रोमियों 7
पाठ
पौलुस विवाह के एक चित्र से शुरू करते हैं: जैसे पति की मृत्यु के बाद स्त्री उस बंधन से मुक्त हो जाती है, वैसे ही हम मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिए मर गए, ताकि जी उठे मसीह के हो जाएँ। फिर एक तड़प भरी आत्म-परीक्षा: व्यवस्था पवित्र है, पर मुझ में बसा पाप मुझे वही करवाता है जिससे मैं घृणा करता हूँ। अंत में वह पुकार जो सदियों से गूँजती है: "मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?"
हृदय
इस अध्याय का हृदय एक विरोधाभास है जिसे पौलुस सुलझाते नहीं, बल्कि जीते हैं। व्यवस्था पवित्र, धर्मी और अच्छी है, फिर भी वह मृत्यु का कारण बनी। समस्या व्यवस्था में नहीं, हम में है। पौलुस पाप को केवल गलत कामों की सूची नहीं मानते; वे पाप को एक शक्ति के रूप में देखते हैं जो "मुझ में बसी हुई" है, जो आज्ञा को अवसर बनाकर काम करती है। यहाँ शुद्ध नैतिकता की सीमा उजागर होती है: जानना काफी नहीं, चाहना भी काफी नहीं। मनुष्य के भीतर एक ऐसा टूटापन है जिसे केवल बाहरी नियम नहीं छू सकते। मुक्ति नियम पालन से नहीं, बल्कि किसी और के साथ जुड़ जाने से आती है।
सामान्य सूत्र
पौलुस विवाह का चित्र यूँ ही नहीं चुनते। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर अपने लोगों से एक वैवाहिक बंधन में हैं, कभी विश्वासयोग्य, कभी विश्वासघाती। सीनै पर्वत पर व्यवस्था वह पति थी जिसके अधीन इस्राएल बंधा था। पर व्यवस्था बचा नहीं सकती थी, केवल पाप को उजागर कर सकती थी। मसीह की देह के द्वारा एक मृत्यु घटित होती है, और उसी मृत्यु में एक नया विवाह संभव होता है, "उस दूसरे के हो जाओ, जो मरे हुओं में से जी उठा।" यह वही सूत्र है जो होशे की भविष्यवाणी से लेकर प्रकाशितवाक्य के मेम्ने के विवाह भोज तक फैला हुआ है। मुक्ति का अर्थ केवल क्षमा नहीं, एक नए संबंध में प्रवेश है।
दर्पण
पद 15 आपके भीतर कुछ हिला देता है यदि आप ईमानदार हैं: "जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिससे मुझे घृणा आती है, वही करता हूँ।" यह वह पिता है जो अपने बच्चे पर फिर चिल्ला पड़ा, यद्यपि उसने सुबह प्रार्थना की थी कि आज नहीं। यह वह स्त्री है जो जानती है कि उस विचार को नहीं पालना, फिर भी पालती है। यह हम सब हैं जब हम आधी रात को स्क्रीन के सामने बैठे होते हैं और खुद से पूछते हैं कि यह फिर कैसे हो गया। पौलुस यहाँ हार नहीं मान रहे, वे निदान कर रहे हैं। और यह निदान राहत देता है, क्योंकि यह हमें आत्म-सुधार के थकाऊ चक्र से बाहर एक ऐसे प्रश्न की ओर ले जाता है जिसका उत्तर हमारे भीतर नहीं है: "कौन छुड़ाएगा?"
विवरण
"मुझ में बसा हुआ पाप", यह छोटा-सा वाक्यांश पद 17 और 20 में दो बार आता है, और यह पूरे अध्याय की कुंजी है। पौलुस यह नहीं कहते कि पाप मैं करता हूँ; वे कहते हैं पाप मुझ में बसा है, जैसे कोई किरायेदार जो मालिक बन बैठा हो। यह जिम्मेदारी से भागना नहीं है, यह गहराई में जाना है। पाप केवल कर्म नहीं, वह एक निवासी है। और यदि पाप भीतर बसा है, तो बाहरी नियम उसे निकाल नहीं सकते; भीतर किसी और को बसना होगा। इसीलिए अध्याय 8 पवित्र आत्मा के भीतर वास से शुरू होता है। एक निवासी दूसरे की जगह लेता है।
श्रोता
रोम की कलीसिया में यहूदी और अन्यजाति दोनों विश्वासी थे, और व्यवस्था का प्रश्न उनके बीच सुलगता रहता था। यहूदी विश्वासी टोरा को परमेश्वर की देन मानते थे, अन्यजाति उसे अजीब बोझ। पौलुस दोनों को एक साथ थामते हैं: व्यवस्था वास्तव में पवित्र है, यहूदी भाई सही थे; पर व्यवस्था बचा नहीं सकती, अन्यजाति भाई भी सही थे। पौलुस स्वयं फरीसी थे, जिन्होंने व्यवस्था को अपने प्राणों से अधिक चाहा था। जब वे "अभागा मनुष्य" कहते हैं, तो यह किसी बाहरी का ठंडा विश्लेषण नहीं, एक भीतर से टूटे व्यक्ति की गवाही है जो व्यवस्था की ऊँचाई और अपनी असमर्थता दोनों को जानता है।
संदर्भ
रोमियों की पत्री लगभग 57 ईस्वी में लिखी गई, संभवतः कुरिन्थुस से, जब पौलुस यरूशलेम जाने की तैयारी में थे। रोम की कलीसिया उन्होंने नहीं लगाई थी, इसलिए यह पत्री एक परिचय भी है और एक धार्मिक नींव भी। सम्राट क्लौदियुस ने कुछ वर्ष पहले यहूदियों को रोम से निकाला था, और अब वे लौट रहे थे, कलीसियाई तनाव नए सिरे से उठ रहे थे। इस माहौल में अध्याय 7 केवल व्यक्तिगत आत्म-कथा नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रश्न का उत्तर है: यदि व्यवस्था अच्छी है और हम मसीह में हैं, तो व्यवस्था का हमारा क्या नाता? पौलुस उत्तर देते हैं: तुम मर गए, और अब किसी और के हो।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा क्षेत्र है जहाँ आप जानते हैं कि क्या सही है, चाहते भी हैं, फिर भी कर नहीं पाते, और क्या आप उसे स्वीकार करने से डरते हैं?
*यदि पाप "
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Romans 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 7 का क्या अर्थ है?
रोमियों 7 किस विषय में है?
रोमियों 7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तू जानता है कि मैं अच्छा करना चाहता हूँ, फिर भी बार बार वही कर बैठता हूँ जो नहीं चाहता। इस भीतर की लड़ाई से मैं थक गया हूँ। मुझे छिपाना नहीं, तेरे सामने खुलकर रखना है। तू ही मुझे इस बंधन से छुड़ा सकता है।
पिता, धन्यवाद कि आपने मेरी आँखें खोलीं और दिखाया कि पाप कैसे अवसर पाकर आज्ञा के द्वारा मुझे बहकाता है। धन्यवाद कि उसका छल अब मुझसे छिपा नहीं रहता, और जहाँ पाप मारता है, वहाँ मसीह में आपने मुझे जीवन दिया है।
पिता, धन्यवाद कि वह समय बीत गया जब हम शरीर के अधीन थे और पाप की अभिलाषाएँ हमारे अंगों में मृत्यु का फल लाने के लिये काम करती थीं। आपने मसीह में हमें उस बंधन से छुड़ाया, और अब हमारा जीवन आपके लिये फल लाता है। इस बदलाव के लिये हृदय से आपका आभार।
पौलुस अपनी हार में भी एक गवाही ढूँढ़ लेता है: "यदि मैं वह करता हूँ जो मैं नहीं चाहता, तो मैं मान लेता हूँ कि व्यवस्था भली है।" सोचो, जो बेचैनी पाप करने के बाद तुम्हारे भीतर उठती है, वही सबूत है कि परमेश्वर की आज्ञा तुम्हें अब भी सुंदर लगती है। वह कसक दुश्मन नहीं, गवाह है। उसे दबाओ मत, उसे लेकर मसीह के पास जाओ।
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