1 कुरिन्थियों 10:31
पाठ
कुरिन्थ के बाज़ार से आती धुएँ और खून की गंध के बीच, जहाँ मंदिर की वेदी पर चढ़ाया गया मांस कसाई की दुकान पर बिकता था, पौलुस एक ऐसा वाक्य रखते हैं जो पूरी बहस को समेट लेता है: "इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।" मूर्ति को चढ़ाया मांस खाएँ या न खाएँ, किसी के घर का निमंत्रण स्वीकार करें या नहीं, इन उलझे सवालों का उत्तर नियमों की लंबी सूची नहीं है, बल्कि एक ही कसौटी है। जो सबसे साधारण है, रोटी का टुकड़ा और प्याले का घूँट, वही अब परमेश्वर की महिमा का क्षेत्र बन जाता है, और इसी से यह तय होता है कि विश्वासी की स्वतंत्रता किस दिशा में बहती है।
मूल
ध्यान दीजिए कि पौलुस यहाँ क्या नहीं कहते। वे यह नहीं कहते कि खाना-पीना तुच्छ है और असली आध्यात्मिकता कहीं ऊपर मंदिर के धुएँ से परे रहती है। यूनानी सोच में शरीर की ज़रूरतें निचले दर्जे की थीं; पौलुस उस विभाजन को तोड़ देते हैं। "सब कुछ" का अर्थ सचमुच सब कुछ है, गले से नीचे उतरता हुआ कौर भी। महिमा का अर्थ यहाँ भावुक उत्साह नहीं, बल्कि यह है कि परमेश्वर का भार, उनका वज़न, मेरे चुनावों में दिखाई दे। और भजन 24:1 का हवाला, "पृथ्वी और उसकी भरपूरी प्रभु की है", इसकी नींव रखता है: कोई भी चीज़ मूर्तियों की नहीं, सब कुछ सृष्टिकर्ता का है। इसलिए विश्वासी भयभीत होकर नहीं, धन्यवाद के साथ जीता है, पर उस धन्यवाद की दिशा दूसरों की भलाई की ओर मुड़ी रहती है।
सूत्र
इस्राएल के इतिहास से पौलुस ने अभी-अभी चेतावनी निकाली है: वे भी बादल के नीचे चले, वही आत्मिक भोजन खाया, वही आत्मिक जल पीया, "और वह चट्टान मसीह था।" यानी मरुभूमि में भी खाना-पीना कभी महज़ पेट का मामला नहीं था; वह परमेश्वर के साथ के रिश्ते का मंच था, और वहीं इस्राएल "खाने-पीने बैठे, और खेलने-कूदने उठे।" मेज़ पर ही विश्वास बना, और मेज़ पर ही टूटा। अब मसीह में वही मेज़ नए रूप में सामने है: प्याला उनके लहू की सहभागिता, रोटी उनकी देह की। इसलिए पद 31 कोई अलग नैतिक सूत्र नहीं, बल्कि उसी कहानी का अंत है, जहाँ यीशु मसीह ने अपनी देह देकर दिखाया कि महिमा का अर्थ क्या है: अपना अधिकार छोड़कर दूसरों की भलाई चुनना।
दर्पण
हम भी सूची बनाना पसंद करते हैं। किस कंपनी का सामान खरीदूँ, किस समारोह में जाऊँ, किस रिश्तेदार की पूजा-थाली के सामने कैसे खड़ा रहूँ, किस सहकर्मी की पार्टी ठुकरा दूँ। पौलुस सूची नहीं देते, वे एक दिशा देते हैं, और यही ज़्यादा चुभता है, क्योंकि सूची पूरी की जा सकती है पर दिशा हर पल तय करनी पड़ती है। यहाँ दो गर्व उघड़ते हैं: उसका गर्व जो कहता है "मुझे सब कुछ उचित है" और अपनी स्वतंत्रता से दूसरों को ठोकर खिलाता है, और उसका गर्व जो नियमों की पवित्रता ओढ़कर दूसरों को तौलता है। दोनों में अपनी ही भलाई ढूँढ़ी जा रही है। आज के खाने की थाली के सामने बैठने से पहले ज़ोर से कहिए: "यह भी परमेश्वर की महिमा के लिये", और उस एक व्यक्ति का नाम लेकर धन्यवाद दीजिए जिसे उस भोजन तक पहुँचाने में मेहनत लगी।
चेहरे
कल्पना कीजिए कुरिन्थ के उस विश्वासी की जो चमड़े का काम करता है। उसका संघ मंदिर के भोजनालय में बैठक रखता है; न जाए तो काम छूटता है। घर में पत्नी अब भी मसीह को नहीं मानती और उसके मायके से निमंत्रण आता है। बाज़ार का सस्ता मांस वही होता है जो वेदी से उतरा है। इस आदमी के लिए पौलुस का वाक्य खाली आदर्श नहीं, रोटी-रोज़ी का सवाल है। पर वह यह भी सुनता है कि उसकी छोटी-सी रोज़मर्रा, जो उसे तुच्छ लगती है, परमेश्वर की नज़र में मंच है। एक दास भी, जिसके पास चुनने को बहुत कम था, सुन सकता था कि उसका खाना-पीना परमेश्वर की महिमा हो सकता है। यह सम्मान उस समाज में क्रांतिकारी था।
प्रश्न
तो क्या सचमुच हर काम परमेश्वर की महिमा के लिए हो सकता है? जब मैं थककर सो जाता हूँ, जब बीमारी में कुछ निगला नहीं जाता, जब दिन मशीन की तरह बीत जाता है, तब महिमा कहाँ है? पौलुस इसका आसान उत्तर नहीं देते, और हमें भी उसे चिकना नहीं करना चाहिए। लेकिन ध्यान दीजिए कि उन्होंने यह बात तब कही जब विषय भोजन का था, न कि प्रचार या प्रार्थना का। शायद इसका अर्थ यह नहीं कि हर पल में हम ऊँची भावना पैदा करें, बल्कि यह कि कोई भी पल परमेश्वर के अधिकार से बाहर नहीं। बाकी मौन में रह जाता है, और वह मौन ईमानदार है।
मुख्य पात्र
इस वाक्य का असली केंद्र परमेश्वर हैं, और पौलुस उन्हें कैसा दिखाते हैं, यह गौर करने लायक है। एक ऐसा परमेश्वर जो ईर्ष्यालु है, "क्या हम प्रभु को क्रोध दिलाते हैं?", और साथ ही उदार, जिसकी पृथ्वी भरपूरी से भरी है और जिसे धन्यवाद के साथ खाया जा सकता है। ये दोनों विरोधी नहीं। जो प्रेम करता है वही बाँटे जाने पर आहत होता है, और जो उदार है वही अपनी देन के दुरुपयोग पर क्रोधित होता है। यही परमेश्वर अपने पुत्र में स्वयं मेज़ पर आकर बैठे, टूटी रोटी बन गए। उनकी महिमा दूरी नहीं माँगती, सहभागिता माँगती है।
चिंतन
इस सप्ताह कौन-सा काम मैंने "आध्यात्मिक नहीं" मानकर परमेश्वर के दायरे से बाहर रख दिया?
मेरी किस स्वतंत्रता से कोई कमज़ोर विश्वासी ठोकर खा सकता है, और क्या मैं उसे छोड़ने को तैयार हूँ?
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1 Corinthians 10:31 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 10:31 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 10:31 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 10:31 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 10:31 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 10:31 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस मूरतों के सामने चढ़ाए माँस की बहस के बीच यह कहता है: "तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्वर की कलीसिया के लिये ठोकर के कारण बनो।" यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि मुझे छूट है या नहीं, बल्कि यह कि मेरी छूट किसी के पाँव में पत्थर तो नहीं बन रही। आज अपने से पूछ: मेरे सही होने से कौन लड़खड़ा रहा है?
पिता, मेरे मन में कई चीज़ें आपकी जगह लेने की कोशिश करती हैं। पैसा, नाम, लोगों की वाहवाही। मुझे ताकत दीजिए कि मैं उनसे दूर भागूँ, न कि उनके साथ समझौता करूँ। मेरा दिल सिर्फ आपका रहे, क्योंकि आप ही मेरे सच्चे परमेश्वर हैं।
पिता, मैं अक्सर पहले अपना ही फायदा देखता हूँ। मेरी सोच को थोड़ा चौड़ा कर दे, ताकि मैं दूसरों की भलाई भी ढूँढ़ूँ। आज किसी एक व्यक्ति के लिए मुझे कुछ छोड़ने का साहस दे, और उसमें तेरी खुशी हो।
इस्राएल के पास मन्ना था, हर सुबह ताज़ा, फिर भी उनका मन मिस्र के मांस पर लगा रहा। कमी नहीं थी, भूख गलत थी। पौलुस कहता है, "ये बातें उनके लिए दृष्टान्त ठहरीं और हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं कि हम उनके समान बुरी वस्तुओं की लालसा न करें।"
सोचो, आज तुम्हारी थाली में परमेश्वर ने जो रखा है, उसे धन्यवाद के साथ खाते हो, या आँखें किसी और की थाली में हैं? उनकी कहानी हमारे लिए आईना बन गई।
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