श्रेष्ठगीत 3
पाठ
रात है। बिछौना ठंडा है। वह जागती है और हाथ बढ़ाती है, पर वहाँ कोई नहीं। "रात के समय मैं अपने पलंग पर अपने प्राणप्रिय को ढूँढ़ती रही; मैं उसे ढूँढ़ती तो रही, परन्तु उसे न पाया।" तब वह उठती है, नगर की गलियों और चौकों में निकल पड़ती है, पहरुओं से पूछती है, और अन्त में उसे पा लेती है और छोड़ती नहीं। इसके बाद दृश्य अचानक बदलता है: जंगल से धुएँ के खम्भे जैसा कुछ उठता आता है, गन्धरस और लोबान की सुगन्ध, साठ हथियारबन्द वीर, और बीच में सुलैमान की पालकी, विवाह के दिन का मुकुट पहने राजा।
मर्म
इस अध्याय की धड़कन दो शब्दों में है: खोज और जुलूस। पहले खण्ड में प्रेम असुरक्षित है, नंगे पैर, अंधेरी सड़कों पर। दूसरे खण्ड में प्रेम राजसी है, चाँदी के खम्भों और तलवारों से घिरा हुआ। बाइबल प्रेम को न तो केवल भावना बनाती है, न केवल संस्था। वह दोनों है: रात की बेचैन तलाश और दिन का सार्वजनिक उत्सव। और यही परमेश्वर के अपने प्रेम का ढाँचा है। वे खोजते हैं और वे उत्सव मनाते हैं। जो लोग सोचते हैं कि श्रेष्ठगीत केवल शरीर की कविता है, वे यह चूक जाते हैं कि यहाँ प्रेम की कीमत भी लिखी है: नींद टूटना, अकेले निकलना, अजनबियों से पूछना।
जोड़ने वाला धागा
"मैंने उसको पकड़ लिया, और उसको जाने न दिया" यह वाक्य केवल एक प्रेमिका की जिद नहीं, यह पूरे पवित्रशास्त्र की एक गूँज है। इस्राएल परमेश्वर की दुल्हन कहलाई, और परमेश्वर ने अपने आप को वह पति कहा जो छोड़ा नहीं जाता। पर धागा उलटी दिशा में भी चलता है। नये नियम में वह जो रात में खोजने निकलता है, वह दूल्हा स्वयं है: खोई हुई भेड़ के पीछे, अंधेरे में, जंगल तक। और जो जुलूस अन्त में आता है, वह विवाह का जुलूस है, जिसमें राजा मुकुट पहनकर आता है। श्रेष्ठगीत का यह अध्याय, बिना जबरदस्ती की अलंकार-व्याख्या के, उस अन्तिम विवाहभोज की ओर आँख उठाता है जिसकी प्रतीक्षा कलीसिया अब भी कर रही है।
दर्पण
आपने भी वह रात जानी है। कोई प्रार्थना अनुत्तरित रह गई, और परमेश्वर की उपस्थिति जो पहले सहज लगती थी, अचानक गायब लगी। बिछौने पर पड़े रहकर आपने सोचा: मैंने कुछ गलत किया है? इस स्त्री की प्रतिक्रिया गौर से देखिए। वह लेटी नहीं रहती। वह उठती है। वह नगर में निकलती है, जहाँ रात में अकेली स्त्री का निकलना खतरनाक था, और पहरुओं से बेझिझक पूछती है। यह आध्यात्मिक भावुकता नहीं, यह ढिठाई है। जब परमेश्वर दूर लगते हैं, तो अक्सर हम व्यस्तता में डूब जाते हैं या धार्मिक आदतें छोड़ देते हैं। यह पाठ तीसरा रास्ता दिखाता है: जूते पहनो और खोजो, और जब मिल जाए, तो पकड़ लो।
प्रश्न
पद 5 अटपटा है: "जब तक प्रेम आप से न उठे, तब तक उसको न उकसाओं और न जगाओ।" यह वही स्त्री कह रही है जो अभी रात भर बेचैनी में दौड़ती रही। क्या यह विरोधाभास नहीं? खोजना ठीक है, पर जगाना नहीं? यहाँ पाठ कोई सफाई नहीं देता, और मुझे लगता है यह जानबूझकर है। प्रेम को खोजा जा सकता है, पर उत्पन्न नहीं किया जा सकता। आप इच्छा को जबरन पैदा नहीं कर सकते, न मनुष्य के प्रति, न परमेश्वर के प्रति। भक्ति के तरीकों से हम आग जलाने की कोशिश करते हैं और थक जाते हैं। यह पद कहता है: आग परमेश्वर की देन है; तुम्हारा काम है सूखी लकड़ी रखना और प्रतीक्षा करना, बेसब्री से नहीं, धीरज से।
मुख्य पात्र
पूरे अध्याय में जो बोलती है, वही केन्द्र है: दुल्हन। ध्यान दें कि वह कैसे बोलती है। तीन बार "प्राणप्रिय", और दो बार वह वाक्य जो टूटी आवाज में कहा जाता है, "परन्तु उसे न पाया।" उसकी दुनिया में सुरक्षा नहीं है, वह जोखिम उठाती है; समाज उसे रात में घर पर देखना चाहता है, वह चौकों में जाती है। और जब वह पाती है, तो वह माँ के घर ले आती है, यानी अपने प्रेम को छिपाती नहीं, अपनी जड़ों के सामने रखती है। यह स्त्री बाइबल के उन कुछ चित्रों में से है जो दिखाती है कि सच्चा प्रेम निष्क्रिय नहीं होता। वह विश्वास का चेहरा है: कमजोर, दृढ़, और शर्मिंदा नहीं।
अन्तर्पाठ
याकूब की वह रात याद आती है जब उसने कहा, "जब तक तू मुझे आशीष न दे मैं तुझे जाने नहीं दूँगा।" वही पकड़, वही अंधेरा, वही ढिठाई। पवित्रशास्त्र ऐसी पकड़ को अनादर नहीं, विश्वास कहता है। और दूसरी ओर, यूहन्ना 20 में मरियम मगदलीनी अंधेरे में कब्र पर खड़ी होकर रोती है, माली से पूछती है कि उसका प्रभु कहाँ है, और जब वह अपना नाम सुनती है, तो पकड़ लेती है। श्रेष्ठगीत की यह रात वहाँ अपनी पूर्णता पाती है: खोजने वाली स्त्री, और जीवित दूल्हा जो खोया नहीं गया था, केवल अब तक पहचाना नहीं गया था।
चिन्तन
आप उस रात में क्या करते हैं जब परमेश्वर की उपस्थिति महसूस नहीं होती: बिछौने पर पड़े रहते हैं, या उठकर खोजते हैं, और खोजना आपके लिए ठोस रूप में कैसा दिखेगा?
"जब तक प्रेम आप से न उठे" कहाँ आप ऐसी चीज को जबरदस्ती जगाने की कोशिश कर रहे हैं जो केवल परमेश्वर के समय में आती है?
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Song of Solomon 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Song of Solomon 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
उसके विवाह के दिन, और उसके मन के आनन्द के दिन" यह मुकुट किसी युद्ध की जीत का नहीं था, माँ के हाथों से पहनाया गया प्रेम का मुकुट था। कभी सोचा है, परमेश्वर तुझे भी ऐसे ही देखता है? डाँटने के लिए नहीं, सजाने के लिए। तेरे जीवन में भी एक दिन ऐसा है जिसे वह आनन्द का दिन कहता है। क्या तू उसे देखने निकलेगा?
सुलैमान की पालकी के खम्भे चाँदी के थे, "उसका तल सोने का" था, बाहर से सब चमक रहा था। पर जो सबसे कीमती था, वह भीतर था, प्रेम से सजाया हुआ। लोग तुम्हारे जीवन की चाँदी सोना देखते हैं। पर जिसके साथ तुम रोज़ बैठते हो, वह भीतर का सामान जानता है। वहाँ क्या बिछा है, प्रेम या बस दिखावा?
देखो, यह सुलैमान की पालकी है, उसके चारों ओर इस्राएल के शूरवीरों में से साठ वीर हैं।" ये साठ लोग सजावट नहीं थे। रात का डर सच्चा था, और जो पालकी में बैठी थी वह किसी के लिए बहुत कीमती थी। सोचो, तुम्हारे चारों ओर भी पहरा है। जिसे परमेश्वर प्यार करता है, उसे वह असुरक्षित रास्ते पर अकेला नहीं छोड़ता।
पिता, धन्यवाद कि जब मन बेचैन होकर खोजता है, तब तू नगर के पहरुओं की तरह किसी को मेरे रास्ते में खड़ा कर देता है। धन्यवाद उस तड़प के लिए जो पूछने पर मजबूर करती है, "क्या तुमने मेरे प्राणप्रिय को देखा है?" और उस भरोसे के लिए कि तू मिलता ज़रूर है।
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