2 कुरिन्थियों 5:21
पाठ
पौलुस एक ही वाक्य में सुसमाचार का पूरा गणित रख देते हैं: "जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।" जिसने कभी पाप को भीतर से जाना ही नहीं, उसे परमेश्वर ने हमारी जगह पाप ठहराया। और इसका मकसद कोई कानूनी औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह कि हम, जो सचमुच दोषी थे, मसीह में होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ। दो पक्ष, दो अदला-बदली, एक ही कार्य में। यह वाक्य उस निवेदन का आधार है जो अभी-अभी पिछली आयत में सुनाई दिया: "परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो।"
मूल बात
ध्यान दीजिए, यहाँ यह नहीं लिखा कि मसीह ने पाप किया, न ही यह कि उन्हें पापी घोषित किया गया। लिखा है: उन्हें "पाप ठहराया"। परमेश्वर ने अपने निर्दोष पुत्र को उस स्थान पर रखा जहाँ हमारा दोष खड़ा था। और बदले में हमें वह स्थान मिला जो कभी हमारा नहीं था। यह अदला-बदली असंतुलित है, और जानबूझकर असंतुलित है। इसमें परमेश्वर की पवित्रता और उनकी दया दोनों एक साथ खड़ी हैं: पाप को हल्के में नहीं लिया गया, उसका पूरा भार उठाया गया, पर उठाया किसी और ने। इसीलिए मेल मिलाप कोई समझौता नहीं जिसमें दोनों पक्ष कुछ छोड़ते हैं। यहाँ सब कुछ परमेश्वर की ओर से आया, जैसा आयत अठारह कहती है: "सब बातें परमेश्वर की ओर से हैं।"
सूत्र
पुराने नियम में पाप की भेंट का पूरा तंत्र इसी दिशा में इशारा करता था। हाथ पशु के सिर पर रखा जाता, दोष सौंपा जाता, और निर्दोष प्राणी दोषी के स्थान पर मरता। पर वह व्यवस्था अपने ही भीतर अधूरी थी, क्योंकि पशु स्वेच्छा से नहीं मरता और उसका जीवन इंसान के जीवन के बराबर नहीं। यशायाह ने उस दास का चित्र दिया जो दूसरों के अपराधों के कारण घायल हुआ, और वहीं छाया ठोस होने लगी। पौलुस अब कहते हैं कि छाया समाप्त हुई: जो पाप से अज्ञात था, वही भेंट बना। इसीलिए आयत सत्रह में "नई सृष्टि" की भाषा आती है। सृष्टि नई तभी हो सकती है जब पुराना हिसाब सचमुच चुका दिया गया हो, न कि टाल दिया गया हो।
दर्पण
अब यह आयत आपकी ओर मुड़ती है। आप शायद उन लोगों में हैं जो रविवार को यह सब मानते हैं और सोमवार सुबह फिर अपने आप को साबित करने निकल पड़ते हैं: बच्चों के सामने बेहतर पिता या माता दिखने की कोशिश, दफ़्तर में यह डर कि कोई आपकी अक्षमता भाँप न ले, मंडली में यह चिंता कि लोग जानें कि आप कितने काम के हैं। इस आयत के सामने वह सारी दौड़ बेमानी हो जाती है, और यही चुभता है। क्योंकि अगर धार्मिकता उपहार है, तो आपकी मेहनत का श्रेय भी आपका नहीं रहा। दूसरी ओर, आप शायद वह हैं जो अपनी किसी पुरानी बात को अब तक माफ़ नहीं कर पाए, जो रात में छत देखते हुए सोचते हैं कि परमेश्वर सचमुच जानते तो शायद स्वीकार न करते। उनसे यह आयत कहती है: वे जानते थे, और उन्होंने अपने पुत्र को आपकी जगह रखा। आपकी शर्म आपके उद्धार से बड़ी नहीं।
एक बारीकी
"हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ" पर रुकिए। पौलुस यह नहीं लिखते कि हम धार्मिकता पा जाएँ, बल्कि लिखते हैं कि हम धार्मिकता बन जाएँ। यह भाषा उतनी ही तीखी है जितनी "पाप ठहराया"। जैसे मसीह पर हमारा दोष कोई बाहरी लेबल नहीं था, बल्कि उन्होंने उसे सचमुच अपने ऊपर ओढ़ा, वैसे ही यह धार्मिकता आपके ऊपर कोई ढीला चोगा नहीं जो हवा चलने पर उड़ जाए। और यह "उसमें होकर" है, आपके भीतर से नहीं। आपकी नई पहचान का स्रोत आपके बाहर है, मसीह में सुरक्षित, इसलिए वह आपके अच्छे और बुरे दिनों के साथ ऊपर-नीचे नहीं होती। यही कारण है कि आयत सात कह सकी: "हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं।"
प्रसंग
कुरिन्थुस की मंडली में पौलुस पर सवाल उठ रहे थे। कुछ प्रभावशाली उपदेशक आ चुके थे जो वक्तृत्व, सिफ़ारिशी पत्र और प्रभावशाली उपस्थिति के दम पर बड़े दिखते थे, और उनकी तुलना में पौलुस कमज़ोर, पिटा हुआ, बीमार शरीर वाला आदमी था। इसीलिए वे आयत बारह में उन लोगों का ज़िक्र करते हैं "जो मन पर नहीं, वरन् दिखावटी बातों पर घमण्ड करते हैं।" उस ग्रीक शहर में सम्मान और लज्जा ही समाज की मुद्रा थे; आदमी की कीमत इस बात से तय होती थी कि लोग उसे कैसे देखते हैं। ऐसे माहौल में यह आयत बम की तरह गिरती है: तुम्हारी सारी हैसियत मसीह के क्रूस से आती है, तुम्हारे प्रदर्शन से नहीं।
मुख्य पात्र
इस आयत का असली कर्ता परमेश्वर हैं। "उसने ठहराया" वाला वह, जो न मजबूर थे, न बाध्य। किसी ने उनसे यह नहीं माँगा; संसार तो अपने अपराधों में मस्त था। फिर भी पहल उनकी ओर से आई, और उन्होंने वह कीमत चुकाई जो उन पर बकाया नहीं थी। यहाँ एक ऐसे परमेश्वर का चेहरा दिखता है जो न्याय को हल्का नहीं करते और फिर भी दोषी को नहीं छोड़ते। आयत उन्नीस में उनका हृदय खुल जाता है: "उनके अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाया।" यह भूल जाना नहीं है, यह उठा लेना है। और जो परमेश्वर ऐसा करते हैं, उनसे डरकर भागने का अब कोई कारण नहीं बचा।
चिंतन
आज आप किस चीज़ से अपनी योग्यता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, और अगर वह छिन जाए तो क्या आप फिर भी "परमेश्वर की धार्मिकता" कहलाएँगे?
आपके अतीत की कौन-सी बात है जिसे आप अब तक अपने ऊपर ढोए हुए हैं, हालाँकि परमेश्वर ने उसे मसीह पर रख दिया है?
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2 Corinthians 5:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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2 कुरिन्थियों 5:21 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 5:21 किस विषय में है?
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2 कुरिन्थियों 5:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 5:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह बात वहाँ कहता है जहाँ वह समझा रहा है कि अब वह किसी को शरीर के अनुसार नहीं पहचानता। "इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।" ध्यान दे, यह कल की आशा नहीं, बीता हुआ काम है। तो जिस इंसान को तू आज तक उसके पुराने रूप में देखता आया है, क्या तू उसे नई सृष्टि मान पाएगा?
पौलुस कहता है, "यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये; और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं।" कुरिन्थ के लोग उस पर हँसते थे कि वह जुनूनी है, पागल है। पौलुस बचाव नहीं करता, बस इतना कहता है कि उसकी दीवानगी परमेश्वर के सामने है, और उसकी समझदारी उनकी भलाई के लिए।
सोचो, क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा है? जो आँसू, जो प्रार्थनाएँ दुनिया को बेतुकी लगें, वे परमेश्वर के लिए हों; और जो शब्द तुम बोलते हो, वे दूसरे की भलाई के लिए।
पौलुस ने अभी अभी लिखा है कि हम शरीर में हों या शरीर से अलग, हमारी असली चाहत क्या है? यही, "हम यही लक्ष्य रखते हैं, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें, हम उसे भाते रहें।"
सोचो, न स्वर्ग पाना लक्ष्य है, न दुख से बचना। बस उसे भाना। जैसे एक बच्चा दिनभर की छोटी छोटी बातों में पिता की मुस्कान ढूँढता है। आज तुम्हारा लक्ष्य क्या है?
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