बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 31

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

"मैं मृतक के समान लोगों के मन से बिसर गया; मैं टूटे बर्तन के समान हो गया हूँ" (पद 12). यह भजन एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ है जो चट्टान और गढ़ की भाषा में प्रार्थना शुरू करता है, फिर अपने घुलते शरीर, बदनाम नाम और भागते पड़ोसियों का बयान करता है, और अन्त में परमेश्वर की "अद्भुत करुणा" पर आश्चर्य करता हुआ दूसरों को हियाव बाँधने के लिए बुलाता है। बीच में वह एक वाक्य कहता है जो सदियों तक गूँजता रहा: "मैं अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौंप देता हूँ।" भरोसा, टूटन, फिर भरोसा; यह क्रम सीधा नहीं, गोल-गोल घूमता हुआ है, जैसा दुःख में प्रार्थना सचमुच होती है।

मर्म

यह भजन हमें सिखाता है कि भरोसा संकट का इलाज नहीं, संकट के भीतर रहने का ढंग है। पद 8 में पाँव चौड़े स्थान में खड़े हैं, और पद 9 में वही व्यक्ति कहता है कि आँखें, प्राण और शरीर शोक के मारे घुले जा रहे हैं। कौन-सा सच है? दोनों। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता अनुभव की अदला-बदली से नहीं, उनके नाम से बँधी है: "अपने नाम के निमित्त मेरी अगुआई कर।" भजनकार अपनी धार्मिकता पर दावा नहीं ठोंकता; वह पद 10 में अपने अधर्म को भी मान लेता है। जो बचाता है वह प्रार्थी की योग्यता नहीं, बल्कि वह परमेश्वर है जो "विश्वासयोग्य" कहलाते हैं और जिन्होंने "मोल लेकर मुक्त किया।" यही अनुग्रह की ठोस ज़मीन है।

जोड़नेवाला सूत्र

पद 5 को यीशु मसीह ने क्रूस पर अपनी अन्तिम साँस के साथ दोहराया (लूका 23:46)। यह संयोग नहीं; वे इस भजन के भीतर से मर रहे थे। जिस व्यक्ति से "जान-पहचानवाले" डरते हैं, जिसके विरुद्ध लोग "आपस में सम्मति" करते हैं, जिसकी निन्दा चारों ओर से सुनाई देती है, उसका पूरा चित्र गतसमनी से गुलगुता तक खिंचा हुआ है। पर ध्यान दीजिए: मसीह ने इस भजन का वह हिस्सा नहीं छोड़ा जिसमें शत्रुओं के विरुद्ध पुकार है; उन्होंने उसे पिता के हाथों में सौंप दिया। इसलिए यह भजन हमें सिखाता है कि अपनी पीड़ा को मसीह के शब्दों में ढालना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि अपने स्थान को पहचानना है: हम उनके पीछे, उसी गढ़ में।

दर्पण

यह भजन उस डर को खोलकर रख देता है जिसे हम शायद ही नाम देते हैं: बेइज़्ज़त हो जाने का डर। "मुझे कभी लज्जित होना न पड़े" किसी बीमार या सताए हुए की ही नहीं, उस व्यक्ति की भी प्रार्थना है जिसके दफ़्तर में उसके बारे में बातें होती हैं, जिसका कोई निर्णय परिवार में उलटा पड़ गया, जिसे मित्रों ने धीरे-धीरे किनारे कर दिया। पद 11 का सबसे कड़वा हिस्सा शत्रु नहीं, पड़ोसी हैं। और पद 22 हमारी सबसे ईमानदार घबराहट बोल देता है: "मैं यहोवा की दृष्टि से दूर हो गया।" भजनकार इस वाक्य को छिपाता नहीं, उसे प्रार्थना के भीतर ले आता है। आज रात सोने से पहले, एक ऐसी चीज़ का नाम लीजिए जो पूरी तरह आपके वश के बाहर है, और उसे होंठों से ज़ोर से कहते हुए जोड़िए: "मैं अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौंप देता हूँ।"

मुख्य पात्र

इस भजन में परमेश्वर का चित्र दो विपरीत छवियों में खिंचता है। एक ओर वे पत्थर हैं: चट्टान, गढ़, "गढ़वाले नगर।" दूसरी ओर वे एक झुका हुआ चेहरा हैं: "अपना कान मेरी ओर लगाकर", "अपने मुँह का प्रकाश चमका।" जो अटल है, वही निकट झुकता है; जो दुर्ग है, वही सुनता है। और पद 20 में वे शरण देनेवाले मेज़बान बन जाते हैं, "अपने मण्डप में" छिपा लेनेवाले। यह कोई दूर बैठा न्यायी नहीं जिसे मनाना पड़े, बल्कि वह परमेश्वर हैं जिन्होंने पहले ही भलाई "रख छोड़ी है" अपने डरवैयों के लिए। भजनकार की आत्मा डोलती है, पर परमेश्वर का चरित्र नहीं डोलता; इसीलिए प्रार्थना सम्भव है।

एक बारीकी

पद 20 का "गुप्त स्थान" रुककर देखने लायक है। बचाव यहाँ शत्रुओं के नाश से नहीं, छिपाए जाने से आता है। शब्द में एक पर्दा है, एक ओट, जहाँ "मनुष्यों की बुरी गोष्ठी" की आवाज़ भीतर नहीं आती। सोचिए: ज़बानों की मार से बचने का उपाय जवाब देना नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने ऐसी जगह पा जाना है जहाँ उनका मुँह का प्रकाश आपके ऊपर है और बाकी आवाज़ें बाहर रह जाती हैं। यह पलायन नहीं; शत्रु अब भी बाहर हैं। पर भजनकार जानता है कि किसी की पहचान वहाँ तय होती है जहाँ वह सबसे गहरे देखा जाता है, और वहाँ निन्दा की कोई पहुँच नहीं।

पहले सुननेवाले

जो लोग यह भजन मन्दिर में गाते थे, वे ऐसे समाज में जीते थे जहाँ इज़्ज़त जीवन की पूँजी थी। बदनामी का अर्थ था व्यापार का टूटना, रिश्तों का बन्द होना, न्याय में अकेले खड़े रहना। पद 11 का "जो मुझ को सड़क पर देखते हैं वह मुझसे दूर भाग जाते हैं" उनके लिए मुहावरा नहीं, रोज़ का दृश्य था, शायद किसी कोढ़ी या कर्ज़ में डूबे पड़ोसी का। "टूटा बर्तन" उनके घरों के बाहर कूड़े में सचमुच पड़ा रहता था, ऐसी चीज़ जिसकी मरम्मत कोई नहीं कराता। और फिर भी वे गाते थे कि यहोवा "विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा करता है।" अन्तिम पद किसी निजी तसल्ली नहीं, पूरी मण्डली को दिया गया आदेश है: "हियाव बाँधो।"

मनन के प्रश्न

पद 8 की "चौड़े स्थान" की गवाही और पद 9 के घुलते प्राण के बीच, आज आप कहाँ खड़े हैं, और क्या आप दोनों बातें एक ही प्रार्थना में कहने को तैयार हैं?

"मैं यहोवा की दृष्टि से दूर हो गया" कहने के बाद भी भजनकार ने पुकारना नहीं छोड़ा। आपकी घबराहट का कौन-सा वाक्य अब तक प्रार्थना से बाहर खड़ा है?

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Psalms 31 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 31 का क्या अर्थ है?
"मैं मृतक के समान लोगों के मन से बिसर गया; मैं टूटे बर्तन के समान हो गया हूँ" (पद 12). यह भजन एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ है जो चट्टान और गढ़ की भाषा में प्रार्थना शुरू करता है, फिर अपने घुलते शरीर, बदनाम नाम और भागते पड़ोसियों का बयान करता है, और अन्त में परमेश्वर की "अद्भुत करुणा" पर आश्चर्य करता हुआ दूसरों को हियाव बाँधने के लिए बुलाता है। बीच में वह एक वाक्य कहता है जो सदियों तक गूँजता रहा: "मैं अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौंप देता हूँ।" भरोसा, टूटन, फिर भरोसा; यह क्रम सीधा नहीं, गोल-गोल घूमता हुआ है, जैसा दुःख में प्रार्थना सचमुच होती है।
भजन संहिता 31 किस विषय में है?
पद 5 को यीशु मसीह ने क्रूस पर अपनी अन्तिम साँस के साथ दोहराया (लूका 23:46)। यह संयोग नहीं; वे इस भजन के भीतर से मर रहे थे। जिस व्यक्ति से "जान-पहचानवाले" डरते हैं, जिसके विरुद्ध लोग "आपस में सम्मति" करते हैं, जिसकी निन्दा चारों ओर से सुनाई देती है, उसका पूरा चित्र गतसमनी से गुलगुता तक खिंचा हुआ है। पर ध्यान दीजिए: मसीह ने इस भजन का वह हिस्सा नहीं छोड़ा जिसमें शत्रुओं के विरुद्ध पुकार है; उन्होंने उसे पिता के हाथों में सौंप दिया। इसलिए यह भजन हमें सिखाता है कि अपनी पीड़ा को मसीह के शब्दों में ढालना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि अपने स्थान को पहचानना है: हम उनके पीछे, उसी गढ़ में।
भजन संहिता 31 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस भजन में परमेश्वर का चित्र दो विपरीत छवियों में खिंचता है। एक ओर वे पत्थर हैं: चट्टान, गढ़, "गढ़वाले नगर।" दूसरी ओर वे एक झुका हुआ चेहरा हैं: "अपना कान मेरी ओर लगाकर", "अपने मुँह का प्रकाश चमका।" जो अटल है, वही निकट झुकता है; जो दुर्ग है, वही सुनता है। और पद 20 में वे शरण देनेवाले मेज़बान बन जाते हैं, "अपने मण्डप में" छिपा लेनेवाले। यह कोई दूर बैठा न्यायी नहीं जिसे मनाना पड़े, बल्कि वह परमेश्वर हैं जिन्होंने पहले ही भलाई "रख छोड़ी है" अपने डरवैयों के लिए। भजनकार की आत्मा डोलती है, पर परमेश्वर का चरित्र नहीं डोलता; इसीलिए प्रार्थना सम्भव है।
भजन संहिता 31 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जो लोग यह भजन मन्दिर में गाते थे, वे ऐसे समाज में जीते थे जहाँ इज़्ज़त जीवन की पूँजी थी। बदनामी का अर्थ था व्यापार का टूटना, रिश्तों का बन्द होना, न्याय में अकेले खड़े रहना। पद 11 का "जो मुझ को सड़क पर देखते हैं वह मुझसे दूर भाग जाते हैं" उनके लिए मुहावरा नहीं, रोज़ का दृश्य था, शायद किसी कोढ़ी या कर्ज़ में डूबे पड़ोसी का। "टूटा बर्तन" उनके घरों के बाहर कूड़े में सचमुच पड़ा रहता था, ऐसी चीज़ जिसकी मरम्मत कोई नहीं कराता। और फिर भी वे गाते थे कि यहोवा "विश्वासयोग्य लोगों की रक्षा करता है।" अन्तिम पद किसी निजी तसल्ली नहीं, पूरी मण्डली को दिया गया आदेश है: "हियाव बाँधो।"
भजन संहिता 31 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"मैं यहोवा की दृष्टि से दूर हो गया" कहने के बाद भी भजनकार ने पुकारना नहीं छोड़ा। आपकी घबराहट का कौन-सा वाक्य अब तक प्रार्थना से बाहर खड़ा है?
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Psalms 31 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 21

धन्य हो यहोवा, कि जब मैं घिरे हुए नगर सा चारों ओर से दबा हुआ था, तब भी तूने अपनी अद्भुत करुणा मुझ पर प्रगट की। धन्यवाद कि तूने मुझे शत्रु के हाथ नहीं छोड़ा, बल्कि उन्हीं दीवारों के बीच मेरी रक्षा की और मेरा नाम अपने हृदय में रखा।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 2

पिता, धन्यवाद कि तूने मेरी ओर कान लगाया और मेरी पुकार अनसुनी न की। तू मेरे लिये आश्रय की चट्टान और बचाने के लिये गढ़ बना, जब मेरे पैर डगमगा रहे थे। तेरी सुरक्षा में मैंने चैन पाया, और यह मेरी योग्यता नहीं, तेरी करुणा है।

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