भजन संहिता 30
पाठ
एक आदमी गहरे कुएँ से खींचकर बाहर निकाला गया है, और पहली साँस के साथ ही उसके मुँह से गीत फूट पड़ता है: "मैं तुझे सराहूँगा क्योंकि तूने मुझे खींचकर निकाला है।" वह बताता है कि वह मौत के इतने पास था कि कब्र की मिट्टी उसे छू रही थी, और परमेश्वर ने उसे वहाँ से लौटा लिया। फिर वह रुककर अपनी पुरानी आत्मतुष्टि को याद करता है, "मैं कभी नहीं टलने का", और स्वीकारता है कि जब परमेश्वर ने मुख फेरा तो वह घबरा गया। अन्त में वह उस बदलाव पर ठहरता है जिसका कोई हिसाब उसके पास नहीं: टाट उतर गया, कमर में आनन्द का पटुका बँध गया, विलाप नृत्य बन गया।
मर्म
इस भजन के केन्द्र में एक वाक्य है जिसे हम बहुत जल्दी पार कर जाते हैं: "उसका क्रोध, तो क्षण भर का होता है, परन्तु उसकी प्रसन्नता जीवन भर की होती है।" यह क्रोध को झुठलाता नहीं। भजनकार यह नहीं कहता कि परमेश्वर कभी मुख नहीं फेरते; वह कहता है कि उन्होंने फेरा, और वह घबरा गया। पर वह क्रोध और अनुग्रह को एक ही तराजू पर नहीं तौलता। एक क्षण का है, दूसरा जीवन भर का। यहाँ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ कहा जा रहा है, न कि केवल एक अनुभव के बारे में: उनका झुकाव, उनकी स्थायी मुद्रा, दया है। और मनुष्य के बारे में भी कुछ कहा जा रहा है, कि हमारी सुरक्षा कभी हमारी अपनी नहीं थी, चाहे हमने कितनी बार "मैं कभी नहीं टलने का" कहा हो। वह पहाड़ दृढ़ था, पर उसकी दृढ़ता उधार की थी।
सूत्र
नौवें पद में भजनकार परमेश्वर के सामने एक अजीब सा तर्क रखता है: "क्या मिट्टी तेरा धन्यवाद कर सकती है?" उसकी प्रार्थना का आधार यह है कि मरे हुए लोग स्तुति नहीं कर सकते, इसलिए उसे जीवित रखना परमेश्वर के अपने हित में है। यह पुराने नियम की सीमा है, वह क्षितिज जहाँ तक उस समय दृष्टि जाती थी। और ठीक यहीं इस भजन में एक दरार खुलती है जिसे बाद का इतिहास भरता है। एक ऐसा भी हुआ जो सचमुच कब्र में उतरा, जिसकी देह मिट्टी में रखी गई, और जिसका मुँह फिर भी बन्द नहीं रहा। "सवेरे आनन्द पहुँचेगा" इस भजन में एक अनुभव है; ईस्टर की सुबह वही वाक्य इतिहास की एक घटना बन जाता है। मैं इसे ज़बरदस्ती नहीं जोड़ रहा; मैं केवल कह रहा हूँ कि भजनकार की आशा उसकी अपनी कल्पना से बड़ी निकली।
दर्पण
"मैंने तो अपने चैन के समय कहा था, कि मैं कभी नहीं टलने का।" यह वाक्य किसी नास्तिक का नहीं, एक भक्त का है। ऐसा आदमी जिसकी नौकरी चल रही थी, जिसकी रिपोर्ट सामान्य आ रही थी, जिसके बच्चे ठीक थे, और जिसने इस स्थिरता को अपनी धार्मिकता का प्रमाण समझ लिया। हम भी यही करते हैं। बचत खाते में पड़ा पैसा, शरीर की ताकत, घर में बना हुआ संतुलन, ये धीरे-धीरे हमारे भीतर एक चुपचाप का विश्वास बना देते हैं जो परमेश्वर पर नहीं, व्यवस्था पर टिका है। और फिर एक फ़ोन कॉल आती है, और पता चलता है कि पहाड़ हमारा नहीं था।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसके कारण आजकल आप भीतर से सुरक्षित महसूस करते हैं, और उसके नीचे पद सात ज़ोर से पढ़िए, "अपनी प्रसन्नता से तूने मेरे पहाड़ को दृढ़ और स्थिर किया था।"
एक बारीकी
ग्यारहवें पद की क्रियाओं पर ठहरिए: "तूने मेरा टाट उतरवाकर मेरी कमर में आनन्द का पटुका बाँधा है।" शोक करनेवाला अपना टाट खुद नहीं खोलता। कोई और उसके कपड़े बदलता है। यह छोटी सी बात पूरे भजन का भार उठाती है, क्योंकि दुःख में आदमी की सबसे बड़ी लाचारी यही है कि वह अपने आप को समझा नहीं सकता, ढाँढ़स बँधा नहीं सकता, बाहर नहीं निकाल सकता। भजनकार यह नहीं कहता कि उसने सकारात्मक सोचना सीख लिया। वह कहता है कि उसे कपड़े पहनाए गए, जैसे किसी बीमार को कोई नहलाकर तैयार कर देता है। आनन्द यहाँ एक उपलब्धि नहीं, एक पोशाक है, और वह किसी और के हाथों से आती है।
पृष्ठभूमि
यह भजन धन्यवाद के एक सार्वजनिक क्षण से निकला है, उस परम्परा से जिसमें बचाया गया व्यक्ति मन्दिर में बलि लेकर आता और लोगों के बीच खड़े होकर बताता कि उसके साथ क्या हुआ। इसीलिए पद चार में अचानक "तुम" आ जाता है: वह अकेले नहीं गा रहा, वह मण्डली को बुला रहा है। प्राचीन इस्राएल में लम्बी बीमारी केवल शारीरिक संकट नहीं थी; वह सामाजिक मृत्यु थी। बीमार आदमी उपासना से कट जाता था, और लोग मान लेते थे कि परमेश्वर ने उससे मुँह फेर लिया है। शत्रुओं का "आनन्द" इसी का नाम है, पड़ोसियों की वह फुसफुसाहट जो कहती है कि देखो, इसकी भक्ति काम नहीं आई। लौटना इसलिए दोहरा लौटना था: जीवन में भी, और समुदाय में भी।
पहले सुननेवाले
जो लोग यह गीत पहली बार आँगन में खड़े होकर सुन रहे थे, उन्होंने टाट सचमुच देखा था। उन्होंने राख में बैठे लोगों को देखा था, बाल नोचते हुए विधवाओं को देखा था, और वे जानते थे कि शोक का कोई निजी कोना नहीं होता, वह शरीर पर पहना जाता है। इसलिए जब गायक ने कहा कि पटुका बदल गया, तो उन्होंने कोई रूपक नहीं सुना; उन्होंने एक ऐसे आदमी को देखा जो पिछले महीने चीथड़ों में था और आज साफ़ कपड़ों में उनके सामने खड़ा है। और उनके भीतर वही सवाल उठा जो हमारे भीतर उठता है, कि क्या मेरे साथ भी ऐसा हो सकता है। भजन इसका उत्तर वादे से नहीं, गवाही से देता है।
चिन्तन के प्रश्न
आपके जीवन में वह "चैन का समय" कौन सा था जिसमें आपने बिना कहे मान लिया था कि अब कुछ नहीं हिलेगा, और उसके बाद क्या हुआ?
अगर आनन्द एक पोशाक है जो कोई और पहनाता है, तो आज आप किसे उसका टाट उतारने में मदद कर सकते हैं?
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