बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 69

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पानी गले तक आ चुका है, पैर कीचड़ में धँस रहे हैं और कहीं कोई ठोस ज़मीन नहीं मिलती: इसी छवि से भजन शुरू होता है। प्रार्थना करने वाला पुकारते-पुकारते थक चुका है, उसका गला सूख गया है, आँखें परमेश्वर की बाट जोहते-जोहते धुँधली पड़ गई हैं। बिना कारण शत्रु उसके सिर के बालों से भी अधिक हैं, अपने सगे भाई उसे परदेशी समझते हैं, और शहर के फाटक पर बैठे लोग तथा मदिरा पीने वाले उस पर गीत बनाकर गाते हैं। वह अपनी मूर्खता परमेश्वर के सामने स्वीकार करता है, फिर भी कहता है कि यह निन्दा उसने परमेश्वर के ही कारण सही है। बीच में वह करुणा की दुहाई देता है, फिर अपने सताने वालों पर भयानक शाप उँडेलता है, और अन्त में गीत, धन्यवाद और सिय्योन के उद्धार की निश्चितता पर आकर ठहर जाता है।

केंद्रीय सत्य

इस भजन का केंद्र यह है कि परमेश्वर दुःख को सँवारकर पेश किए जाने की माँग नहीं करते। यहाँ कोई संयमित, सुसज्जित प्रार्थना नहीं है; यहाँ डूबता हुआ आदमी है जो सच बोलता है। और ध्यान दीजिए: वह अपने को निर्दोष घोषित नहीं करता। पाँचवीं आयत में वह कहता है, "हे परमेश्वर, तू तो मेरी मूर्खता को जानता है," और उसी साँस में वह यह भी कहता है कि उसके बैरी "अकारण" हैं। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और परमेश्वर इस विरोधाभास से घबराते नहीं। यही कृपा का व्याकरण है: उद्धार उन्हें मिलता है जो अपनी मूर्खता छिपाए बिना सहायता माँगते हैं। और तैंतीसवीं आयत इसे खोलकर रख देती है, "यहोवा दरिद्रों की ओर कान लगाता है।" परमेश्वर की ओर जाने का रास्ता योग्यता से नहीं, खालीपन से होकर जाता है।

साझा सूत्र

इस भजन पर नए नियम के लेखकों की उँगलियों के निशान हर जगह हैं, और यह संयोग नहीं है। "तेरे भवन के निमित्त जलते-जलते भस्म हुआ" वाली पंक्ति शिष्यों को तब याद आई जब यीशु ने मन्दिर में मेज़ें उलट दीं। "अकारण मेरे बैरी" वाली बात यीशु ने अपने ऊपर लागू की। और इक्कीसवीं आयत, "मेरी प्यास बुझाने के लिये मुझे सिरका पिलाया," क्रूस पर अक्षरशः घटी। इसका अर्थ यह नहीं कि दाऊद भविष्य की फ़िल्म देख रहा था। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर के प्रति निष्ठा का एक निश्चित आकार होता है, और वह आकार अन्ततः एक ही व्यक्ति में पूरा हुआ। जो परमेश्वर के नाम के लिए अपमान सहता है, वह उस रास्ते पर चलता है जिसके अन्त में क्रूस खड़ा है। पौलुस ने ठीक इसी भजन से उद्धरण देकर रोमियों 15:3 में लिखा कि मसीह ने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया; उन्होंने वही निन्दा उठा ली जो परमेश्वर पर की जा रही थी।

आईना

आपने भी शायद कभी गिना होगा कि कितनी बार प्रार्थना की और कुछ नहीं हुआ। आयत तीन उस गिनती का नाम लेती है: गला सूख गया, आँखें धुँधली पड़ गईं। यह भजन आपकी थकान को आध्यात्मिक असफलता नहीं कहता। पर वह एक और चीज़ भी खोल देता है, जिसे हम छिपाना पसन्द करते हैं। बाईस से अट्ठाईस तक की आयतें पढ़िए और ईमानदारी से पूछिए: क्या यह सचमुच आपके लिए अजनबी भाषा है? उस सहकर्मी के बारे में, जिसने आपकी पीठ पीछे बात की; उस रिश्तेदार के बारे में, जिसने सम्पत्ति में आपका हिस्सा खा लिया; उस व्यक्ति के बारे में जिसने आपकी सन्तान को चोट पहुँचाई, आपके मन में जो चलता है, वह इससे बहुत अलग नहीं होता। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि भजनकार ने वह परमेश्वर के सामने कह दिया और वहीं छोड़ दिया; उसने अपने हाथ से बदला नहीं लिया। यही फ़र्क़ सब कुछ है।

आज दस मिनट अकेले बैठिए और ज़ोर से, आवाज़ निकालकर कहिए: "मैं डूबा जाता हूँ," और फिर उस एक चीज़ का नाम लीजिए जिसमें आप सचमुच धँसे हुए हैं। उसे सुन्दर मत बनाइए, समाधान मत जोड़िए, बस नाम लेकर चुप हो जाइए।

एक बारीकी

चौथी आयत का अन्तिम हिस्सा आसानी से छूट जाता है: "जो मैंने लूटा नहीं वह भी मुझ को देना पड़ा।" यह अदालत की भाषा है। किसी ने चोरी का आरोप लगाया, और सामर्थी होने के कारण मुक़दमा जीत गया; अब निर्दोष व्यक्ति को वह लौटाना पड़ रहा है जो उसने कभी लिया ही नहीं। यह अन्याय का सबसे थकाने वाला रूप है, क्योंकि इसमें आपको सिर्फ़ दुःख नहीं मिलता, आपको बिल भी चुकाना पड़ता है। जिसने कभी झूठे आरोप की कीमत चुकाई है, वह जानता है कि इसमें सबसे ज़्यादा जलन किस बात की होती है: पैसे की नहीं, बल्कि इस बात की कि आपको झुककर स्वीकार करना पड़ता है जो आपने किया ही नहीं। और यही वाक्य, बिना किसी खींचतान के, क्रूस की ओर इशारा करता है।

अन्तर्पाठ

प्रेरितों 1:20 में पतरस ने इसी भजन की पच्चीसवीं आयत, "उनकी छावनी उजड़ जाए," यहूदा पर लागू की। यह हमें चौंकाना चाहिए: जो शाप भजनकार ने अपने नाम-विहीन शत्रुओं पर उँडेले थे, वे अन्ततः उस पर गिरे जिसने मसीह को पकड़वाया। इससे पता चलता है कि आरम्भिक कलीसिया ने इन कठोर आयतों को शर्मिन्दगी से छिपाया नहीं, बल्कि उन्हें परमेश्वर के न्याय की गम्भीरता के रूप में पढ़ा। दूसरी ओर इकत्तीसवीं आयत एक अलग सुर लाती है: धन्यवाद का गीत परमेश्वर को "बैल से अधिक" भाएगा। बलिदानों के बीच जीने वाले लोगों के लिए यह लगभग विद्रोही वाक्य था, और वही धागा भविष्यद्वक्ताओं से होता हुआ यीशु तक जाता है।

श्रोता

पैंतीसवीं आयत यह भी बताती है कि यह भजन किन लोगों के मुँह में बार-बार आया: "परमेश्वर सिय्योन का उद्धार करेगा, और यहूदा के नगरों को फिर बसाएगा।" जो लोग उजड़े नगरों और टूटी दीवारों के बीच खड़े थे, उनके लिए यह व्यक्तिगत प्रार्थना अचानक पूरी जाति की प्रार्थना बन जाती थी। डूबता हुआ आदमी वे स्वयं थे। तैंतीसवीं आयत का "बन्दी" शब्द उनके लिए रूपक नहीं था। इसलिए वे इस भजन के शाप वाले हिस्से को क्रूरता नहीं, बल्कि आशा के रूप में सुनते थे: इसका अर्थ था कि साम्राज्यों का अन्तिम फ़ैसला उनके हाथ में नहीं, परमेश्वर के हाथ में है, और यही कारण था कि वे तलवार उठाए बिना गीत गा सकते थे।

चिंतन के प्रश्न

आपकी प्रार्थना में वह कौन-सा हिस्सा है जिसे आप परमेश्वर के सामने भी सँवारकर रखते हैं, और क्यों?

जिस व्यक्ति के विरुद्ध आपके मन में बाईस से अट्ठाईस आयतों जैसी भावनाएँ हैं, उसका न्याय परमेश्वर के हाथ में छोड़ने का व्यावहारिक रूप आपके लिए इस सप्ताह क्या होगा?

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Psalms 69 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 69 का क्या अर्थ है?
पानी गले तक आ चुका है, पैर कीचड़ में धँस रहे हैं और कहीं कोई ठोस ज़मीन नहीं मिलती: इसी छवि से भजन शुरू होता है। प्रार्थना करने वाला पुकारते-पुकारते थक चुका है, उसका गला सूख गया है, आँखें परमेश्वर की बाट जोहते-जोहते धुँधली पड़ गई हैं। बिना कारण शत्रु उसके सिर के बालों से भी अधिक हैं, अपने सगे भाई उसे परदेशी समझते हैं, और शहर के फाटक पर बैठे लोग तथा मदिरा पीने वाले उस पर गीत बनाकर गाते हैं। वह अपनी मूर्खता परमेश्वर के सामने स्वीकार करता है, फिर भी कहता है कि यह निन्दा उसने परमेश्वर के ही कारण सही है। बीच में वह करुणा की दुहाई देता है, फिर अपने सताने वालों पर भयानक शाप उँडेलता है, और अन्त में गीत, धन्यवाद और सिय्योन के उद्धार की निश्चितता पर आकर ठहर जाता है।
भजन संहिता 69 किस विषय में है?
इस भजन पर नए नियम के लेखकों की उँगलियों के निशान हर जगह हैं, और यह संयोग नहीं है। "तेरे भवन के निमित्त जलते-जलते भस्म हुआ" वाली पंक्ति शिष्यों को तब याद आई जब यीशु ने मन्दिर में मेज़ें उलट दीं। "अकारण मेरे बैरी" वाली बात यीशु ने अपने ऊपर लागू की। और इक्कीसवीं आयत, "मेरी प्यास बुझाने के लिये मुझे सिरका पिलाया," क्रूस पर अक्षरशः घटी। इसका अर्थ यह नहीं कि दाऊद भविष्य की फ़िल्म देख रहा था। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर के प्रति निष्ठा का एक निश्चित आकार होता है, और वह आकार अन्ततः एक ही व्यक्ति में पूरा हुआ। जो परमेश्वर के नाम के लिए अपमान सहता है, वह उस रास्ते पर चलता है जिसके अन्त में क्रूस खड़ा है। पौलुस ने ठीक इसी भजन से उद्धरण देकर रोमियों 15:3 में लिखा कि मसीह ने अपने आपको प्रसन्न नहीं किया; उन्होंने वही निन्दा उठा ली जो परमेश्वर पर की जा रही थी।
भजन संहिता 69 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दस मिनट अकेले बैठिए और ज़ोर से, आवाज़ निकालकर कहिए: "मैं डूबा जाता हूँ," और फिर उस एक चीज़ का नाम लीजिए जिसमें आप सचमुच धँसे हुए हैं। उसे सुन्दर मत बनाइए, समाधान मत जोड़िए, बस नाम लेकर चुप हो जाइए।
भजन संहिता 69 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों 1:20 में पतरस ने इसी भजन की पच्चीसवीं आयत, "उनकी छावनी उजड़ जाए," यहूदा पर लागू की। यह हमें चौंकाना चाहिए: जो शाप भजनकार ने अपने नाम-विहीन शत्रुओं पर उँडेले थे, वे अन्ततः उस पर गिरे जिसने मसीह को पकड़वाया। इससे पता चलता है कि आरम्भिक कलीसिया ने इन कठोर आयतों को शर्मिन्दगी से छिपाया नहीं, बल्कि उन्हें परमेश्वर के न्याय की गम्भीरता के रूप में पढ़ा। दूसरी ओर इकत्तीसवीं आयत एक अलग सुर लाती है: धन्यवाद का गीत परमेश्वर को "बैल से अधिक" भाएगा। बलिदानों के बीच जीने वाले लोगों के लिए यह लगभग विद्रोही वाक्य था, और वही धागा भविष्यद्वक्ताओं से होता हुआ यीशु तक जाता है।
भजन संहिता 69 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी प्रार्थना में वह कौन-सा हिस्सा है जिसे आप परमेश्वर के सामने भी सँवारकर रखते हैं, और क्यों?

Psalms 69 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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