बाइबल व्याख्या

1 यूहन्ना 5:16

बाइबल
यह वचन The way द्वारा समर्पित है

पाठ

यूहन्ना अपनी चिट्ठी के अंत में प्रार्थना की बात करते-करते अचानक एक बहुत ही ठोस परिस्थिति सामने रख देते हैं: तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारा कोई भाई पाप करता है। तुम उसे देख रहे हो। और यूहन्ना कहते हैं कि उस पल तुम्हारा पहला काम उसके बारे में राय बनाना नहीं, बल्कि उसके लिए विनती करना है, "तो विनती करे, और परमेश्वर उसे उनके लिये… जीवन देगा।" फिर वे एक काँटा छोड़ देते हैं, जिसे वे खुद खोलकर नहीं समझाते: "पाप ऐसा भी होता है जिसका फल मृत्यु है इसके विषय में मैं विनती करने के लिये नहीं कहता।" आदेश नहीं, निषेध भी नहीं; बस एक खुला, असहज वाक्य।

मर्म

इस आयत की जड़ यह है कि परमेश्वर दूसरों के जीवन को आपकी प्रार्थना से जोड़ने के लिए तैयार हैं। यह छोटी बात नहीं। पिछली आयतों में यूहन्ना ने कहा था कि हम उनकी इच्छा के अनुसार माँगें तो वे सुनते हैं; अब वे दिखाते हैं कि वह "इच्छा" कैसी दिखती है। यह अपने लिए कुछ पाने का साहस नहीं, बल्कि गिरते हुए भाई के लिए जीवन माँगने का साहस है। और ध्यान दीजिए कि जीवन देनेवाले आप नहीं हैं, "परमेश्वर उसे… जीवन देगा।" आप केवल माँगनेवाले हैं। यही अनुग्रह का ढाँचा है: परमेश्वर बचाते हैं, पर वे अपने बच्चों को उस बचाने के काम में खड़ा होने देते हैं, मध्यस्थ के रूप में, न्यायाधीश के रूप में नहीं।

सूत्र

मध्यस्थता की यह रेखा पूरे बाइबल में खिंची हुई है। मूसा पहाड़ पर से उतरकर परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं और विद्रोही लोगों के लिए अपना नाम तक दाँव पर लगा देते हैं; अब्राहम सदोम के लिए मोल-भाव करते हैं। पर वह सब केवल छाया थी उस एक के लिए जो "पानी और लहू के द्वारा आया", जिसने न केवल हमारे लिए प्रार्थना की, बल्कि हमारे पाप को अपने ऊपर उठा लिया। यूहन्ना इसी चिट्ठी में पहले कह चुके हैं कि पिता के पास हमारा एक सहायक है। इसलिए जब आप किसी गिरते हुए भाई के लिए विनती करते हैं, तो आप कोई नई चीज़ नहीं कर रहे; आप मसीह के काम में शामिल हो रहे हैं, उनकी प्रार्थना के पीछे अपनी छोटी आवाज़ मिला रहे हैं। कलीसिया इसी तरह जीवित रहती है: एक-दूसरे को पकड़े हुए हाथों से।

दर्पण

ईमानदारी से पूछिए: जब आप किसी विश्वासी को गिरते देखते हैं, तो आपके भीतर पहली हरकत क्या होती है? अक्सर दो में से एक। या तो एक गुप्त संतोष, कि देखो, वह भी वैसा ही निकला, और अब आपकी अपनी कमज़ोरियाँ कम बुरी लगने लगती हैं। या फिर एक थकी हुई दूरी, कि यह मेरा मामला नहीं, मैं क्यों उलझूँ। यूहन्ना दोनों रास्ते बंद कर देते हैं। वे यह नहीं कहते कि पाप को पाप मत कहो; वे कहते हैं कि देखने के बाद का अगला कदम घुटने हैं, गपशप नहीं, ग्रुप में भेजा गया संदेश नहीं, चाय पर की गई चिंता-भरी टिप्पणी नहीं। और जो काँटा वे छोड़ते हैं, वह भी हमें चुभे: आप यह तय करने के अधिकारी नहीं हैं कि कौन अब प्रार्थना के लायक़ नहीं रहा। यह वाक्य न्याय करने की छूट नहीं, बल्कि चेतावनी है कि पाप सचमुच घातक हो सकता है।

आज, इसी समय: जिस विश्वासी भाई या बहन के पाप से आप पिछले महीने चिढ़े या निराश हुए हैं, उसका नाम काग़ज़ पर लिखिए और उसी नाम के लिए दो मिनट ज़ोर से विनती कीजिए, "परमेश्वर, इसे जीवन दीजिए।" फिर वह काग़ज़ फाड़ दीजिए, किसी को न बताइए।

एक बारीकी

ध्यान दीजिए कि यूहन्ना "भाई" शब्द चुनते हैं। बाहरवाले की बात नहीं हो रही; यह परिवार के भीतर का दृश्य है। और वे "ऐसा पाप करते देखे" कहते हैं, यानी यह कोई अफ़वाह नहीं, आपने खुद देखा। बाइबल में देखना अक्सर ज़िम्मेदारी पैदा करता है। जिसने देखा, वह अब उदासीन नहीं रह सकता। यही वह बिंदु है जहाँ धर्म और प्रेम अलग होते हैं: धार्मिक आदमी देखकर दूरी बनाता है, प्रेमी देखकर पास आता है। और सबसे कोमल बात यह है कि यहाँ प्रार्थना का विषय दंड नहीं, "जीवन" है। आप अपने भाई के पाप के बारे में परमेश्वर से शिकायत करने नहीं, उसके लिए जीवन माँगने जाते हैं।

पृष्ठभूमि

यह चिट्ठी पहली सदी के अंत में एशिया माइनर की उन छोटी घरेलू कलीसियाओं को लिखी गई, जिनसे कुछ लोग अभी-अभी टूटकर निकल गए थे। उन्होंने सिखाया था कि यीशु सचमुच देह में नहीं आए, और शायद यह भी कि देह में जो किया जाए उससे आत्मा अशुद्ध नहीं होती। ऐसे माहौल में "पाप" कोई सैद्धांतिक सवाल नहीं था; वह दरवाज़े पर खड़ा था। बीस-तीस लोगों की एक मंडली में, जहाँ सब एक-दूसरे का घर, काम और शर्म जानते हैं, किसी का गिरना सबको दिखता है। यूहन्ना ऐसे समुदाय से कह रहे हैं कि तुम्हारे पास एक-दूसरे के लिए अनुशासन से पहले एक हथियार है: विनती।

श्रोता

वे सुननेवाले डरे हुए थे। जो लोग चले गए थे, उन्होंने पीछे रह गए विश्वासियों के मन में संदेह बो दिया था: क्या हम सच में परमेश्वर के हैं? और अगर हमारे बीच का कोई गिर गया, तो क्या सब खत्म? इस पृष्ठभूमि में यह आयत उनके कानों में पहले आश्वासन की तरह पड़ी होगी, डर की तरह नहीं। अधिकांश पाप, यूहन्ना कह रहे हैं, ऐसे हैं "जिसका फल मृत्यु न हो"; उनके लिए माँगो और परमेश्वर जीवन देंगे। जो लोग जानबूझकर मसीह से मुँह मोड़कर निकल गए, उनका मामला परमेश्वर के हाथ में छोड़ दो। यह उदासीनता नहीं, सीमा का ज्ञान है, और उस सीमा के भीतर प्रार्थना की अपार जगह।

चिंतन

पिछली बार जब आपने किसी विश्वासी का गिरना देखा, तो वह बात आपकी जबान तक पहुँची या आपकी प्रार्थना तक?

क्या आपके मन में कोई ऐसा नाम है जिसे आपने चुपचाप "अब कुछ नहीं हो सकता" की सूची में डाल दिया है, और यह फ़ैसला आपने किस अधिकार से किया?

1 John में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of John's Letters

David Jackman

Assurance, love and truth in John's letters, warmly explained.

Early Christian Letters For Everyone

N.T. Wright

James, Peter, John and Jude in short accessible readings.

The Letters of John: An Introduction and Commentary

John Stott

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Letters of John

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1 John 5:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 यूहन्ना 5:16 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना अपनी चिट्ठी के अंत में प्रार्थना की बात करते-करते अचानक एक बहुत ही ठोस परिस्थिति सामने रख देते हैं: तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारा कोई भाई पाप करता है। तुम उसे देख रहे हो। और यूहन्ना कहते हैं कि उस पल तुम्हारा पहला काम उसके बारे में राय बनाना नहीं, बल्कि उसके लिए विनती करना है, "तो विनती करे, और परमेश्वर उसे उनके लिये.
1 यूहन्ना 5:16 किस विषय में है?
मध्यस्थता की यह रेखा पूरे बाइबल में खिंची हुई है। मूसा पहाड़ पर से उतरकर परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं और विद्रोही लोगों के लिए अपना नाम तक दाँव पर लगा देते हैं; अब्राहम सदोम के लिए मोल-भाव करते हैं। पर वह सब केवल छाया थी उस एक के लिए जो "पानी और लहू के द्वारा आया", जिसने न केवल हमारे लिए प्रार्थना की, बल्कि हमारे पाप को अपने ऊपर उठा लिया। यूहन्ना इसी चिट्ठी में पहले कह चुके हैं कि पिता के पास हमारा एक सहायक है। इसलिए जब आप किसी गिरते हुए भाई के लिए विनती करते हैं, तो आप कोई नई चीज़ नहीं कर रहे; आप मसीह के काम में शामिल हो रहे हैं, उनकी प्रार्थना के पीछे अपनी छोटी आवाज़ मिला रहे हैं। कलीसिया इसी तरह जीवित रहती है: एक-दूसरे को पकड़े हुए हाथों से।
1 यूहन्ना 5:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, इसी समय: जिस विश्वासी भाई या बहन के पाप से आप पिछले महीने चिढ़े या निराश हुए हैं, उसका नाम काग़ज़ पर लिखिए और उसी नाम के लिए दो मिनट ज़ोर से विनती कीजिए, "परमेश्वर, इसे जीवन दीजिए।" फिर वह काग़ज़ फाड़ दीजिए, किसी को न बताइए।
1 यूहन्ना 5:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह चिट्ठी पहली सदी के अंत में एशिया माइनर की उन छोटी घरेलू कलीसियाओं को लिखी गई, जिनसे कुछ लोग अभी-अभी टूटकर निकल गए थे। उन्होंने सिखाया था कि यीशु सचमुच देह में नहीं आए, और शायद यह भी कि देह में जो किया जाए उससे आत्मा अशुद्ध नहीं होती। ऐसे माहौल में "पाप" कोई सैद्धांतिक सवाल नहीं था; वह दरवाज़े पर खड़ा था। बीस-तीस लोगों की एक मंडली में, जहाँ सब एक-दूसरे का घर, काम और शर्म जानते हैं, किसी का गिरना सबको दिखता है। यूहन्ना ऐसे समुदाय से कह रहे हैं कि तुम्हारे पास एक-दूसरे के लिए अनुशासन से पहले एक हथियार है: विनती।
1 यूहन्ना 5:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछली बार जब आपने किसी विश्वासी का गिरना देखा, तो वह बात आपकी जबान तक पहुँची या आपकी प्रार्थना तक?
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1 John 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

और उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं," यूहन्ना यह उस समय लिख रहा है जब विश्वासी सताए जा रहे थे। फिर भी वह कहता है कि बोझ आज्ञा में नहीं, हमारे मन में होता है। जिससे हम प्रेम करते हैं, उसकी बात मानना कभी भारी नहीं लगता। सोचो, परमेश्वर की कौन सी बात तुम्हें आज भारी लग रही है? शायद सवाल आज्ञा का नहीं, प्रेम के ठंडे पड़ जाने का है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।" यूहन्ना यह नहीं कहता कि जिसके पास ज्ञान है, या जिसके पास अच्छे काम हैं। वह कहता है, जिसके पास पुत्र है। जीवन कोई चीज़ नहीं, एक व्यक्ति है। तो आज खुद से पूछ लो, मेरे पास मसीह के बारे में जानकारी है, या मसीह खुद?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, आपने मुझे अपना बनाया, यह सोचकर ही मन भर आता है। जब मैं यीशु पर भरोसा करता हूँ, तो आपके परिवार का हिस्सा बन जाता हूँ। मुझे सिखाइए कि आपसे प्रेम करने का मतलब आपके बच्चों से भी प्रेम करना है, चाहे वे मुझसे कितने भी अलग हों।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

और वह गवाही यह है कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है, और यह जीवन उसके पुत्र में है।" ध्यान दो, यूहन्ना यह नहीं कहता कि जीवन तुम्हारे प्रयासों में है, या तुम्हारी अच्छाई में। वह कहता है, यह जीवन पुत्र में है। यानी जहाँ मसीह है, वहीं जीवन है। तो सवाल यह नहीं कि तुमने कितना कमाया, बल्कि यह कि तुम उससे कितने जुड़े हो।

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