बाइबल व्याख्या

रोमियों 7:14

बाइबल
यह वचन Brunstad Christian Church द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस अपने तर्क की गाँठ यहाँ बाँधते हैं: "हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है, परन्तु मैं शारीरिक हूँ और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ।" व्यवस्था के बारे में उनका फैसला साफ़ है, वह परमेश्वर के आत्मा से निकली है, पवित्र और भली है, दोषी वह नहीं है। समस्या दूसरी तरफ़ बैठी है, उस "मैं" में जो मिट्टी का बना है और जिसे किसी और मालिक ने ख़रीद लिया है। यह वाक्य दो असमान चीज़ों को आमने-सामने रखता है: ऊपर से आई पवित्र आज्ञा, और नीचे से बोलता हुआ बिका हुआ मनुष्य। और यह स्वीकारोक्ति ठंडी नहीं, बल्कि आदमी के हारने की आवाज़ है।

मूल मर्म

"पाप के हाथ बिका हुआ" वाक्यांश गुलाम-बाज़ार की भाषा है, और यही इस पद का धर्मशास्त्रीय भार है। पाप यहाँ एक ग़लती नहीं, एक स्वामी है; मनुष्य कमज़ोर नहीं, बिका हुआ है। इसका अर्थ है कि हमारी असली मुसीबत जानकारी की कमी नहीं है, वरना और नियम, और उपदेश, और संकल्प काफ़ी होते। मुसीबत मालिकाना हक़ की है। और ठीक यहीं व्यवस्था की सीमा और उसकी महिमा, दोनों दिखती हैं: वह परमेश्वर की पवित्रता का सच्चा दर्पण है, पर दर्पण किसी को बाज़ार से छुड़ा नहीं सकता। सृष्टि में परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी छवि में स्वतंत्र बनाया था; पतन के बाद वही मनुष्य अपने ही अंगों में क़ैद है। इसलिए छुटकारा नैतिक सुधार नहीं, मोल चुकाकर की गई ख़रीद होना चाहिए, और वही अनुग्रह है।

सुसमाचार का सूत्र

बाइबल की पूरी कहानी में छुटकारा हमेशा मोल से जुड़ा है। इस्राएल मिस्र से नैतिक सुधार करके नहीं निकला, वह ख़रीदा गया, मेम्ने के लहू और परमेश्वर के बढ़े हुए हाथ से; और उसके बाद ही सीनै पर व्यवस्था दी गई। क्रम महत्वपूर्ण है: पहले छुटकारा, फिर आज्ञा। रोमियों 7 उस क्रम को उलटने की कोशिश का नतीजा दिखाता है, जहाँ आज्ञा को ही मुक्तिदाता बना दिया जाए। इसलिए पौलुस का "पाप के हाथ बिका हुआ" वाक्य अपने आप एक पुकार बन जाता है, जिसका उत्तर ग्यारह पद बाद आता है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।" मसीह मालिक बदलते हैं। वे व्यवस्था को रद्द नहीं करते, वे बिके हुए दास को बाज़ार से ख़रीद लेते हैं, ताकि जैसा पद 4 कहता है, "हम परमेश्वर के लिये फल लाएँ।"

आत्मदर्पण

यह पद उस झूठ को तोड़ता है जिसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं: कि अगली बार हम सँभल जाएँगे। आप जानते हैं वह पल, जब आप बच्चों पर चिल्लाने के बाद अपने कमरे में बैठकर तय करते हैं कि यह आख़िरी बार था, और तीन दिन बाद वही आवाज़ फिर आपके गले से निकलती है। या वह ईमेल जो आपने ईर्ष्या से लिखा, वह पैसा जिसे आपने ज़रूरत नहीं, सुरक्षा के लिए जमा किया, वह स्क्रीन जिसके सामने आपका संकल्प रोज़ हार जाता है। पौलुस आपके संकल्प का मज़ाक नहीं उड़ाते; वे कहते हैं कि संकल्प उस जगह लड़ रहा है जहाँ हक़ किसी और का है। यह हार मानना आत्म-दया नहीं, ईमानदारी है, और ईमानदारी से ही अनुग्रह शुरू होता है। आज एक काम कीजिए: अपनी वह एक आदत काग़ज़ पर लिखिए जिसे आप बार-बार छोड़ने की क़सम खाकर हारे हैं, और उसके नीचे लिखिए, "यह मेरा मालिक था, मसीह ने मुझे मोल देकर ख़रीदा है," फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।

संदर्भ

पौलुस यह पत्र लगभग सन् 57 में कुरिन्थ से लिख रहे हैं, रोम की उस कलीसिया को जिसे उन्होंने स्थापित नहीं किया था और जहाँ वे अभी गए भी नहीं थे। रोम साम्राज्य की राजधानी थी, और उसकी गलियों में दास-प्रथा रोज़ का दृश्य थी: नीलामी के चबूतरे, ख़रीदे और छुड़ाए गए लोग, वे मालिक जिनका शब्द क़ानून था। "पाप के हाथ बिका हुआ" सुनते ही रोम के पाठक के मन में कोई धुँधला रूपक नहीं, एक ठोस तस्वीर उठती थी। साथ ही यह कलीसिया मिली-जुली थी, यहूदी और अन्यजाति विश्वासी एक साथ, और उनके बीच सवाल गरम था कि व्यवस्था का अब क्या स्थान है। इसलिए पौलुस बहुत सावधानी से चलते हैं: वे व्यवस्था को बचाते हैं और मनुष्य पर दोष रखते हैं।

श्रोता का चेहरा

कल्पना कीजिए उस यहूदी विश्वासी की जो बचपन से आराधनालय में व्यवस्था सुनता आया है, जिसके लिए तोरा परमेश्वर का सबसे बड़ा उपहार है। वह सुसमाचार को मानता है, पर डरता है कि कहीं मसीह के नाम पर परमेश्वर की पवित्र आज्ञा को कूड़ा न कहा जाए। उसके कानों में पद 14 का पहला आधा हिस्सा राहत की तरह गिरता है: व्यवस्था आत्मिक है, दोष उसका नहीं। और उसके पास बैठा अन्यजाति विश्वासी, जिसने अपने पुराने जीवन की गुलामी को अच्छी तरह जाना है, दूसरे आधे में अपनी कहानी पहचानता है। दोनों एक ही सच में मिलते हैं: व्यवस्था न किसी को दोषी ठहराने में झूठी है, न किसी को छुड़ाने में सक्षम। यह पद उन दोनों को एक ही स्तर पर, एक ही उद्धारकर्ता के सामने खड़ा कर देता है।

केंद्रीय पात्र

इस पद का "मैं" पौलुस को नंगा कर देता है, और यही इसकी शक्ति है। यह वह आदमी है जो अपने बारे में कह सकता था कि वह व्यवस्था के अनुसार निर्दोष था, और अब वही आदमी वर्तमान काल में कहता है, "मैं शारीरिक हूँ।" न बीता हुआ अध्याय, न किसी और की कहानी। ध्यान दीजिए, वे यह भी कहते हैं, "मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ" (पद 22)। यह विभाजित आदमी है, जो परमेश्वर की भलाई से प्रेम करता है और अपने अंगों में उसका उल्लंघन पाता है। ऐसा आत्म-ज्ञान कमज़ोरी नहीं, अनुग्रह का फल है: जितना क़रीब आप उजियाले के आते हैं, उतना साफ़ अपनी छाया दिखती है। और यही आदमी, टूटकर, धन्यवाद तक पहुँचता है।

चिंतन के प्रश्न

आपके जीवन में वह कौन-सी लड़ाई है जिसे आप अब तक संकल्प से जीतने की कोशिश कर रहे हैं, और उसे "मालिक बदलने" की भाषा में रखने से क्या बदलेगा?

पौलुस अपनी हार मानते हुए भी व्यवस्था को पवित्र कहते हैं; क्या आप परमेश्वर की आज्ञा को भला कह सकते हैं ठीक उस जगह जहाँ वह आपको दोषी ठहराती है?

Romans में और गहराई से जानें

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The Message of Romans

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A modern classic on the letter that has changed history more than once.

Romans: An Introduction and Commentary

F.F. Bruce

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Romans 7:14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 7:14 का क्या अर्थ है?
पौलुस अपने तर्क की गाँठ यहाँ बाँधते हैं: "हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है, परन्तु मैं शारीरिक हूँ और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ।" व्यवस्था के बारे में उनका फैसला साफ़ है, वह परमेश्वर के आत्मा से निकली है, पवित्र और भली है, दोषी वह नहीं है। समस्या दूसरी तरफ़ बैठी है, उस "मैं" में जो मिट्टी का बना है और जिसे किसी और मालिक ने ख़रीद लिया है। यह वाक्य दो असमान चीज़ों को आमने-सामने रखता है: ऊपर से आई पवित्र आज्ञा, और नीचे से बोलता हुआ बिका हुआ मनुष्य। और यह स्वीकारोक्ति ठंडी नहीं, बल्कि आदमी के हारने की आवाज़ है।
रोमियों 7:14 किस विषय में है?
बाइबल की पूरी कहानी में छुटकारा हमेशा मोल से जुड़ा है। इस्राएल मिस्र से नैतिक सुधार करके नहीं निकला, वह ख़रीदा गया, मेम्ने के लहू और परमेश्वर के बढ़े हुए हाथ से; और उसके बाद ही सीनै पर व्यवस्था दी गई। क्रम महत्वपूर्ण है: पहले छुटकारा, फिर आज्ञा। रोमियों 7 उस क्रम को उलटने की कोशिश का नतीजा दिखाता है, जहाँ आज्ञा को ही मुक्तिदाता बना दिया जाए। इसलिए पौलुस का "पाप के हाथ बिका हुआ" वाक्य अपने आप एक पुकार बन जाता है, जिसका उत्तर ग्यारह पद बाद आता है: "हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।" मसीह मालिक बदलते हैं। वे व्यवस्था को रद्द नहीं करते, वे बिके हुए दास को बाज़ार से ख़रीद लेते हैं, ताकि जैसा पद 4 कहता है, "हम परमेश्वर के लिये फल लाएँ।"
रोमियों 7:14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पौलुस यह पत्र लगभग सन् 57 में कुरिन्थ से लिख रहे हैं, रोम की उस कलीसिया को जिसे उन्होंने स्थापित नहीं किया था और जहाँ वे अभी गए भी नहीं थे। रोम साम्राज्य की राजधानी थी, और उसकी गलियों में दास-प्रथा रोज़ का दृश्य थी: नीलामी के चबूतरे, ख़रीदे और छुड़ाए गए लोग, वे मालिक जिनका शब्द क़ानून था। "पाप के हाथ बिका हुआ" सुनते ही रोम के पाठक के मन में कोई धुँधला रूपक नहीं, एक ठोस तस्वीर उठती थी। साथ ही यह कलीसिया मिली-जुली थी, यहूदी और अन्यजाति विश्वासी एक साथ, और उनके बीच सवाल गरम था कि व्यवस्था का अब क्या स्थान है। इसलिए पौलुस बहुत सावधानी से चलते हैं: वे व्यवस्था को बचाते हैं और मनुष्य पर दोष रखते हैं।
रोमियों 7:14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस पद का "मैं" पौलुस को नंगा कर देता है, और यही इसकी शक्ति है। यह वह आदमी है जो अपने बारे में कह सकता था कि वह व्यवस्था के अनुसार निर्दोष था, और अब वही आदमी वर्तमान काल में कहता है, "मैं शारीरिक हूँ।" न बीता हुआ अध्याय, न किसी और की कहानी। ध्यान दीजिए, वे यह भी कहते हैं, "मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ" (पद 22)। यह विभाजित आदमी है, जो परमेश्वर की भलाई से प्रेम करता है और अपने अंगों में उसका उल्लंघन पाता है। ऐसा आत्म-ज्ञान कमज़ोरी नहीं, अनुग्रह का फल है: जितना क़रीब आप उजियाले के आते हैं, उतना साफ़ अपनी छाया दिखती है। और यही आदमी, टूटकर, धन्यवाद तक पहुँचता है।
रोमियों 7:14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पौलुस अपनी हार मानते हुए भी व्यवस्था को पवित्र कहते हैं; क्या आप परमेश्वर की आज्ञा को भला कह सकते हैं ठीक उस जगह जहाँ वह आपको दोषी ठहराती है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Romans 7 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 20

पिता, तू जानता है कि मैं अच्छा करना चाहता हूँ, फिर भी बार बार वही कर बैठता हूँ जो नहीं चाहता। इस भीतर की लड़ाई से मैं थक गया हूँ। मुझे छिपाना नहीं, तेरे सामने खुलकर रखना है। तू ही मुझे इस बंधन से छुड़ा सकता है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 11

पिता, धन्यवाद कि आपने मेरी आँखें खोलीं और दिखाया कि पाप कैसे अवसर पाकर आज्ञा के द्वारा मुझे बहकाता है। धन्यवाद कि उसका छल अब मुझसे छिपा नहीं रहता, और जहाँ पाप मारता है, वहाँ मसीह में आपने मुझे जीवन दिया है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि वह समय बीत गया जब हम शरीर के अधीन थे और पाप की अभिलाषाएँ हमारे अंगों में मृत्यु का फल लाने के लिये काम करती थीं। आपने मसीह में हमें उस बंधन से छुड़ाया, और अब हमारा जीवन आपके लिये फल लाता है। इस बदलाव के लिये हृदय से आपका आभार।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

पौलुस अपनी हार में भी एक गवाही ढूँढ़ लेता है: "यदि मैं वह करता हूँ जो मैं नहीं चाहता, तो मैं मान लेता हूँ कि व्यवस्था भली है।" सोचो, जो बेचैनी पाप करने के बाद तुम्हारे भीतर उठती है, वही सबूत है कि परमेश्वर की आज्ञा तुम्हें अब भी सुंदर लगती है। वह कसक दुश्मन नहीं, गवाह है। उसे दबाओ मत, उसे लेकर मसीह के पास जाओ।

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