1 यूहन्ना 5:13
पाठ
"मैंने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिए लिखा है कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है।" एक पूरी पत्री के अंत में लेखक रुककर बताता है कि उसने यह सब क्यों लिखा। उसका उद्देश्य यह नहीं था कि पाठक डरते रहें, अपने भीतर झाँकते रहें और हर सुबह नए सिरे से अपने विश्वास की जाँच करें। उद्देश्य था निश्चय: कि जो लोग पुत्र के नाम पर भरोसा रखते हैं, वे यह जान लें, अनुमान न लगाएँ, आशा भर न करें, बल्कि जानें, कि अनन्त जीवन अब उनका है। ठीक पहले के पद ने इसे और तीखा कहा था: "जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है।" यह पद उस वाक्य का दस्तखत है।
मूल
यहाँ दो शब्द एक-दूसरे से बँधे हैं: "विश्वास" और "जानो"। बहुत से लोग सोचते हैं कि विश्वास वहीं खत्म होता है जहाँ जानना शुरू होता है, मानो भरोसा एक कमज़ोर अटकल हो। यह पद उलटा कहता है: विश्वास ही जानने का रास्ता है, क्योंकि उसका आधार हमारी भावनाएँ नहीं, परमेश्वर की गवाही है। पद 11 ने वह गवाही साफ़ रख दी: "परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है और यह जीवन उसके पुत्र में है।" यानी अनन्त जीवन कोई ऐसी वस्तु नहीं जो मसीह से अलग हाथ में पकड़ाई जाए; वह पुत्र के भीतर है, और इसलिए जिसके पास पुत्र है उसके पास वह है। और ध्यान दें, यह वर्तमान काल है। अनन्त जीवन मृत्यु के बाद मिलनेवाला इनाम भर नहीं, वह आज की सम्पत्ति है। यही कारण है कि निश्चय घमंड नहीं बनता: जो चीज़ पूरी तरह दान में मिली है, उस पर कोई छाती नहीं फुला सकता, केवल विश्राम कर सकता है।
सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में "जीवन" एक ऐसा शब्द है जो अदन की वाटिका से शुरू होकर यहीं आकर खुलता है। जीवन का वृक्ष खो गया, और उसके बाद परमेश्वर अपने लोगों को बार-बार जीवन के सामने खड़ा करते हैं: व्यवस्थाविवरण के अंत में मूसा इस्राएल से कहता है कि उनके आगे जीवन और मृत्यु रखी है, जीवन चुनो, और वह जीवन प्रभु से चिपके रहने में है। पुराने नियम में जीवन परमेश्वर की उपस्थिति में बने रहने का नाम है, न कि केवल लम्बी उम्र। यूहन्ना इस धारे को उठाकर एक व्यक्ति में बाँध देता है। अब जीवन चुनना किसी नियम-सूची से चिपकना नहीं, बल्कि पुत्र से चिपकना है। इसलिए पद 12 का "जिसके पास पुत्र है" इतना निर्णायक है: अदन का खोया वृक्ष अब एक व्यक्ति के रूप में सामने आ खड़ा है।
दर्पण
यह पद उस डर पर हाथ रखता है जिसे धार्मिक लोग सबसे अच्छे ढंग से छिपाते हैं। आप सभा चलाते हैं, दूसरों को सिखाते हैं, और फिर रात को बिस्तर पर लेटे हुए सोचते हैं कि यदि आज मैं मर जाऊँ तो क्या सचमुच सब ठीक है। आपको याद आते हैं वे दिन जब गुस्सा फूटा, वह ईमेल जो झूठ था, वह ठंडापन जो पत्नी या पति के साथ है। और भीतर की आवाज़ कहती है: ऐसे लोगों को अनन्त जीवन नहीं मिलता। यूहन्ना उस आवाज़ का उत्तर आपकी प्रगति दिखाकर नहीं, परमेश्वर की गवाही दिखाकर देता है। निश्चय आत्म-परीक्षा से नहीं, मसीह की ओर देखने से आता है। आज यह करें: पद 11 और 12 को एक काग़ज़ पर अपने हाथ से लिखें, उसके नीचे अपना नाम लिखें, और उसे ऊँची आवाज़ में एक बार पढ़ें।
श्रोताओं का चित्र
इस पत्री के पहले पाठक एक टूटी हुई मंडली के बचे हुए लोग थे। कुछ शिक्षक उठे थे जो कहते थे कि मसीह देह में सचमुच नहीं आया, कि लहू और क्रूस उसकी कहानी का असली हिस्सा नहीं। ये लोग अपने आप को आगे बढ़े हुए, गहरे ज्ञानी मानते थे, और जब उन्होंने मंडली छोड़ी तो पीछे रहनेवालों के मन में यह सवाल बैठ गया: कहीं असली लोग वही न हों और हम पीछे छूट गए हों? इसीलिए यूहन्ना बार-बार कहता है "हम जानते हैं"। उनके कानों में यह पद एक प्रमाणपत्र की तरह पड़ा होगा: तुम जो पुत्र के नाम पर भरोसा रखते हो, तुम्हें किसी नए रहस्य की, किसी ऊँचे अनुभव की ज़रूरत नहीं। जो तुम्हारे पास पहले से है, वही सब कुछ है।
संदर्भ
पहली सदी का अंत, एशिया माइनर के शहर, सम्भवतः इफिसुस के आसपास घरों में जुड़ती छोटी कलीसियाएँ। पत्री लिखी गई थी पढ़ने के लिए नहीं, सुनाने के लिए: कोई खड़ा होकर इसे पूरी सभा के सामने पढ़ता, और सुननेवाले एक-दूसरे के चेहरे देखते। इन शहरों में धर्म सार्वजनिक और राजनीतिक था; मंदिर, संघ, व्यापारिक समुदाय, सब देवताओं से जुड़े थे। जो मसीह के पीछे चला, उसने अपनी सामाजिक जगह, ग्राहक और इज़्ज़त खोई। इसीलिए पत्री का अंतिम वाक्य मूरतों से बचे रहने की चेतावनी है, जो हमें दूर की बात लगती है पर उनके लिए रोज़ी-रोटी का सवाल था। ऐसे दबाव में "तुम जानो" केवल धार्मिक आराम नहीं था; वह टिके रहने की ताक़त थी।
अन्तर्पाठ
यूहन्ना का सुसमाचार अपने अंत के पास ठीक ऐसा ही उद्देश्य-वाक्य रखता है: वहाँ लिखा गया कि लोग विश्वास करें और जीवन पाएँ; यहाँ लिखा गया कि जो विश्वास करते हैं, वे जानें कि जीवन उनका है। पहला दरवाज़ा खोलता है, दूसरा भीतर आए हुए को बैठने के लिए कुर्सी देता है। यूहन्ना 5:24 में यीशु कहते हैं कि सुननेवाला मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँच चुका है, वही वर्तमान काल जो इस पद में धड़क रहा है। पर शास्त्र यह निश्चय बिना तनाव नहीं देता। मत्ती 7 में यीशु कुछ लोगों से कहते हैं कि वे उन्हें कभी जानते ही नहीं थे, और इसी अध्याय के पद 16 से 18 में यूहन्ना पाप और मृत्यु की गंभीर बात करता है। दोनों को एक साथ रखना ज़रूरी है: निश्चय लापरवाही का लाइसेंस नहीं, बल्कि उन लोगों को दिया गया विश्राम है जो परमेश्वर की गवाही पर टिके हैं और उसे झूठा नहीं ठहराते।
मनन
आपका निश्चय किस पर खड़ा है: इस सप्ताह आपके आत्मिक प्रदर्शन पर, या परमेश्वर की उस गवाही पर जो उन्होंने अपने पुत्र के विषय में दी है?
यदि अनन्त जीवन आज आपकी सम्पत्ति है, तो इस सोमवार के आपके काम, पैसे और रिश्तों में क्या ठोस फ़र्क पड़ना चाहिए?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
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1 John 5:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 यूहन्ना 5:13 का क्या अर्थ है?
1 यूहन्ना 5:13 किस विषय में है?
1 यूहन्ना 5:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 यूहन्ना 5:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 यूहन्ना 5:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 John 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, दुनिया की टूट और अंधेरा कभी कभी बहुत भारी लगता है। फिर भी मुझे याद रहे कि मैं तेरा हूँ, तेरे हाथ में सुरक्षित। जो बुराई चारों ओर दिखती है, वह मेरी पहचान नहीं बदल सकती। मुझे थामे रख, और मेरे भीतर आशा जगाए रख।
धन्यवाद पिता, कि आपके सामने हमें यह हियाव होता है कि जब हम आपकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, आप हमारी सुनते हैं। मेरी टूटी फूटी प्रार्थनाएँ भी आपके कानों तक पहुँचती हैं, यह जानकर मन शांत हो जाता है। धन्यवाद कि आप कभी मुँह नहीं मोड़ते।
जब हम मनुष्यों की गवाही मान लेते हैं, तो परमेश्वर की गवाही तो उससे बढ़कर है।"
सोचो, डॉक्टर की रिपोर्ट पर तुम भरोसा कर लेते हो, बैंक के कागज़ पर, किसी दोस्त की बात पर। बिना जाँचे मान लेते हो। फिर परमेश्वर जब अपने पुत्र के विषय में गवाही देता है, वहीं मन अटक जाता है, वहीं सबूत माँगने लगता है।
आज खुद से पूछो: किसकी बात मुझे सबसे भारी लगती है? अगर परमेश्वर की गवाही सबसे बड़ी है, तो मेरा डर उससे बड़ा क्यों बैठा है?
धन्यवाद, पिता, कि जब मैं अपने भाई को पाप करते देखता हूँ, तो मैं हाथ बाँधकर खड़ा नहीं रहता, बल्कि प्रार्थना कर सकता हूँ, और तू उसे जीवन देता है। मेरी टूटी-फूटी विनती को तू सुनता है और गिरे हुए को उठाता है, इसके लिए मेरा मन तेरा आभारी है।
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