सब्त का दिन क्या है: विश्राम की आज्ञा और मसीहियों के लिए उसका अर्थ
परिचय
रविवार की सुबह आराधना, दोपहर में परिवार के साथ खाना, और शाम होते-होते लैपटॉप फिर से खुल जाता है। सोमवार की फ़ाइल आज ही निपटानी है। कहीं मन के किसी कोने में एक हल्की-सी चुभन रहती है: क्या मैंने कुछ गलत किया? क्या सब्त तोड़ना पाप है? और वैसे भी, मसीहियों के लिए सब्त शनिवार है या रविवार? बहुत से विश्वासी इन सवालों के साथ वर्षों जीते हैं, कभी अपराधबोध में, कभी लापरवाही में, और अक्सर दोनों के बीच झूलते हुए।
सब्त का दिन बाइबल के सबसे पुराने और सबसे गलत समझे गए विषयों में से एक है। यह सृष्टि के सातवें दिन से शुरू होता है और प्रकाशितवाक्य के अनन्त विश्राम तक जाता है। इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि सब्त कोई धार्मिक बोझ नहीं, बल्कि परमेश्वर का सबसे कोमल उपहार है, और यह भी कि यीशु मसीह में वह उपहार किस तरह पूरा हुआ।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लेख यह पूछते हैं: "सब्त किस दिन मनाया जाए?" हम एक और सवाल से शुरू करेंगे: "इंसान का पहला पूरा दिन कौन-सा था?" उत्पत्ति के अनुसार आदम छठे दिन बनाया गया। इसका अर्थ है कि उसका पहला पूरा दिन सातवाँ दिन था, यानी परमेश्वर का विश्राम का दिन। मनुष्य ने विश्राम कमाया नहीं; वह विश्राम में जागा। उसने काम करके आराम नहीं पाया, उसने आराम से उठकर काम शुरू किया। यही पूरी बाइबल का अनुग्रह-सूत्र है, और यही इस मार्गदर्शिका का धागा रहेगा। सब्त इसलिए दिया गया ताकि हम याद रखें कि सृष्टि और उद्धार, दोनों हमारे परिश्रम से नहीं, परमेश्वर के पूरे किए हुए काम से हैं।
बाइबल सब्त के दिन के बारे में क्या कहती है?
बाइबल में "सब्त" शब्द इब्रानी भाषा के उस मूल से आता है जिसका अर्थ है रुक जाना, थम जाना, काम बंद कर देना। यह थकान का नहीं, पूर्णता का विश्राम है। परमेश्वर थके नहीं थे; उनका काम पूरा हो चुका था।
सबसे पहला उल्लेख सृष्टि के विवरण में मिलता है। उत्पत्ति 2:2-3 कहता है, "और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया, और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया। और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया, क्योंकि उसमें उसने अपनी सृष्टि की रचना के सारे काम से विश्राम लिया।" ध्यान दीजिए कि यहाँ कोई आज्ञा नहीं दी गई, कोई दंड नहीं बताया गया। यहाँ केवल तीन क्रियाएँ हैं: परमेश्वर ने विश्राम किया, आशीष दी, और पवित्र ठहराया। किसी वस्तु को नहीं, किसी स्थान को नहीं, बल्कि समय के एक टुकड़े को पवित्र ठहराया गया। बाइबल में सबसे पहली पवित्र चीज़ कोई मंदिर नहीं, एक दिन है।
और इस दिन में आदम का हिस्सा क्या था? कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि वह उसमें जागा। बगीचा लगाया जा चुका था, नदियाँ बह रही थीं, पशु-पक्षी नाम पाने को तैयार थे। मनुष्य ने इस समृद्धि में एक ईंट भी नहीं जोड़ी थी। पहले उपहार, फिर परिश्रम; यही परमेश्वर का क्रम है।
सदियों बाद, मिस्र की ईंटों की भट्टियों से निकले एक दास-राष्ट्र को सीनै पर्वत पर यह दिन आज्ञा के रूप में सौंपा गया। निर्गमन 20:8-11 में लिखा है, "तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। छ: दिन तो परिश्रम करके अपना सारा काम-काज करना, परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो। क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी और समुद्र, और जो कुछ उन में है, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।"
यह आज्ञा उस समाज में क्रांतिकारी थी। प्राचीन संसार में दास चौबीसों घंटे मालिक की संपत्ति थे। यहाँ परमेश्वर कहते हैं कि बेटा, बेटी, दास, दासी, पशु और परदेशी, सब बराबर विश्राम पाएँगे। सब्त की आज्ञा सबसे पहले उनकी रक्षा करती है जिनके पास "ना" कहने की शक्ति नहीं होती। व्यवस्थाविवरण 5 में यही आज्ञा दोहराई जाती है, पर वहाँ कारण बदल जाता है: वहाँ इस्राएल को याद दिलाया जाता है कि वे मिस्र में दास थे और यहोवा ने उन्हें बलवन्त हाथ से निकाला। इसलिए सब्त के दो स्तंभ हैं, सृष्टि और छुटकारा। एक कहता है, "तुम्हें बनाया गया है।" दूसरा कहता है, "तुम्हें छुड़ाया गया है।" दोनों के केंद्र में वही सत्य है: काम परमेश्वर ने किया, तुमने नहीं।
पर इस्राएल ने जल्दी ही इस उपहार को नियमों की जंजीर बना लिया, और इसी कारण भविष्यद्वक्ता को बीच में आना पड़ा। यशायाह 58:13-14 में परमेश्वर कहते हैं, "यदि तू विश्रामदिन को अशुद्ध न करे अर्थात् मेरे पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने का यत्न न करे, और विश्रामदिन को आनन्द का दिन और यहोवा का पवित्र किया हुआ दिन समझकर आदर के योग्य जाने, और उसका आदर करके अपने मार्ग पर न चले, न अपनी इच्छा पूरी करे, न अपनी ही बातें बोले, तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा, और मैं तुझे देश के ऊँचे स्थानों पर चलने दूँगा, और मैं तेरे मूलपुरुष याकूब के भाग की उपज में से तुझे खिलाऊँगा; यहोवा ही के मुख से यह वचन निकला है।"
यहाँ सब्त को "आनन्द का दिन" कहा गया है। जो दिन कर्तव्य बनकर मन पर बैठ जाता है, परमेश्वर उसे उत्सव कहकर पुकारते हैं। और यह संदर्भ भी ध्यान देने योग्य है: यशायाह 58 का पहला भाग उपवास की उस धार्मिकता की आलोचना करता है जो भूखे को रोटी नहीं देती। सच्चा सब्त और सच्ची दया एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
पुराने नियम में सब्त केवल एक दिन नहीं रहता, वह एक पूरी लय बन जाता है। सातवाँ दिन सप्ताह का विश्राम है, सातवाँ वर्ष भूमि का विश्राम है जब खेत बिना जोते छोड़ दिए जाते हैं, और सात सातवें वर्षों के बाद जुबली का वर्ष आता है जब कर्ज़ माफ़ होते हैं, दास छूटते हैं और ज़मीन अपने असली मालिकों को लौटती है। लैव्यव्यवस्था 25 का यह दृश्य बताता है कि सब्त का दिल क्या है: छुटकारा। परमेश्वर चाहते थे कि उनकी प्रजा का कैलेंडर ही अनुग्रह की घोषणा करे।
पर इस्राएल ने भूमि को विश्राम नहीं दिया, और 2 इतिहास 36 के अनुसार बंधुआई के सत्तर वर्ष इसलिए आए कि देश अपने छूटे हुए सब्त पूरे कर ले। यहाँ एक गंभीर सच्चाई छिपी है: जो विश्राम हम स्वेच्छा से नहीं लेते, जीवन उसे किसी न किसी रूप में हमसे वसूल लेता है।
फिर नए नियम में यीशु मसीह आते हैं, और सब्त का विवाद उनकी सेवकाई का सबसे गरम विषय बन जाता है। वे सब्त के दिन आराधनालय में जाते हैं, वहाँ पढ़ाते हैं, और वहीं लोगों को चंगा करते हैं। जब उनके चेले सब्त के दिन बालें तोड़कर खाते हैं और फरीसी आपत्ति करते हैं, तब वे मरकुस 2:27-28 में वह वाक्य कहते हैं जो पूरे विषय का ताला खोल देता है, "विश्रामदिन मनुष्य के लिये बनाया गया है, न कि मनुष्य विश्रामदिन के लिये। इसलिये मनुष्य का पुत्र विश्रामदिन का भी स्वामी है।" पहला वाक्य उद्देश्य बताता है, दूसरा अधिकार। सब्त इंसान को दिया गया उपहार है, और जो उसका स्वामी है वही बता सकता है कि उसे कैसे मनाया जाए।
यीशु ने सब्त के दिन चंगा करके उसे तोड़ा नहीं, बल्कि उसे उसके असली अर्थ में लौटाया। लूका 13 में अठारह वर्ष से झुकी हुई स्त्री को सीधा करने के बाद वे कहते हैं कि शैतान की बंधी हुई इस अब्राहम की बेटी को सब्त के दिन ही बंधन से छूटना चाहिए था। किस दिन छुटकारा सबसे अधिक शोभा देता है? उसी दिन जो छुटकारे का स्मारक है।
और फिर आता है वह सबसे गहरा दृश्य जिस पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते। शुक्रवार की दोपहर यीशु क्रूस पर कहते हैं, "पूरा हुआ," और अपनी आत्मा सौंप देते हैं। उनका शरीर कब्र में रखा जाता है, और सब्त के दिन वे वहाँ विश्राम करते हैं, क्योंकि काम समाप्त हो चुका था। फिर सप्ताह के पहले दिन, भोर होते ही, वे जी उठते हैं और एक नई सृष्टि का पहला दिन शुरू होता है। जैसे आदम विश्राम में जागा था, वैसे ही नई मानवजाति पूरे किए हुए काम में जागती है। मसीही विश्वासी हर सप्ताह इसी क्रम को दोहराते हैं जब वे पहले दिन इकट्ठा होते हैं। प्रेरितों के काम 20:7 में हम शुरुआती कलीसिया की यह आदत साफ़ देखते हैं, "सप्ताह के पहले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए, तो पौलुस ने जो दूसरे दिन चले जाने पर था, उनसे बातें कीं, और आधी रात तक उपदेश देता रहा।" प्रकाशितवाक्य 1:10 में यूहन्ना इसी दिन को "प्रभु का दिन" कहते हैं।
सूत्र यहीं समाप्त नहीं होता। इब्रानियों 4:9-10 पूरे विषय को अनन्तता तक ले जाता है, "इसलिये परमेश्वर के लोगों के लिये सब्त का विश्राम बाकी है। क्योंकि जिसने उसके विश्राम में प्रवेश किया है, उसने भी परमेश्वर के समान अपने कामों को पूरा करके विश्राम किया।" और प्रकाशितवाक्य 14:13 में स्वर्ग से आवाज़ आती है कि जो प्रभु में मरते हैं वे अपने परिश्रम से विश्राम पाएँगे। सातवें दिन से शुरू हुई यात्रा अनन्त विश्राम में जाकर ठहरती है।
आम भ्रांतियाँ
पहली भ्रांति यह है कि सब्त यहूदी व्यवस्था की उपज है और सृष्टि से उसका कोई लेना-देना नहीं। उत्पत्ति 2:2-3 इसका उत्तर देता है। सीनै पर्वत से सदियों पहले, किसी इस्राएली के जन्म से भी पहले, परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया। विश्राम की लय मनुष्य की बनावट में गूँथी हुई है, ठीक वैसे ही जैसे विवाह और काम। इसलिए जो कहता है कि विश्राम अब मेरे लिए अप्रासंगिक है, वह अपनी ही रचना के विरुद्ध जी रहा है।
दूसरी भ्रांति इसके ठीक उल्टी है: कि जो विश्वासी शनिवार के बजाय रविवार को आराधना करते हैं वे परमेश्वर की आज्ञा तोड़ रहे हैं और उनका उद्धार खतरे में है। यहाँ कुलुस्सियों 2:16-17 बहुत स्पष्ट बोलता है, "इसलिये खाने-पीने या पर्व या नये चाँद या सब्त के दिनों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे। क्योंकि ये सब आनेवाली बातों की छाया हैं, पर मूल वस्तु मसीह की है।" पौलुस दिनों को बुरा नहीं कहते; वे उन्हें छाया कहते हैं। छाया झूठी नहीं होती, वह असली चीज़ की ओर इशारा करती है। जब शरीर सामने आ जाए तो छाया से झगड़ना बेकार है। रोमियों 14:5-6 में भी पौलुस कहते हैं कि कोई एक दिन को दूसरे से बढ़कर मानता है, कोई सब दिनों को एक सा मानता है, और हर एक अपने-अपने मन में निश्चय कर ले। जो चीज़ पौलुस विवेक के लिए छोड़ देते हैं, उसे हम विभाजन का हथियार न बनाएँ।
तीसरी भ्रांति यह है कि सब्त मुख्य रूप से निषेधों की सूची है: यह मत करो, वहाँ मत जाओ, इतने कदम से ज़्यादा मत चलो। यीशु के समय तक रब्बियों ने उनतीस प्रकार के निषिद्ध कामों की विस्तृत सूची बना ली थी, और इसी बोझ के विरुद्ध मरकुस 2:27-28 बोलता है। सब्त मनुष्य के लिए बनाया गया, मनुष्य को नापने का पैमाना बनाने के लिए नहीं। यशायाह 58:13-14 इसे "आनन्द का दिन" कहता है। जिस दिन को परमेश्वर उत्सव कहते हैं, उसे हम परीक्षा न बनाएँ।
चौथी भ्रांति सबसे सूक्ष्म है: कि विश्राम वह इनाम है जो हम मेहनत करके कमाते हैं। आधुनिक जीवन यही सिखाता है, और धार्मिक मन इसे आत्मिक रूप दे देता है, कि पर्याप्त सेवा, पर्याप्त प्रार्थना और पर्याप्त पवित्रता के बाद शायद मन को शांति मिलेगी। पर सृष्टि का क्रम उल्टा है। आदम का पहला दिन विश्राम का दिन था। इब्रानियों 4:9-10 के अनुसार परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है अपने कामों से हाथ खींच लेना और मसीह के पूरे किए हुए काम पर भरोसा रखना। विश्राम मंज़िल नहीं, वह शुरुआती बिंदु है।
आज इसे जीवन में उतारना
सबसे पहले एक व्यावहारिक निर्णय: सप्ताह में एक दिन ऐसा तय कीजिए जिसमें आप कमाने की दौड़ से बाहर खड़े हों। भारत में बहुत से विश्वासियों के लिए रविवार भी पूरी छुट्टी नहीं होता, और कई भाई-बहन ऐसी नौकरियों में हैं जहाँ रविवार सबसे व्यस्त दिन है। ऐसे में सिद्धांत को पकड़िए, दिन को नहीं: चौबीस घंटे का एक ऐसा हिस्सा, जिसमें आप यह मानकर जीते हैं कि संसार आपके बिना भी चलता रहेगा।
विश्राम का मतलब निष्क्रियता नहीं है। मोबाइल पर घंटों स्क्रॉल करने से आत्मा थकती ही है। सब्त का विश्राम वह है जिसमें परमेश्वर की ओर देखा जाता है: वचन पढ़ना, मिलकर आराधना करना, प्रभु भोज में भाग लेना, घर में गीत गाना, और हाँ, पर्याप्त नींद लेना भी। प्रेरितों के काम 20:7 हमें याद दिलाता है कि विश्वासियों का विश्राम अकेलेपन में नहीं, संगति में पूरा होता है। जो व्यक्ति सप्ताह में एक बार भी परमेश्वर के लोगों के बीच नहीं बैठता, वह धीरे-धीरे अपने ही विचारों का कैदी बन जाता है।
पैसे का सवाल अनिवार्य रूप से सामने आएगा। विश्राम करना आर्थिक रूप से महँगा लगता है, क्योंकि रुकने का अर्थ है एक दिन की कमाई छोड़ देना। ठीक यहीं विश्वास की परीक्षा होती है, वैसे ही जैसे जंगल में इस्राएल छठे दिन दोगुना मन्ना इकट्ठा करते थे और सातवें दिन खाली हाथ भरोसा करते थे। विश्राम कहता है कि मेरी रोटी मेरे परिश्रम से नहीं, परमेश्वर की भलाई से आती है।
सब्त दूसरों के लिए भी है। निर्गमन 20:8-11 में दास, दासी, पशु और परदेशी का उल्लेख है। आज इसका अर्थ है कि घर में काम करने वाली बहन, दुकान का कर्मचारी, और वह ड्राइवर जिसे हम सहज ही चौबीस घंटे उपलब्ध मान लेते हैं, उन्हें भी विश्राम मिले। जो मालिक अपने लोगों को साँस नहीं लेने देता, वह सब्त की आज्ञा का सबसे गहरा उल्लंघन करता है, चाहे वह रविवार को सबसे आगे की पंक्ति में बैठता हो।
और परिवार में इसे एक उत्सव बनाइए, नियम नहीं। शनिवार की रात घर को थोड़ा व्यवस्थित कर लेना, रविवार के लिए खाना पहले से तैयार रखना, फोन को एक दराज में बंद कर देना, बच्चों के साथ बैठकर गाना। यशायाह 58:13-14 का "आनन्द का दिन" रसोई और बैठक में भी उतर सकता है।
दर्पण
आपको लगता है कि आप इसलिए नहीं रुकते क्योंकि काम बहुत है। मुझे ईमानदारी से पूछने दीजिए: क्या सच यह नहीं है कि रुकने से डर लगता है? जब तक हाथ चलते रहते हैं, तब तक हमें लगता है कि हम ज़रूरी हैं। और यही वह झूठ है जिसे सब्त तोड़ता है। एक दिन के लिए हाथ रोकिए, और आप देखेंगे कि संसार नहीं रुका। यह अहंकार के लिए अपमान है, पर थकी हुई आत्मा के लिए मुक्ति।
शायद आपका मामला उल्टा हो। शायद आप रविवार को छुट्टी तो लेते हैं पर भीतर से कभी नहीं रुकते। प्रार्थना में भी एक सूची चलती रहती है, सेवा में भी यह डर रहता है कि कहीं परमेश्वर असंतुष्ट न हो जाएँ। आप मसीही होकर भी ईंट बनाते रहते हैं, यह सोचकर कि अनुग्रह अब तक पर्याप्त नहीं हुआ। इब्रानियों 4:9-10 आपके लिए लिखा गया है। उस विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है अपने ही कामों से हाथ खींच लेना और मानना कि क्रूस पर "पूरा हुआ" का मतलब सचमुच पूरा हुआ है।
और शायद आप उस जगह खड़े हैं जहाँ विश्राम विलासिता लगता है। दो नौकरियाँ, बीमार माता-पिता, बढ़ता किराया, और कोई मदद करने वाला नहीं। आपसे मैं नियम की बात नहीं करूँगा। आपसे मैं यीशु के उन शब्दों की बात करूँगा जो उन्होंने थके हुए लोगों से कहे थे, कि जो परिश्रम करने वाले और बोझ से दबे हुए हैं वे उनके पास आएँ और वे उन्हें विश्राम देंगे। वह विश्राम छुट्टी नहीं, एक व्यक्ति है।
सब्त आपसे आपकी शक्ति नहीं, आपका भरम माँगता है।
अपने पिछले सात दिनों को देखिए। उनमें कौन-सा घंटा ऐसा था जब आपने कुछ भी उपयोगी नहीं किया और फिर भी परमेश्वर के सामने प्रसन्न रहे? यदि ऐसा एक भी घंटा नहीं मिलता, तो समस्या आपके कैलेंडर में नहीं, आपके हृदय के धर्मशास्त्र में है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को सब्त समझाने का सबसे आसान तरीका यह है कि उसे आज्ञा नहीं, उपहार की तरह बताएँ। आप कह सकते हैं कि परमेश्वर ने छह दिन में सारी सुंदर चीज़ें बनाईं, आकाश, समुद्र, हाथी, तितलियाँ और अंत में इंसान, और फिर सातवें दिन उन्होंने काम बंद कर दिया। वे थके नहीं थे; वे बस अपनी बनाई हुई दुनिया को देखकर खुश हो रहे थे। और मज़े की बात यह है कि आदम का पहला दिन वही आराम वाला दिन था। उसे कुछ कमाना नहीं पड़ा, बगीचा पहले से तैयार था।
छोटे बच्चों के लिए यह चित्र बहुत शक्तिशाली होता है, क्योंकि वे भी सब कुछ तैयार पाकर ही इस दुनिया में आते हैं। बड़े बच्चों से आप यीशु की वह बात साझा कर सकते हैं कि विश्रामदिन मनुष्य के लिए बनाया गया है, और पूछ सकते हैं कि परिवार में हम एक-दूसरे को आराम कैसे दे सकते हैं। किशोरों के साथ गहरी बातचीत संभव है: पढ़ाई का दबाव, फोन की लत, और यह सवाल कि क्या हमारा मूल्य हमारे नंबरों से तय होता है।
Faith.network पर इस विषय पर उम्र के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, छोटे बच्चों के लिए तीन से छह वर्ष की सरल कहानी के रूप में, सात से बारह वर्ष के बच्चों के लिए प्रश्नों और गतिविधियों के साथ, और बारह वर्ष से ऊपर के किशोरों के लिए उन सवालों के साथ जो वे सचमुच पूछते हैं। जिस उम्र का बच्चा आपके सामने है, उसी के अनुसार सामग्री चुनिए और बातचीत शुरू कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सब्त का दिन क्या है?
सब्त सप्ताह का वह दिन है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के बाद विश्राम के लिए अलग किया और बाद में इस्राएल को आज्ञा के रूप में दिया। उत्पत्ति 2:2-3 के अनुसार परमेश्वर ने सातवें दिन अपने काम से विश्राम किया, उस दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया। इब्रानी भाषा में इस शब्द का अर्थ है रुकना या थमना। यह थकान मिटाने का नहीं, बल्कि पूरे किए गए काम में आनन्द मनाने का दिन है, और इसी कारण यह सदा परमेश्वर के अनुग्रह की ओर इशारा करता है।
सब्त शनिवार है या रविवार?
बाइबल के सातवें दिन का सब्त शुक्रवार सूर्यास्त से शनिवार सूर्यास्त तक था, और यहूदी आज भी इसी को मानते हैं। नए नियम की कलीसिया सप्ताह के पहले दिन, यानी रविवार को इकट्ठी होने लगी, क्योंकि उसी दिन यीशु मसीह जी उठे थे। प्रेरितों के काम 20:7 में विश्वासी पहले दिन रोटी तोड़ने के लिए इकट्ठे होते हैं और प्रकाशितवाक्य 1:10 में यूहन्ना इसे "प्रभु का दिन" कहते हैं। कुलुस्सियों 2:16-17 के अनुसार दिन को लेकर एक-दूसरे पर फैसला सुनाना उचित नहीं।
क्या मसीहियों के लिए सब्त मानना अनिवार्य है?
विश्राम का सिद्धांत सृष्टि में गूँथा हुआ है और हर मनुष्य के लिए अच्छा है, पर इस्राएल को दिए गए विशेष सब्त-नियम मसीह में पूरे हो चुके हैं। कुलुस्सियों 2:16-17 इन दिनों को "आनेवाली बातों की छाया" कहता है जिनकी मूल वस्तु मसीह हैं, और रोमियों 14:5-6 में पौलुस इसे विवेक का विषय बताते हैं। इसलिए नियमित विश्राम और संगति मसीही जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है, पर उद्धार किसी विशेष दिन को मानने पर नहीं, केवल यीशु मसीह पर भरोसे से मिलता है।
क्या सब्त के दिन काम करना पाप है?
यीशु ने स्वयं सब्त के दिन चंगाई का काम किया और अपने चेलों का बचाव किया जब उन्होंने भूख में बालें तोड़कर खाईं। मरकुस 2:27-28 में उन्होंने स्पष्ट कहा कि विश्रामदिन मनुष्य के लिये बनाया गया है, न कि मनुष्य विश्रामदिन के लिये। दया के काम, आवश्यक सेवा और जीवन बचाने वाला परिश्रम कभी सब्त का उल्लंघन नहीं रहे। असली चेतावनी लालच और बेचैनी के विरुद्ध है, उस मानसिकता के विरुद्ध जो कभी रुकना नहीं जानती और दूसरों को भी रुकने नहीं देती।
सब्त और प्रभु के दिन में क्या अंतर है?
सब्त सप्ताह का सातवाँ दिन है जो सृष्टि के पूरे होने की याद दिलाता है, जबकि प्रभु का दिन सप्ताह का पहला दिन है जो यीशु मसीह के पुनरुत्थान और नई सृष्टि की शुरुआत की याद दिलाता है। दोनों के पीछे एक ही धर्मशास्त्र है: परमेश्वर ने काम पूरा किया और हम उसमें प्रवेश करते हैं। आरंभिक कलीसिया ने सब्त को रद्द करने की घोषणा नहीं की, बल्कि पहले दिन इकट्ठे होकर यह मनाया कि कब्र में विश्राम करने वाला प्रभु जी उठा है।
इब्रानियों 4:9-10 में "सब्त का विश्राम" का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 4:9-10 कहता है कि "परमेश्वर के लोगों के लिये सब्त का विश्राम बाकी है। क्योंकि जिसने उसके विश्राम में प्रवेश किया है, उसने भी परमेश्वर के समान अपने कामों को पूरा करके विश्राम किया।" यहाँ लेखक एक दिन से आगे बढ़कर उस अवस्था की बात करते हैं जिसमें विश्वासी अपने प्रयासों से परमेश्वर की स्वीकृति कमाने की कोशिश छोड़ देता है। इसका आंशिक अनुभव आज विश्वास से होता है, और इसकी पूर्णता अनन्त जीवन में मिलेगी, जब सारा परिश्रम समाप्त हो जाएगा।
यीशु ने सब्त के बारे में क्या सिखाया?
यीशु ने सब्त को न तो रद्द किया, न उसे बोझ बनने दिया। वे नियमित रूप से सब्त के दिन आराधनालय जाते थे, वहाँ वचन पढ़ाते थे, और वहीं बीमारों को चंगा करते थे। मरकुस 2:27-28 में उन्होंने इसका उद्देश्य और अपना अधिकार दोनों घोषित किए, कि यह दिन मनुष्य की भलाई के लिए बना है और मनुष्य का पुत्र उसका स्वामी है। उनकी सबसे गहरी शिक्षा शब्दों में नहीं, उनके कार्य में थी: काम पूरा करके वे सब्त के दिन कब्र में विश्राम करते रहे।
क्या सब्त न मानने पर उद्धार खो जाता है?
नहीं। उद्धार केवल अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा, यीशु मसीह में मिलता है, और कोई भी दिन, पर्व या रीति उसमें कुछ जोड़ नहीं सकती। कुलुस्सियों 2:16-17 में पौलुस सीधे मना करते हैं कि कोई सब्त के दिनों के विषय में विश्वासियों पर फैसला सुनाए, क्योंकि मूल वस्तु मसीह हैं। जो समूह किसी विशेष दिन को उद्धार की शर्त बनाते हैं, वे वही गलती दोहराते हैं जिसके विरुद्ध गलातियों की पत्री लिखी गई थी। हाँ, विश्राम की उपेक्षा शरीर और आत्मा को नुकसान ज़रूर पहुँचाती है।
यशायाह 58:13-14 हमें सब्त के बारे में क्या सिखाता है?
यह पद सब्त को "आनन्द का दिन" कहता है, न कि दबाव का दिन। परमेश्वर वहाँ ऐसी आराधना की माँग करते हैं जिसमें हम अपनी ही इच्छाओं और अपने ही कारोबार से हटकर उन पर ध्यान दें, और इसका वादा यह है कि ऐसा व्यक्ति यहोवा के कारण सुखी होगा और ऊँचे स्थानों पर चलेगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसी अध्याय का पहला भाग ऐसे उपवास की निंदा करता है जो भूखे की सुध नहीं लेता, जिससे साफ़ है कि सच्चा विश्राम और दया साथ-साथ चलते हैं।
क्या सब्त की आज्ञा दस आज्ञाओं में सबसे लंबी है?
हाँ, निर्गमन 20:8-11 में दी गई यह आज्ञा दसों में सबसे विस्तृत है, और वह अकेली है जो "स्मरण रखना" शब्द से शुरू होती है। उसमें परिवार, नौकर, पशु और परदेशी तक का नाम लिया गया है, और उसका कारण सृष्टि में ढूँढ़ा गया है। व्यवस्थाविवरण 5 में यही आज्ञा मिस्र से छुटकारे की याद के साथ जुड़ती है। इस विस्तार से पता चलता है कि यह केवल निजी भक्ति नहीं, बल्कि न्याय और करुणा का सामाजिक ढाँचा भी था।
सब्त का दिन शुरू और खत्म कब होता है?
बाइबल की गणना में दिन सूर्यास्त से शुरू होता है, क्योंकि उत्पत्ति के सृष्टि-विवरण में बार-बार कहा गया है कि साँझ हुई, फिर भोर हुई, और इस तरह एक दिन पूरा हुआ। इसलिए सातवें दिन का सब्त शुक्रवार की साँझ से शनिवार की साँझ तक माना जाता था, और यही कारण है कि शुक्रवार को "तैयारी का दिन" कहा जाता था। यह क्रम भी सुंदर है: दिन विश्राम और नींद से शुरू होता है, परिश्रम से नहीं। परमेश्वर काम करते हैं जब हम सोते हैं।
जिनकी नौकरी रविवार को होती है वे क्या करें?
नर्स, पुलिसकर्मी, ड्राइवर, दुकानदार और ऐसी ही कई सेवाओं में काम करने वाले विश्वासियों के लिए यह सवाल बहुत असली है। ऐसे भाई-बहन अपराधबोध में न जिएँ; यीशु ने स्वयं सब्त के दिन दया और आवश्यकता के कामों को उचित ठहराया। सप्ताह में कोई और दिन या कुछ निश्चित घंटे विश्राम और आराधना के लिए अलग कीजिए, कलीसिया की किसी दूसरी सभा या छोटे समूह में जुड़िए, और घर पर परिवार के साथ वचन और प्रार्थना की नियमित लय बनाइए। सिद्धांत पकड़िए, और संभव जितना विश्वासयोग्य रहिए।
अंत में
सब्त की कहानी बगीचे में शुरू होती है, जहाँ एक आदमी ऐसी दुनिया में आँख खोलता है जिसे बनाने में उसका कोई हाथ नहीं था, और वह कहानी अनन्त विश्राम में जाकर पूरी होती है, जहाँ परमेश्वर के लोग अपने परिश्रम से विश्राम पाएँगे। बीच में एक खाली कब्र है, और एक शरीर जो शुक्रवार को "पूरा हुआ" कहने के बाद सब्त के दिन शांत पड़ा रहा।
इसलिए जब आप अगली बार रुकने का निर्णय लें, तो उसे अपनी धार्मिकता का प्रमाण मत बनाइए। उसे एक स्वीकारोक्ति बनने दीजिए कि आपका मूल्य आपके उत्पादन से नहीं आता, आपका भविष्य आपकी मेहनत पर नहीं टिका, और आपकी स्वीकृति किसी सूची के पूरा होने पर निर्भर नहीं।
आगे बढ़ने के लिए उत्पत्ति 2:2-3 को धीरे-धीरे पढ़िए, फिर निर्गमन 20:8-11 और व्यवस्थाविवरण 5 की तुलना कीजिए, और अंत में इब्रानियों 4 को पूरा पढ़ते हुए पूछिए कि किस जगह आप अब भी खुद को साबित करने में लगे हैं। उस जगह हाथ रोक दीजिए। मसीह ने काम पूरा कर दिया है, और आप उसी पूरे किए हुए काम में जागने के लिए बुलाए गए हैं।
