1 कुरिन्थियों 5
पाठ
कुरिन्थ की कलीसिया में एक व्यक्ति अपने पिता की पत्नी के साथ रह रहा है, और कलीसिया इस पर शोक करने के बजाय अपनी किसी बात पर घमंड कर रही है। पौलुस दूर से ही फैसला सुना देता है: प्रभु यीशु के नाम में इकट्ठे होकर उस मनुष्य को शैतान को सौंप दो, "ताकि उसकी आत्मा प्रभु यीशु के दिन में उद्धार पाए।" फिर वह खमीर और फसह की भाषा में समझाता है कि कलीसिया को अपने भीतर की सड़न निकालनी है; बाहर के संसार का न्याय करना उसका काम नहीं, वह परमेश्वर करते हैं।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि पौलुस आदेश से पहले घोषणा रखता है: "क्योंकि हमारा भी फसह जो मसीह है, बलिदान हुआ है।" पहले तथ्य, फिर माँग। कलीसिया को पवित्र नहीं बनना है ताकि परमेश्वर उसे स्वीकार करें; वह मसीह के बलिदान के कारण पहले से अखमीरी है, और इसीलिए पुराना खमीर वहाँ बेतुका लगता है। यही अनुशासन का धर्मशास्त्र है। यह सज़ा नहीं, सच्चाई है: जो तुम मसीह में हो, वही अपने जीवन में दिखने दो। और लक्ष्य विनाश नहीं, उद्धार है। सबसे कठोर वाक्य के अंत में भी पौलुस उस आदमी के बचाए जाने की बात करता है। परमेश्वर की पवित्रता और उनकी कृपा यहाँ एक-दूसरे के विरोधी नहीं, एक ही चाल के दो कदम हैं।
मुख्य सूत्र
पद 13 का "उस कुकर्मी को अपने बीच में से निकाल दो" पौलुस का अपना वाक्य नहीं है। यह व्यवस्थाविवरण की वह टेक है जो बार-बार लौटती है: बुराई को इस्राएल के बीच से निकाल दो। पौलुस कलीसिया को नए वाचा का वही समुदाय मानता है जिसके बीच परमेश्वर बसते हैं, इसलिए छावनी की पवित्रता की भाषा सीधे कुरिन्थ पर लागू होती है। और खमीर? निर्गमन 12 में फसह के मेमने के बाद सात दिन बिना खमीर की रोटी खाई जाती थी, घर का हर कोना खमीर से साफ किया जाता था। पौलुस कहता है: मेमना बलिदान हो चुका, अब पूरा जीवन वह अखमीरी पर्व है। "इसलिए आओ हम उत्सव में आनन्द मनाएँ।" पवित्रता यहाँ उदासी नहीं, पर्व है।
दर्पण
सबसे चुभने वाली बात पद 2 है: "तुम शोक तो नहीं करते।" कलीसिया का पाप उस आदमी का पाप नहीं था, बल्कि उस पर उसकी बेपरवाही थी। हम भी यही करते हैं, दोनों दिशाओं में। कभी हम अपनी सहनशीलता पर गर्व करते हैं और उसे कृपा कह देते हैं, जबकि असल में हम टकराव से डरते हैं, या उस व्यक्ति के चंदे, रुतबे या रिश्ते को खोना नहीं चाहते। कभी हम कठोरता पर गर्व करते हैं और उसे पवित्रता कह देते हैं, जबकि शोक कहीं नहीं है। पौलुस तीसरा रास्ता दिखाता है: दुख के साथ सच बोलना। जो टूटा है उस पर रोए बिना उसे नाम देना क्रूरता है, और नाम दिए बिना उस पर रोना कायरता है।
आज एक कागज़ पर उस एक बात का नाम लिखिए जिसे आप अपनी कलीसिया में या अपने ही जीवन में जानते हैं और चुपचाप सहते आए हैं। पाँच मिनट परमेश्वर के सामने उस पर शोक कीजिए, बहाना बनाए बिना, फिर वह कागज़ फाड़ दीजिए।
श्रोताओं का चेहरा
कुरिन्थ के लोगों के कानों में पद 11 सबसे तेज़ बजा होगा: "ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना।" उस संस्कृति में भोजन की मेज़ केवल पेट भरने की जगह नहीं थी, वह रिश्तों, संरक्षण और सम्मान का ढाँचा थी। किसी को मेज़ से हटाना उसे समाज के नक्शे से मिटा देना था। और यह बात एक ऐसी कलीसिया से कही जा रही है जो घरों में इकट्ठी होती थी, जहाँ प्रभु भोज और सामान्य भोजन एक ही मेज़ पर होते थे। साथ ही, उन्हें यह भी सुनाई दिया कि उनका आचरण "अन्यजातियों में भी नहीं होता"; रोमी कानून तक ऐसे संबंध को घिनौना कहता था। जिन पर सुसमाचार का प्रकाश पड़ा था, वे अपने बुतपरस्त पड़ोसियों से भी नीचे उतर आए थे।
प्रसंग
पौलुस यह पत्र लगभग 55 ई. में इफिसुस से लिखता है, कुरिन्थ में डेढ़ साल बिताने के बाद। पद 9 बताता है कि यह उसका पहला पत्र नहीं था; वे उसकी पहली चिट्ठी को गलत समझ चुके थे, मानो उन्हें संसार से कट जाना है। कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था: पैसा, आते-जाते व्यापारी, मंदिर, और सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ने की भूख। कलीसिया में अमीर संरक्षक और दास एक साथ बैठते थे, और यही तनाव पूरे पत्र में दिखता है, गुटबाज़ी से लेकर प्रभु भोज तक। इस पृष्ठभूमि में समझ आता है कि उस आदमी के खिलाफ कोई क्यों नहीं बोला: शायद वह कोई प्रभावशाली व्यक्ति था, और कलीसिया ने अपनी "आत्मिक स्वतंत्रता" को ढाल बना लिया था।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ अनुपस्थित पर सबसे ज़ोरदार आवाज़ है: "मैं तो शरीर के भाव से दूर था, परन्तु आत्मा के भाव से तुम्हारे साथ होकर।" यह किसी घायल अहंकार का बदला नहीं है; उस आदमी ने पौलुस के साथ कुछ नहीं किया। जो उसे तोड़ता है वह मसीह के शरीर की बदनामी और उस मनुष्य का खतरा है। इसलिए उसका फैसला भी दो हाथों से आता है: एक हाथ बाहर धकेलता है, दूसरा उस दिन की ओर इशारा करता है जब वही आत्मा बचाई जाएगी। बाद में, दूसरे कुरिन्थियों में, वही पौलुस कलीसिया से कहेगा कि पश्चाताप करने वाले को माफ करो और प्रेम में लौटा लो। यही परमेश्वर का चेहरा है: उनका न्याय कभी अंतिम उद्देश्य नहीं होता, बचाना होता है।
चिंतन
कहाँ मैं अपनी चुप्पी को कृपा कहकर उस शोक से बच रहा हूँ जिसकी पौलुस माँग करता है?
अगर मसीह मेरा फसह पहले ही बलिदान हो चुका है, तो मेरे जीवन का कौन सा "पुराना खमीर" अब बेतुका हो गया है और फिर भी मैंने उसे रखा हुआ है?
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1 Corinthians 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 5 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 5 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि हमारा फसह, मसीह, हमारे लिए बलिदान हुआ। उसके लहू ने हमें ऐसा शुद्ध किया कि अब हम नया गूँधा हुआ आटा हैं। धन्यवाद कि पुराना ख़मीर हम पर राज नहीं करता, क्योंकि यीशु ने हमें सचमुच अख़मीरी बना दिया है।
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