मत्ती 12
पाठ
खेत के किनारे भूखे चेले बालें तोड़ते हैं, और एक विवाद शुरू होता है जो पूरे अध्याय पर छाया रहेगा: सब्त किसका है, और यह आदमी कौन है? यीशु दाऊद और याजकों का हवाला देकर कहते हैं, "यहाँ वह है, जो मन्दिर से भी महान है," फिर आराधनालय में सूखे हाथ वाले को चंगा करते हैं और फरीसी उन्हें मार डालने की सम्मति करने लगते हैं। आगे अंधे-गूँगे की चंगाई पर आरोप लगता है कि वे शैतान की सहायता से काम करते हैं; यीशु पवित्र आत्मा की निन्दा की चेतावनी देते हैं, योना के चिन्ह की बात करते हैं, और अन्त में अपने परिवार की परिभाषा ही बदल देते हैं।
मूल बात
यह अध्याय एक ही प्रश्न के चारों ओर घूमता है: परमेश्वर की पवित्रता किस चीज़ में बसती है, जगह में या व्यक्ति में? मन्दिर इस्राएल के लिए वह बिंदु था जहाँ स्वर्ग धरती को छूता था। यीशु कहते हैं कि वह बिंदु अब चल-फिर रहा है, खेतों से होकर गुज़र रहा है, भूखे लोगों के साथ। और जहाँ परमेश्वर स्वयं उपस्थित हैं, वहाँ व्यवस्था का पालन नियम-गिनती नहीं, दया बन जाता है। होशे का वचन, "मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं," कोई नरम सुझाव नहीं है; यह वाचा का हृदय है। फरीसी व्यवस्था के रक्षक थे, पर उन्होंने व्यवस्था देनेवाले को नहीं पहचाना। यही इस अध्याय की त्रासदी है: सही पुस्तक, सही उत्साह, और फिर भी निर्दोष को दोषी ठहराना।
सूत्र
सृष्टि के सातवें दिन परमेश्वर ने विश्राम किया, और वह विश्राम शापित धरती पर अधूरा छूट गया। सब्त हर सप्ताह उस अधूरे विश्राम की याद दिलाता था। जब यीशु कहते हैं, "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है," तो वे केवल एक नियम पर अधिकार नहीं जता रहे; वे कह रहे हैं कि जिस विश्राम की ओर सारा इतिहास बढ़ रहा था, वह अब आ पहुँचा है। इसीलिए सूखे हाथ का फिर से "दूसरे हाथ के समान अच्छा" हो जाना सब्त का उल्लंघन नहीं, सब्त की पूर्ति है: सृष्टि की मरम्मत। और बलवन्त को बाँधकर घर लूटने की बात इसी कथा का दूसरा छोर है। राज्य आ रहा है शत्रु के इलाके में घुसकर, न कि केवल उपदेश देकर।
दर्पण
हममें से बहुतों के भीतर एक छोटा फरीसी बैठा है, और वह आमतौर पर धर्मी कारणों से बोलता है। वह तब जागता है जब कोई हमसे कम सावधानी से जीता दिखे; जब सहकर्मी नियम तोड़े, जब बेटा रविवार की सेवा छोड़ दे, जब कलीसिया में कोई हमारी शैली से भिन्न ढंग से परमेश्वर की आराधना करे। हम शुद्धता की भाषा में बोलते हैं, पर हमारे भीतर दया नहीं होती। यीशु इसे मुँह से नापते हैं: "जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है।" आपकी पिछली सात दिनों की बातचीत आपके हृदय के भण्डार की सच्ची सूची है। आज एक काम कीजिए: पिछले हफ़्ते आपने जिस व्यक्ति के बारे में सबसे कठोर बात कही थी, उसका नाम कागज़ पर लिखिए और उसके लिए नाम लेकर प्रार्थना कीजिए, फिर वह कागज़ फाड़ दीजिए।
पृष्ठभूमि
यह गलील है, फसल का मौसम, और मत्ती 11 के ठीक बाद, जहाँ यीशु ने "थके हुओं" को विश्राम देने का निमंत्रण दिया था। व्यवस्था के अनुसार किसी के खेत से हाथ तोड़कर खाना चोरी नहीं था; प्रश्न केवल सब्त का था। फरीसी कोई भ्रष्ट वर्ग नहीं थे, बल्कि गंभीर, लोकप्रिय, और रोमी कब्ज़े के बीच इस्राएल की पहचान बचाने को संघर्षरत लोग। उनके लिए सब्त राष्ट्रीय आत्मा का किला था। इसीलिए उनकी प्रतिक्रिया इतनी तीव्र है: यह आदमी किले की दीवार में छेद कर रहा है। और ध्यान दीजिए कि हत्या की योजना वे सब्त के दिन ही बनाते हैं, उसी दिन जिसके बचाव में वे खड़े थे।
श्रोताओं का चेहरा
मत्ती यहूदी विश्वासियों के लिए लिख रहा है, ऐसे लोग जिन पर आरोप था कि वे मूसा की व्यवस्था छोड़ चुके हैं और अपने ही परिवारों से कट चुके हैं। उनके कानों में अंतिम दृश्य आग की तरह पड़ा होगा: "कौन हैं मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई?" जिस संस्कृति में वंश ही पहचान थी, वहाँ यह वाक्य या तो विद्रोह है या एक नई वाचा की घोषणा। उनके लिए यह दूसरी बात थी, और सांत्वना थी: वे अनाथ नहीं, नए परिवार में गोद लिए गए थे। साथ ही यशायाह का उद्धरण उन्हें बताता है कि उनका मसीह बाज़ारों में चिल्लाकर जीतनेवाला नहीं, बल्कि कुचले सरकण्डे को सँभालनेवाला सेवक है, जिस पर अन्यजातियाँ भी आशा रखेंगी।
एक बारीकी
"धुआँ देती हुई बत्ती को न बुझाएगा।" यह दीया नहीं है जो जल रहा हो; यह वह बत्ती है जो बुझ चुकी है और केवल धुआँ छोड़ रही है, बेकार, चुभती हुई, जिसे कोई भी समझदार व्यक्ति चुटकी में बुझा देता। यीशु ऐसा नहीं करते। और यह वाक्य ठीक उस जगह रखा गया है जहाँ उन्हें मार डालने की साज़िश शुरू हुई है। जो उनके विरोधियों की कठोरता का शिकार हुए, उनके लिए यह वचन दवा है। पर इसकी सीमा भी देखिए: वे धुआँ देती बत्ती को नहीं बुझाते, "जब तक न्याय को प्रबल न कराए।" यह कोमलता उदासीनता नहीं; यह उस न्यायी की कोमलता है जो अन्त में सब ठीक करेगा।
चिंतन
मेरे जीवन में सब्त किस चीज़ का किला बन गया है: परमेश्वर की उपस्थिति का, या मेरी अपनी सही होने की भावना का?
यदि मेरे शब्द मेरे हृदय के भण्डार की सूची हैं, तो पिछले सप्ताह की सूची किस भण्डार की ओर इशारा कर रही है?
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Matthew 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 12 का क्या अर्थ है?
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मत्ती 12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे शब्द बता देते हैं कि मेरे भीतर क्या भरा है। कभी कड़वाहट निकलती है, कभी जल्दबाज़ी में कही बात किसी को चोट पहुँचा देती है। मेरे मन को भीतर से साफ़ करिए, ताकि जो बाहर आए वह दूसरों के लिए आशीष बने।
याजक सब्त के दिन सबसे ज़्यादा काम करते थे, और फिर भी निर्दोष ठहरते थे। यीशु कहते हैं, "क्या तुमने व्यवस्था में नहीं पढ़ा कि याजक सब्त के दिन मन्दिर में सब्त के दिन को तोड़ते हैं, फिर भी निर्दोष ठहरते हैं?" मन्दिर की उपस्थिति ने उनके परिश्रम को पवित्र बना दिया। सोचो, तुम्हारे काम को नियम नहीं, बल्कि वह जिसके लिए तुम करते हो, शुद्ध ठहराता है। और अब तुम्हारे पास मन्दिर से भी बड़ा कोई है।
पिता, मेरे मुँह से निकलने वाले हर शब्द को तू सुनता है, यहाँ तक कि वे भी जो मैं बिना सोचे बोल देता हूँ। मुझे माफ़ कर, जहाँ मेरी बातों ने किसी को चोट पहुँचाई। मेरी जीभ को थाम, ताकि मैं ऐसा बोलूँ जिससे लोगों का हौसला बढ़े, न कि टूटे।
शीबा की रानी ने पृथ्वी की छोर से सुलैमान का ज्ञान सुनने के लिए इतनी लंबी यात्रा की। और यीशु कहते हैं, "देखो, यहाँ वह है जो सुलैमान से भी बड़ा है।" वह लोगों के बीच खड़े थे, और लोग ऊबे हुए थे। सोचो, कहीं ऐसा तो नहीं कि जो तुम्हारे पास रोज़ खुली पड़ी है, उसी बाइबल के लिए कोई दूर देश में तरस रहा है? नज़दीकी को लापरवाही मत बनने दो।
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