रोमियों 15
पाठ
पौलुस रोमियों को लिखी अपनी चिट्ठी के अंतिम मोड़ पर आते हैं और पहले वे कलीसिया के भीतर की खींचतान को संभालते हैं: जो विश्वास में बलवान हैं वे निर्बलों का बोझ उठाएँ, क्योंकि मसीह ने भी अपने आपको प्रसन्न नहीं किया। इसके बाद वे पुराने नियम से चार वचन जोड़कर दिखाते हैं कि अन्यजातियों की स्तुति परमेश्वर की पुरानी योजना थी, न कि बाद की कोई मजबूरी। अंत में वे अपनी सेवा का हिसाब देते हैं: इल्लुरिकुम तक प्रचार, इसपानिया की योजना, यरूशलेम के कंगालों के लिए चंदा, और प्रार्थना की विनती।
मर्म
इस अध्याय का धड़कता हुआ केंद्र आठवाँ पद है: मसीह "खतना किए हुए लोगों का सेवक बना" ताकि पूर्वजों को दी गई प्रतिज्ञाएँ दृढ़ हों और परमेश्वर की सच्चाई प्रमाणित हो। यहाँ पौलुस दो शब्द जोड़ते हैं जिन्हें हम अलग रखने के आदी हैं: यहूदियों के लिए सच्चाई, अन्यजातियों के लिए दया। इस्राएल के साथ परमेश्वर ने वाचा बाँधी थी, इसलिए उनके पास मसीह का आना परमेश्वर की विश्वसनीयता का मामला है; अन्यजातियों के पास कोई वाचा नहीं थी, इसलिए उनका भीतर आना शुद्ध करुणा है। और दोनों एक ही मेज़ पर बैठते हैं। इसीलिए पद 7 का "ग्रहण करो" कोई शिष्टाचार नहीं, बल्कि उस सुसमाचार का शरीर है जिसे पौलुस चौदह अध्यायों से समझा रहे हैं।
सूत्र
पौलुस अन्यजातियों की भर्ती को अपनी खोज नहीं बताते; वे व्यवस्था, भजन और भविष्यद्वक्ता, तीनों से गवाह बुलाते हैं। यशायाह का वचन इस श्रृंखला की चोटी है: "यिशै की एक जड़ प्रगट होगी, और अन्यजातियों का अधिपति होने के लिये एक उठेगा, उस पर अन्यजातियाँ आशा रखेंगी।" दाऊद के पिता यिशै के ठूँठ से निकली वह कोंपल केवल इस्राएल का राजा नहीं, राष्ट्रों का अधिपति है। सृष्टि के आरंभ से जो मनुष्य-जाति बिखरी थी, वह अब एक राजा के अधीन एक स्वर में स्तुति करती है। मुक्ति की कहानी का लक्ष्य यही है: व्यक्तिगत क्षमा से आगे बढ़कर एक नई मानवता, जो "एक मन और एक स्वर होकर" पिता की महिमा करती है। आशा यहाँ भावना नहीं, इतिहास की दिशा है।
दर्पण
यह अध्याय हमारी सबसे सम्मानित कमज़ोरी पर हाथ रखता है: अपने आपको प्रसन्न करने की आदत, जिसे हम "सिद्धांत" या "स्पष्टता" कहकर ढाँप लेते हैं। कलीसिया में जो लोग हमें पिछड़ा, संकीर्ण या अति-भावुक लगते हैं, उनके साथ हम धैर्य रखते हैं या दूरी बनाते हैं? घर में जिस भाई-बहन के साथ पुराना मतभेद है, वहाँ हम सही होना चाहते हैं या उसे "भलाई के लिये सुधारने" के लिए झुकना? पैसे के मामले में भी पौलुस बेरहमी से ठोस हैं: मकिदुनिया और अखाया की कलीसियाएँ यरूशलेम के कंगालों को चंदा भेजती हैं, क्योंकि आत्मिक कर्ज़ शारीरिक सेवा से चुकाया जाता है। आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसकी निर्बलता आपको खटकती है, और उसके नाम पर ज़ोर से कहिए: प्रभु, जैसे आपने मुझे ग्रहण किया, वैसे मैं इसे ग्रहण करता हूँ।
शास्त्र की गूँज
पद 3 में पौलुस भजन 69 से उद्धरण लेते हैं: "तेरे निन्दकों की निन्दा मुझ पर आ पड़ी।" यह पीड़ित धर्मी का भजन है, और नया नियम इसे बार-बार क्रूस पर लगाता है। ध्यान दीजिए, पौलुस इसे सैद्धांतिक तर्क में नहीं, बल्कि खाने-पीने के झगड़े में इस्तेमाल करते हैं: मसीह ने दूसरों की गालियाँ अपने ऊपर ओढ़ लीं, तो तुम अपनी पसंद क्यों नहीं छोड़ सकते? दूसरी गूँज यशायाह 11 की है, जहाँ यिशै की जड़ से निकला राजा शेरों और मेमनों को एक साथ लिटाता है। पौलुस उसी दृश्य को कलीसिया में उतारते हैं। जो शास्त्र "पहले से" लिखा गया, वह हमारे धीरज और प्रोत्साहन का चारा है, इसलिए पुराने नियम को छोड़कर आशा नहीं पकती।
एक बारीकी
पद 16 में पौलुस अपने काम के लिए मंदिर की भाषा उठाते हैं: वे "याजक के समान" सुसमाचार की सेवा करते हैं, और अन्यजातियाँ स्वयं वह भेंट हैं जो "पवित्र आत्मा से पवित्र बनकर" चढ़ाई जाती है। सोचिए यह कितना दुस्साहसी है। यरूशलेम में असली मंदिर अभी खड़ा था, वहाँ असली याजक असली पशु चढ़ा रहे थे, और पौलुस कहते हैं कि उनकी वेदी एशिया और यूनान के धूल भरे रास्ते हैं, और उनकी भेंट वे लोग हैं जिन्हें कोई याजक मंदिर के भीतरी आँगन में घुसने न देता। जो पहले अशुद्ध थे, वे अब बलिदान हैं, और शुद्ध करनेवाला खून नहीं, आत्मा है। मिशन इसलिए परमेश्वर की आराधना का ही एक रूप है।
पहले सुननेवाले
रोम की कलीसिया मिली-जुली थी: यहूदी विश्वासी, जिनमें से कुछ सम्राट के निकाले जाने के बाद लौटे थे, और अन्यजाति विश्वासी जो बीच के वर्षों में बहुमत बन गए थे। भोजन और पर्वों के झगड़े केवल स्वाद के नहीं, पहचान और अपमान के थे। ऐसे कानों में पद 8 धमाके जैसा गिरा होगा: मसीह खतना किए हुए लोगों का सेवक बने, यानी अन्यजाति विश्वासी उस कहानी में मेहमान हैं जिसे उन्होंने नहीं लिखा। और उसी के साथ चंदे की बात, जो कोरा दान नहीं बल्कि चुकाया जाता कर्ज़ था, एक शरीर होने का ठोस सबूत। पौलुस अंत में जो आशीष देते हैं, "शान्ति का परमेश्वर तुम सब के साथ रहे," वह उस कलीसिया के लिए मीठी नहीं, चुभती हुई प्रार्थना थी।
चिंतन के प्रश्न
मसीह ने जिस तरह मुझे ग्रहण किया, उसकी तुलना में मैं किसी को किन शर्तों पर ग्रहण करता हूँ, और वे शर्तें कहाँ से आईं?
पौलुस की आशा शास्त्र पढ़ने से पकी थी; मेरा बाइबल पढ़ना मुझे धीरज देता है या केवल जानकारी?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तेरे प्रेम ने हमें एक दूसरे से जोड़ा है। मुझे याद दिला कि मेरी प्रार्थना किसी और के संघर्ष में साथ खड़े होने का तरीका है। जो थके हुए हैं, जो अकेले लड़ रहे हैं, उन्हें उठा ले, और मुझे उनके लिए घुटनों पर बने रहना सिखा।
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