1 कुरिन्थियों 10:23
पाठ
"सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं" — यह वाक्य पौलुस का अपना नहीं है, यह कुरिन्थ की कलीसिया का नारा है, जिसे वह दो बार उठाकर दोनों बार काट देता है। वह स्वतंत्रता से इनकार नहीं करता; वह उसे एक कसौटी पर रखता है। पहली कसौटी: क्या यह लाभ की है? दूसरी: क्या इससे उन्नति होती है, यानी क्या इससे कोई बनता है? आपके पास अधिकार हो सकता है और फिर भी उस अधिकार का प्रयोग विनाशकारी हो सकता है। मूरत को चढ़ाए मांस के झगड़े के बीचोंबीच पौलुस स्वतंत्रता का प्रश्न "मुझे क्या करने की छूट है" से हटाकर "इससे किसका निर्माण होता है" पर ले जाता है। अगला ही पद इसे खोलकर रख देता है: "कोई अपनी ही भलाई को न ढूँढ़े वरन् औरों की।"
मूल बात
यहाँ ईसाई स्वतंत्रता की परिभाषा ही बदल जाती है। संसार कहता है, स्वतंत्रता का अर्थ है बाधाओं का अभाव। पौलुस कहता है, स्वतंत्रता का अर्थ है ऐसा हृदय जो अब स्वयं का बंदी नहीं रहा और इसलिए दूसरे के लिए खर्च हो सकता है। "उन्नति" के लिए जो यूनानी शब्द यहाँ है, वह है ओइकोदोमेओ, यानी घर बनाना, ईंट पर ईंट रखना। परमेश्वर मापदंड "क्या यह अनुमत है" नहीं रखते, बल्कि "क्या इससे मेरे लोगों का घर खड़ा होता है" रखते हैं। और यह केवल नैतिक सलाह नहीं है, यह मसीह के स्वभाव का प्रतिबिंब है। जो सचमुच सब वस्तुओं का स्वामी था, उसने अपना अधिकार जताया नहीं, उसे छोड़ दिया। जहाँ अधिकार का त्याग दूसरे को खड़ा करता है, वहाँ क्रूस की तर्कशैली दोहराई जाती है। इसीलिए यह पद अनुशासन नहीं, अनुग्रह की व्याकरण है।
साझा सूत्र
इस अध्याय की शुरुआत ही मसीह से हुई थी: "वह चट्टान मसीह था।" जो इस्राएल के साथ जंगल में चलती रही, जिससे प्यास बुझी, वही अब मेज़ पर रोटी और कटोरा है। यानी पद 23 हवा में नहीं टिका; यह उस मसीह की छाया में खड़ा है जो अपने लोगों के साथ चलता है और स्वयं को उनके लिए खर्च करता है। छुटकारे की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: परमेश्वर अपने अधिकार का प्रयोग कुचलने के लिए नहीं, बचाने के लिए करते हैं। इस्राएल ने जंगल में अपनी भूख को कसौटी बनाया और गिरा। मसीह ने अपनी भूख को नहीं, पिता की इच्छा और हमारे उद्धार को कसौटी बनाया और खड़ा रहा। स्वतंत्रता का त्याग यहाँ हार नहीं, उद्धार की विधि है।
दर्पण
यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम अपने अधिकारों की सूची गिनते हैं। दफ़्तर में वह टिप्पणी जो तकनीकी रूप से सही थी पर किसी को छोटा कर गई। पैसे का वह खर्च जो पूरी तरह आपका हक़ है, पर घर में किसी की चिंता बढ़ा गया। सोशल मीडिया पर वह पोस्ट जिसमें हर बात सत्य थी, पर जिससे कोई कमज़ोर विश्वासी ठोकर खा गया। कलीसिया में वह स्वतंत्रता जिसे आप जताना चाहते हैं, ताकि दूसरों को पता चले कि आप उनसे अधिक परिपक्व हैं। पौलुस का प्रश्न बेरहम है: इससे किसका घर बना? आज ही एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके सामने आप हाल ही में अपनी "छूट" जता चुके हैं, और उसके नाम के आगे लिख दीजिए कि इस सप्ताह आप कौन-सी एक बात उसके लिए छोड़ेंगे।
श्रोताओं का चेहरा
कुरिन्थ की कलीसिया में सामाजिक दूरियाँ गहरी थीं। कुछ लोग व्यापारी थे, जिनके धंधे मंदिरों के भोजों से जुड़े थे; कुछ दास थे, जिनके लिए मूरत की हर गंध पुराने डर की याद थी। "ज्ञानी" वर्ग जानता था कि मूरत कुछ भी नहीं, इसलिए वे बेझिझक खाते थे और अपने ज्ञान पर गर्व करते थे। पौलुस उनका धर्मशास्त्र नहीं काटता, उनका अहंकार काटता है। यूनानी संस्कृति में स्वतंत्रता ऊँचे वर्ग का प्रतीक थी; स्वतंत्र पुरुष वही था जिस पर कोई बंधन न हो। ऐसे कानों में यह वाक्य क्रांतिकारी लगा होगा: तुम्हारी स्वतंत्रता की परीक्षा यह नहीं कि तुम कितना कर सकते हो, बल्कि यह कि तुम्हारे कारण कमज़ोर भाई खड़ा हुआ या गिरा।
अंतर्पाठ
पौलुस दो अध्याय पहले यही बात और सीधी कह चुका है: ज्ञान फुलाता है, पर प्रेम बनाता है। वही "बनाना" यहाँ लौट आता है, अब भोजन के ठोस प्रश्न पर लागू होकर। और इसी अध्याय के अंत में वह अपना जीवन उदाहरण के तौर पर रखता है: "अपना नहीं, परन्तु बहुतों का लाभ ढूँढ़ता हूँ, कि वे उद्धार पाएँ।" ध्यान दीजिए, उद्देश्य केवल शिष्टाचार नहीं, उद्धार है। जो अधिकार दूसरे के उद्धार के रास्ते में खड़ा हो जाए, वह अधिकार अपनी वैधता खो देता है। पद 16 की मेज़ यही सिखाती है: एक ही रोटी में भागी होकर हम एक देह बनते हैं, और देह के अंग एक-दूसरे के विरुद्ध अपने हक़ नहीं गिनते।
प्रश्न
तो क्या हर कमज़ोर विवेक मेरी स्वतंत्रता पर वीटो रखता है? यदि हाँ, तो कलीसिया सबसे संवेदनशील व्यक्ति की बंधक बन जाएगी, और यह पौलुस का इरादा नहीं। पद 29 में वह स्वयं झुँझलाकर पूछता है, "भला, मेरी स्वतंत्रता दूसरे के विचार से क्यों परखी जाए?" वह इस तनाव को हल नहीं करता, वह इसे खुला छोड़ देता है। हमें दो चीज़ें एक साथ पकड़नी हैं: स्वतंत्रता वास्तविक है, और प्रेम उसका उपयोग तय करता है। कोई नियम-सूची इस निर्णय को हमारे लिए नहीं ले सकती। इसीलिए पौलुस कहता है, "मैं बुद्धिमान जानकर, तुम से कहता हूँ: जो मैं कहता हूँ, उसे तुम परखो।" यह असुविधाजनक है, पर यही परिपक्वता की क़ीमत है।
चिंतन
कौन-सी एक स्वतंत्रता है जिसे आप इसलिए नहीं छोड़ना चाहते क्योंकि वह आपका हक़ है, न कि इसलिए कि उससे किसी का भला होता है?
अगर आपके इस सप्ताह के निर्णयों को "इससे किसका घर बना" इस एक प्रश्न से मापा जाए, तो सूची कैसी दिखेगी?
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1 कुरिन्थियों 10:23 किस विषय में है?
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1 Corinthians 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इस्राएल के पास मन्ना था, हर सुबह ताज़ा, फिर भी उनका मन मिस्र के मांस पर लगा रहा। कमी नहीं थी, भूख गलत थी। पौलुस कहता है, "ये बातें उनके लिए दृष्टान्त ठहरीं और हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं कि हम उनके समान बुरी वस्तुओं की लालसा न करें।"
सोचो, आज तुम्हारी थाली में परमेश्वर ने जो रखा है, उसे धन्यवाद के साथ खाते हो, या आँखें किसी और की थाली में हैं? उनकी कहानी हमारे लिए आईना बन गई।
पौलुस इस्राएलियों की यात्रा की बात कर रहा है, कि उन सब ने "एक ही आत्मिक चट्टान से पीया, जो उनके साथ-साथ चलती थी, और वह चट्टान मसीह था।"
सोचिए, जंगल की तपती रेत में मसीह उनके साथ-साथ चल रहा था। वह पीछे नहीं रह गया, आगे नहीं बढ़ गया, बस साथ। आज भी वैसा ही है। आपकी थकान भरी राह में वह चट्टान आपके क़दम से क़दम मिलाकर चल रही है, और उसमें से जीवन का जल बहता है। क्या आपने आज उससे पीया?
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