बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 50:16

बाइबल

पाठ

भजन की अदालत में परमेश्वर अब तक अपनी ही प्रजा से बात कर रहे थे, उनकी बलियों के बारे में नहीं, बल्कि उनके दिल के बारे में। फिर अचानक स्वर बदल जाता है: "परन्तु दुष्ट से परमेश्वर कहता है।" वही परमेश्वर जो भक्तों को इकट्ठा कर रहे थे, अब एक ऐसे व्यक्ति की ओर मुड़ते हैं जो उसी सभा में खड़ा है, उसी वाचा का हिस्सा होने का दावा करता है, और उसी व्यवस्था को दूसरों को सिखाता है। प्रश्न दो हैं, और दोनों चुभते हैं: तुझे मेरी विधियों का वर्णन करने का अधिकार किसने दिया? तू मेरी वाचा को अपने मुँह पर क्यों उठाए फिरता है? यह अविश्वासी को दी गई फटकार नहीं है। यह उस आदमी से पूछताछ है जो धार्मिक भाषा में धाराप्रवाह है।

मर्म

यहाँ परमेश्वर एक ऐसी बात कहते हैं जो हमारी धार्मिक सुरक्षा को तोड़ देती है: सही बातें कहना, सही शिक्षा देना, सही वाचा का नाम लेना, इनमें से कुछ भी अपने आप में परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना साबित नहीं करता। वाचा कोई ऐसी संपत्ति नहीं जिसे मुँह से पकड़कर रखा जा सके; वह एक रिश्ता है जिसमें पूरा जीवन शामिल है। इसलिए परमेश्वर "क्या काम" पूछते हैं, जैसे कोई चोर को हाथ में दूसरे के कागज़ात लिए पकड़ ले। यह केवल पाखंड की निंदा नहीं, बल्कि एक गहरी बात है: परमेश्वर अपने वचन को अपने चरित्र से अलग नहीं होने देते। जो उनके नियमों को दोहराता है पर उनकी शिक्षा से बैर रखता है (पद 17), वह परमेश्वर का नाम लेकर वास्तव में परमेश्वर के बारे में झूठ फैला रहा है। और परमेश्वर इसे चुपचाप नहीं सहेंगे।

सूत्र

इस पद की चुभन पूरे बाइबल में गूँजती है, क्योंकि परमेश्वर ने हमेशा अपने लोगों को अपना नाम सौंपा है, और हमेशा यह खतरा रहा है कि नाम ले लिया जाए पर जीवन पीछे छूट जाए। भविष्यद्वक्ता यही चिल्लाते रहे। और जब यीशु मसीह आए, तो उन्होंने यही प्रश्न और भी तीखा कर दिया: वे लोग जो उन्हें "प्रभु, प्रभु" पुकारते हैं और उनके नाम पर काम करते हैं, पर जिन्हें वे नहीं जानते। फर्क यह है कि मसीह केवल अभियोग नहीं लाते; वे वाचा को अपने शरीर में पूरा करते हैं। पद 23 का "जो अपना चरित्र उत्तम रखता है" हमारे लिए कोई असंभव शर्त नहीं रह जाता, क्योंकि जो हमें बचाते हैं वही भीतर से हमें बदलते भी हैं। पर यह बदलाव असली होना चाहिए, वरना भजन 50 का अभियोग हम पर ही टिका रहता है।

दर्पण

यह पद उन लोगों के लिए लिखा गया है जो बाइबल पढ़ते हैं, समूह चलाते हैं, सभा में प्रार्थना करते हैं। यानी, आपके लिए। जब आप रविवार को क्षमा पर सिखाते हैं और सोमवार को उस सहकर्मी से बात तक नहीं करते जिसने आपका श्रेय ले लिया, तब यह पद आपका नाम लेता है। जब आप घर में बच्चों को ईमानदारी सिखाते हैं और आयकर के कागज़ों में थोड़ी चालाकी को "व्यावहारिकता" कहते हैं, तब। पद 20 खास तौर पर काटता है: "अपने सगे भाई की चुगली खाता है।" कलीसिया में सबसे आसान पाप यही है, प्रार्थना के भेस में की गई निंदा। परमेश्वर यहाँ आपकी धार्मिक योग्यता पर नहीं, आपकी असंगति पर उँगली रखते हैं।

आज एक काम करें: पिछले सात दिनों में आपने जो एक आध्यात्मिक बात दूसरों से कही या सिखाई, उसे एक वाक्य में कागज़ पर लिखें, और उसके नीचे लिखें कि आपने स्वयं उसे कहाँ नहीं जिया। फिर वह कागज़ परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़ें।

कठिन प्रश्न

तो क्या जो अपने जीवन में संघर्ष कर रहा है, उसे सिखाना बंद कर देना चाहिए? अगर वाचा की चर्चा करने का अधिकार केवल निर्दोष को है, तो कोई मुँह नहीं खोल सकेगा। पर ध्यान दीजिए, परमेश्वर यहाँ कमज़ोरी की नहीं, बैर की बात करते हैं: "तू तो शिक्षा से बैर करता।" यह गिरने और उठने वाला व्यक्ति नहीं, यह वह है जिसने शिक्षा को अपने ऊपर लागू होने से इनकार कर दिया है और उसे केवल दूसरों के लिए एक हथियार बना लिया है। फिर भी यह सीमा हमेशा साफ़ नहीं दिखती, और शायद यही इस भजन की मंशा है, कि हम सुविधा से यह तय न कर लें कि हम किस ओर खड़े हैं।

संदर्भ

यह भजन मंदिर की आराधना का दृश्य है, पर अदालत की भाषा में। परमेश्वर आकाश और पृथ्वी को गवाह बुलाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन निकट पूर्व में राजा अपने अधीनस्थों से की गई संधि के उल्लंघन पर मुकदमा चलाते थे। इस्राएल में बलिदान की व्यवस्था चल रही है, धुआँ उठ रहा है, सब कुछ नियम से हो रहा है। और ठीक उसी क्षण परमेश्वर कहते हैं कि उन्हें बैल नहीं चाहिए। जो आदमी पद 16 में पकड़ा जाता है, वह शायद कोई सम्मानित व्यक्ति है, मंदिर में जिसकी बात सुनी जाती है। समाज उसे धर्मी मानता है। परमेश्वर उसे दुष्ट कहते हैं। यही इस पद की असली ताकत है।

अंतर्पाठ

पौलुस रोमियों 2 में लगभग यही आवाज़ उठाते हैं: जो दूसरों को व्यवस्था सिखाता है, क्या वह स्वयं को नहीं सिखाता? उनका निष्कर्ष भी वही है, कि ऐसे लोगों के कारण अन्यजातियों में परमेश्वर के नाम की निंदा होती है। और इसी भजन के अंत में एक दरवाज़ा खुला रहता है: "धन्यवाद के बलिदान का चढ़ानेवाला मेरी महिमा करता है।" धन्यवाद, क्योंकि वह केवल उसी के मुँह से निकलता है जिसने सचमुच कुछ पाया है। आप वाचा के बारे में बात करते हुए झूठ बोल सकते हैं; कृतज्ञता में झूठ बोलना कठिन है।

चिंतन

आपके मुँह से निकलने वाली किस आध्यात्मिक बात पर आपका अपना जीवन सबसे कम गवाही देता है?

पद 21 कहता है कि परमेश्वर की चुप्पी को उस आदमी ने सहमति समझ लिया। आप परमेश्वर की किस चुप्पी को गलत पढ़ रहे हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Songs of Jesus

Timothy Keller

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Psalms 1-72

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Psalms 73-150

Derek Kidner

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Reflections on the Psalms

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Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.

Psalms Volume 1

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Psalms 50:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 50:16 का क्या अर्थ है?
भजन की अदालत में परमेश्वर अब तक अपनी ही प्रजा से बात कर रहे थे, उनकी बलियों के बारे में नहीं, बल्कि उनके दिल के बारे में। फिर अचानक स्वर बदल जाता है: "परन्तु दुष्ट से परमेश्वर कहता है।" वही परमेश्वर जो भक्तों को इकट्ठा कर रहे थे, अब एक ऐसे व्यक्ति की ओर मुड़ते हैं जो उसी सभा में खड़ा है, उसी वाचा का हिस्सा होने का दावा करता है, और उसी व्यवस्था को दूसरों को सिखाता है। प्रश्न दो हैं, और दोनों चुभते हैं: तुझे
भजन संहिता 50:16 किस विषय में है?
इस पद की चुभन पूरे बाइबल में गूँजती है, क्योंकि परमेश्वर ने हमेशा अपने लोगों को अपना नाम सौंपा है, और हमेशा यह खतरा रहा है कि नाम ले लिया जाए पर जीवन पीछे छूट जाए। भविष्यद्वक्ता यही चिल्लाते रहे। और जब यीशु मसीह आए, तो उन्होंने यही प्रश्न और भी तीखा कर दिया: वे लोग जो उन्हें "प्रभु, प्रभु" पुकारते हैं और उनके नाम पर काम करते हैं, पर जिन्हें वे नहीं जानते। फर्क यह है कि मसीह केवल अभियोग नहीं लाते; वे वाचा को अपने शरीर में पूरा करते हैं। पद 23 का "जो अपना चरित्र उत्तम रखता है" हमारे लिए कोई असंभव शर्त नहीं रह जाता, क्योंकि जो हमें बचाते हैं वही भीतर से हमें बदलते भी हैं। पर यह बदलाव असली होना चाहिए, वरना भजन 50 का अभियोग हम पर ही टिका रहता है।
भजन संहिता 50:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक काम करें: पिछले सात दिनों में आपने जो एक आध्यात्मिक बात दूसरों से कही या सिखाई, उसे एक वाक्य में कागज़ पर लिखें, और उसके नीचे लिखें कि आपने स्वयं उसे कहाँ नहीं जिया। फिर वह कागज़ परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़ें।
भजन संहिता 50:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह भजन मंदिर की आराधना का दृश्य है, पर अदालत की भाषा में। परमेश्वर आकाश और पृथ्वी को गवाह बुलाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन निकट पूर्व में राजा अपने अधीनस्थों से की गई संधि के उल्लंघन पर मुकदमा चलाते थे। इस्राएल में बलिदान की व्यवस्था चल रही है, धुआँ उठ रहा है, सब कुछ नियम से हो रहा है। और ठीक उसी क्षण परमेश्वर कहते हैं कि उन्हें बैल नहीं चाहिए। जो आदमी पद 16 में पकड़ा जाता है, वह शायद कोई सम्मानित व्यक्ति है, मंदिर में जिसकी बात सुनी जाती है। समाज उसे धर्मी मानता है। परमेश्वर उसे दुष्ट कहते हैं। यही इस पद की असली ताकत है।
भजन संहिता 50:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके मुँह से निकलने वाली किस आध्यात्मिक बात पर आपका अपना जीवन सबसे कम गवाही देता है?

Psalms 50 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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