बाइबल व्याख्या

1 कुरिन्थियों 9

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस अचानक अपनी सफाई देने लगता है, मानो कुरिन्थुस की सभा में कोई खड़ा होकर पूछ रहा हो: "तू सचमुच प्रेरित है?" वह जवाब में सवालों की झड़ी लगा देता है, "क्या मैं स्वतंत्र नहीं? क्या मैं प्रेरित नहीं?", और फिर एक-एक करके गिनाता है कि उसे रोटी, संगिनी और वेतन का पूरा हक था, जैसे सिपाही को तनख्वाह और चरवाहे को दूध। पर वह हक उसने कभी वसूला नहीं, "कि हमारे द्वारा मसीह के सुसमाचार की कुछ रोक न हो।" इसके बाद वह अपनी असली रणनीति खोलता है: सबका दास बनना, सबके लिये सब कुछ बनना। और अंत में अखाड़े की धूल: दौड़, मुक्केबाजी, और अपनी ही देह को वश में लाना।

मूल मर्म

यहाँ अधिकार और उसके त्याग का सवाल है, और यही सुसमाचार का आकार है। पौलुस यह नहीं कहता कि उसका हक झूठा था; वह जोर देकर सिद्ध करता है कि हक असली है, व्यवस्था से, मन्दिर की परंपरा से, और स्वयं प्रभु की आज्ञा से, "कि जो लोग सुसमाचार सुनाते हैं, उनकी जीविका सुसमाचार से हो।" फिर वह उसे नीचे रख देता है। सिद्ध किया हुआ अधिकार जब स्वेच्छा से छोड़ा जाता है, तभी वह प्रेम बनता है। कुरिन्थुस की कलीसिया अपनी "स्वतंत्रता" पर इतराती थी; पौलुस दिखाता है कि स्वतंत्रता का सबसे ऊँचा उपयोग किसी और के भले के लिये खुद को बाँध देना है। परमेश्वर का राज्य दावों से नहीं, दावे छोड़ने से आगे बढ़ता है।

सूत्र

पौलुस जो कर रहा है, वह उसने खुद ईजाद नहीं किया। वह एक ऐसे व्यक्ति की चाल दोहरा रहा है जिसके पास सारे अधिकार थे और जिसने एक भी नहीं जताया। "सबसे स्वतंत्र होने पर भी मैंने अपने आपको सब का दास बना दिया है" वाक्य में मसीह की पूरी कहानी दबी हुई है: जो परमेश्वर के स्वरूप में था, उसने दास का रूप धारण किया। फिलिप्पियों 2 में पौलुस इसी नमूने को गीत की तरह गाता है; यहाँ वह उसे अपने बटुए और अपने भोजन पर लागू करता है। यही सुसमाचार का सूत्र है, आदि से अंत तक: परमेश्वर अपनी सामर्थ्य छोड़कर नहीं, बल्कि सामर्थ्य को प्रेम में झुकाकर हमें बचाते हैं। क्रूस किसी हक की वसूली नहीं, हक का त्याग है। और जो उस क्रूस का प्रचार करता है, उसका जीवन भी उसी आकार का होना चाहिए, वरना संदेश और संदेशवाहक एक-दूसरे को झूठा ठहराते हैं।

आइना

हम अधिकार गिनने में माहिर हैं। दफ्तर में वह श्रेय जो आपके नाम से नहीं गया। घर में वह धन्यवाद जो कभी नहीं कहा गया, हालाँकि आपने ही पूरा रविवार रसोई में बिताया। वह पैसा जो भाई ने लौटाया नहीं। वह माफी जो आपकी बकाया है और आप जानते हैं कि आप सही हैं। पौलुस आपके सही होने को नकारता नहीं; वह उसे पूरे तीन पन्नों तक साबित करता है। सवाल यह है कि साबित होने के बाद आप क्या करते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपका जायज़ दावा ही वह पत्थर बन जाए जिससे किसी और के लिये "सुसमाचार की कुछ रोक" हो जाए।

आज एक कागज़ पर वह एक हक लिखिए जिसे आप इस हफ्ते वसूलना चाहते थे, और उसके नीचे लिखिए: "यह मैं छोड़ता हूँ।" फिर उसे ज़ोर से पढ़कर प्रार्थना में परमेश्वर के हाथ में सौंप दीजिए।

मुख्य पात्र

पौलुस यहाँ असहज रूप से नंगा दिखता है। एक आदमी जो कहता है कि उसे घमण्ड नहीं, और फिर स्वीकारता है कि यही एक चीज़ है जिस पर उसका घमण्ड है, और अगर कोई उसे छीन ले तो "इससे तो मेरा मरना ही भला है।" वह अपनी बुलाहट को चुनाव की तरह नहीं, मजबूरी की तरह जीता है: "यह तो मेरे लिये अवश्य है; और यदि मैं सुसमाचार न सुनाऊँ, तो मुझ पर हाय!" यह किसी उत्साही स्वयंसेवक की भाषा नहीं, पकड़े गए आदमी की भाषा है। और उसमें अकेलापन भी है, कि बाकी सब प्रेरित सभा के खर्च पर चलते हैं, "केवल मुझे और बरनबास को ही जीवन निर्वाह के लिए काम करना चाहिए।" यह वह व्यक्ति है जो अपनी सफाई देते-देते अपना घाव दिखा बैठता है।

संदर्भ

कुरिन्थुस, लगभग सन् 54 का व्यापारिक बंदरगाह, पैसे और प्रतिष्ठा का शहर। वहाँ घूमने वाले वक्ता शिष्यों से शुल्क लेते थे, और धनी संरक्षक किसी शिक्षक को पालना अपनी शान समझते थे। पैसा लेने का मतलब था किसी का मुँह देखकर बोलना। पौलुस ने यह जंजीर पहनने से इनकार किया, और इसकी कीमत चुकाई: अपने हाथों से तम्बू सीना उस समाज में मजदूर का काम था, दार्शनिक का नहीं। कुरिन्थ के कुछ लोगों को यही शक की वजह लगी, इसलिए "जो मुझे जाँचते हैं" वाला वाक्य। और शहर के पास ही हर दो साल इस्थमियन खेल होते थे; भीड़ पहलवानों का संयम और वह मुरझा जाने वाला पत्तियों का मुकुट अपनी आँखों से जानती थी। पौलुस उनकी ही भाषा उठाकर उन्हें अखाड़े में खींच लाता है।

कठिन प्रश्न

अंतिम वाक्य कड़वा है: "ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके, मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ।" पौलुस, जिसने अनुग्रह पर पूरी चिट्ठियाँ लिखीं, अपने बारे में ऐसा सोच सकता है? हम फुर्ती से समझाना चाहेंगे कि वह केवल इनाम की बात कर रहा है, उद्धार की नहीं। हो सकता है। पर ध्यान दीजिए, वह अपनी सुरक्षा के किसी सिद्धांत के सहारे आराम से बैठा नहीं है; वह दौड़ रहा है जैसे हारना संभव हो, और अपनी देह को "मारता कूटता" है जैसे यह गंभीर बात हो। यहाँ आश्वासन और सतर्कता एक साथ खड़े हैं, और पौलुस उन्हें अलग नहीं करता। अनुग्रह दौड़ को रद्द नहीं करता, वह दौड़ने की ताकत देता है। जो व्यक्ति कहता है "मुझे कोई खतरा नहीं", उसने यह अध्याय नहीं पढ़ा।

चिंतन

आपके पास कौन सा जायज़ अधिकार है जिसका इस्तेमाल किसी के लिये सुसमाचार की राह में पत्थर बन सकता है?

"सबके लिये सब कुछ बनना" और अपनी पहचान खो देना, इन दोनों के बीच की रेखा आप अपने जीवन में कहाँ खींचते हैं?

1 Corinthians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 1 Corinthians

David Prior

Church problems, cross shaped answers: Corinth feels very modern.

Paul For Everyone: 1 Corinthians

N.T. Wright

Wright's readable guide through love, gifts and resurrection.

1 Corinthians: An Introduction and Commentary

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1 Corinthians

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1 Corinthians 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 कुरिन्थियों 9 का क्या अर्थ है?
पौलुस अचानक अपनी सफाई देने लगता है, मानो कुरिन्थुस की सभा में कोई खड़ा होकर पूछ रहा हो: "तू सचमुच प्रेरित है?" वह जवाब में सवालों की झड़ी लगा देता है, "क्या मैं स्वतंत्र नहीं? क्या मैं प्रेरित नहीं?", और फिर एक-एक करके गिनाता है कि उसे रोटी, संगिनी और वेतन का पूरा हक था, जैसे सिपाही को तनख्वाह और चरवाहे को दूध। पर वह हक उसने कभी वसूला नहीं, "कि हमारे द्वारा मसीह के सुसमाचार की कुछ रोक न हो।" इसके बाद वह अपनी असली रणनीति खोलता है: सबका दास बनना, सबके लिये सब कुछ बनना। और अंत में अखाड़े की धूल: दौड़, मुक्केबाजी, और अपनी ही देह को वश में लाना।
1 कुरिन्थियों 9 किस विषय में है?
पौलुस जो कर रहा है, वह उसने खुद ईजाद नहीं किया। वह एक ऐसे व्यक्ति की चाल दोहरा रहा है जिसके पास सारे अधिकार थे और जिसने एक भी नहीं जताया। "सबसे स्वतंत्र होने पर भी मैंने अपने आपको सब का दास बना दिया है" वाक्य में मसीह की पूरी कहानी दबी हुई है: जो परमेश्वर के स्वरूप में था, उसने दास का रूप धारण किया। फिलिप्पियों 2 में पौलुस इसी नमूने को गीत की तरह गाता है; यहाँ वह उसे अपने बटुए और अपने भोजन पर लागू करता है। यही सुसमाचार का सूत्र है, आदि से अंत तक: परमेश्वर अपनी सामर्थ्य छोड़कर नहीं, बल्कि सामर्थ्य को प्रेम में झुकाकर हमें बचाते हैं। क्रूस किसी हक की वसूली नहीं, हक का त्याग है। और जो उस क्रूस का प्रचार करता है, उसका जीवन भी उसी आकार का होना चाहिए, वरना संदेश और संदेशवाहक एक-दूसरे को झूठा ठहराते हैं।
1 कुरिन्थियों 9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक कागज़ पर वह एक हक लिखिए जिसे आप इस हफ्ते वसूलना चाहते थे, और उसके नीचे लिखिए: "यह मैं छोड़ता हूँ।" फिर उसे ज़ोर से पढ़कर प्रार्थना में परमेश्वर के हाथ में सौंप दीजिए।
1 कुरिन्थियों 9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कुरिन्थुस, लगभग सन् 54 का व्यापारिक बंदरगाह, पैसे और प्रतिष्ठा का शहर। वहाँ घूमने वाले वक्ता शिष्यों से शुल्क लेते थे, और धनी संरक्षक किसी शिक्षक को पालना अपनी शान समझते थे। पैसा लेने का मतलब था किसी का मुँह देखकर बोलना। पौलुस ने यह जंजीर पहनने से इनकार किया, और इसकी कीमत चुकाई: अपने हाथों से तम्बू सीना उस समाज में मजदूर का काम था, दार्शनिक का नहीं। कुरिन्थ के कुछ लोगों को यही शक की वजह लगी, इसलिए "जो मुझे जाँचते हैं" वाला वाक्य। और शहर के पास ही हर दो साल इस्थमियन खेल होते थे; भीड़ पहलवानों का संयम और वह मुरझा जाने वाला पत्तियों का मुकुट अपनी आँखों से जानती थी। पौलुस उनकी ही भाषा उठाकर उन्हें अखाड़े में खींच लाता है।
1 कुरिन्थियों 9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके पास कौन सा जायज़ अधिकार है जिसका इस्तेमाल किसी के लिये सुसमाचार की राह में पत्थर बन सकता है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Corinthians 9 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है," पौलुस कहता है। खिलाड़ी जानता है कि कौन सी चीज़ उसे धीमा कर देगी, और वह उसे छोड़ देता है। उसका इनाम? पत्तों का एक मुकुट, जो कुछ दिनों में सूख जाता है।

तू किस बात के लिए खुद को रोक रहा है? अगर एक मुरझानेवाले मुकुट के लिए इतना अनुशासन संभव है, तो जो कभी नहीं मुरझाता, उसके लिए तेरा "ना" कहना कितना हल्का हो जाता है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 4

पिता, धन्यवाद कि आपने अपने सेवकों को "खाने और पीने का अधिकार" दिया है। आप उनकी रोटी और पानी की चिंता करते हैं जो सुसमाचार सुनाते हैं। धन्यवाद कि पौलुस ने प्रेम के कारण अपना यह अधिकार छोड़ना चुना, और हमें भी ऐसा ही मन दीजिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

पौलुस पूछता है, "क्या हमें यह अधिकार नहीं, कि किसी मसीही बहन को विवाह करके साथ लिये फिरें, जैसा अन्य प्रेरित और प्रभु के भाई और कैफा करते हैं?" उसके पास यह हक था, फिर भी उसने इसे छोड़ दिया। सोचो, वह अकेलापन उसने किसी मजबूरी में नहीं, प्रेम में चुना। तुम्हारे पास भी कुछ ऐसा है जो तुम्हारा हक है, पर क्या मसीह के लिए तुम उसे जाने दे सकते हो?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 10

पिता, मैं हल चलाता हूँ पर फसल दिखती नहीं। फिर भी तू कहता है कि आशा के साथ मेहनत करना बेकार नहीं जाता। मेरे थके हाथों को यह भरोसा दे कि जो बोया है, उसका फल तेरे समय पर मिलेगा। मुझे धीरज और उम्मीद से काम करना सिखा।

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