के किसान के लिए ओस जीवन-मरण का प्रश्न थी; बिना वर्षा के महीनों में वही फ़सल बचाती थी। एकता कोई सजावट नहीं, वह वही नमी है जिसके बिना समुदाय सूखकर मर जाता है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सी "सिय्योन की सूखी ढलान" है, कौन-सा रिश्ता या समूह, जहाँ आप मानते हैं कि अब ओस नहीं गिर सकती?
तेल सिर से बहकर वस्त्र की छोर तक गया। आप किस जगह पर "छोर" हैं, यानी कहाँ आपको बस मिली हुई आशीष को आगे बहने देना है, बिना उसे रोके?
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