1 थिस्सलुनीकियों 5:18
पाठ
पौलुस तीन छोटे आदेशों की लड़ी में तीसरा मोती पिरोता है: सदा आनन्दित रहो, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो, और फिर यह, "हर बात में धन्यवाद करो।" वाक्य इतना छोटा है कि उसे पढ़ते हुए आँख फिसल जाती है, पर उसकी पूँछ में काँटा है: "क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यहीं इच्छा है।" यानी जिस परमेश्वर की इच्छा खोजने में लोग उम्र गँवा देते हैं, वह इच्छा यहाँ खुली पड़ी है, और वह किसी बड़े निर्णय या बुलाहट की शक्ल में नहीं, बल्कि हर परिस्थिति के भीतर उठने वाले धन्यवाद की शक्ल में सामने आती है। ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहता कि हर बात के लिये धन्यवाद करो, बल्कि हर बात में।
मर्म
थिस्सलुनीके के इन नए विश्वासियों के पास धन्यवाद का कोई सहज कारण नहीं था। उन्होंने मूर्तियों से मुँह मोड़ा था, इसलिए पड़ोसियों, व्यापारिक संघों और शायद अपने ही घरवालों से कट गए थे। पौलुस उन्हें भावनाओं का अभिनय नहीं सिखा रहा; वह उनके सामने एक आधार रख रहा है जो हालात से गहरा है। वही आधार उसने कुछ पंक्तियाँ पहले खोल दिया था: "परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिए ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।" जब परमेश्वर का अंतिम रुख आपकी ओर अनुग्रह का है, तब धन्यवाद यथार्थ से भागना नहीं, बल्कि सबसे गहरे यथार्थ को स्वीकार करना है। "मसीह यीशु में" यही बताता है: कृतज्ञता स्वभाव नहीं, स्थान है, और वह स्थान मसीह हैं।
सूत्र
धन्यवाद इस्राएल के लिए कोई भावुक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि एक बलिदान था। मंदिर में धन्यवाद-बलि चढ़ाई जाती थी: एक आदमी छुड़ाया गया, बीमारी से उठा, समुद्र से लौटा, और वह पशु लेकर आता था ताकि सार्वजनिक रूप से कहे कि बचानेवाला कौन है। कृतज्ञता हमेशा स्मृति से जुड़ी थी, और स्मृति हमेशा मिस्र से निकाले जाने से। फिर वह रात आई जिसमें यीशु ने रोटी ली और धन्यवाद किया, जबकि मेज़ पर विश्वासघात बैठा था और सामने क्रूस खड़ा था। वहीं "हर बात में" का असली रूप दिखता है। मसीह ने उस रात अपने हालात के लिए धन्यवाद नहीं किया; उन्होंने पिता के प्रति अपने भरोसे को धन्यवाद की शक्ल दी। कलीसिया का हर धन्यवाद उसी रात की गूँज है।
दर्पण
आप जानते हैं कि आपके भीतर कृतज्ञता कहाँ अटकती है। उस सहकर्मी पर जिसे वह पद मिला जिसके लिए आपने दस साल दिए। उस रिश्तेदार पर जो हर त्यौहार पर ताना मारता है। उस रिपोर्ट पर जो डॉक्टर ने शांत आवाज़ में पढ़ी थी। हम धन्यवाद को इनाम समझते हैं: जब हालात ठीक होंगे, तब करेंगे। पौलुस इसे उलट देता है, क्योंकि वह जानता है कि कृतज्ञता हालात की रसीद नहीं, परमेश्वर के चरित्र पर हस्ताक्षर है। और वह यह भी जानता है कि जो आदमी कुछ भी धन्यवाद योग्य नहीं पाता, वह धीरे-धीरे कड़वा होता जाता है, और कड़वाहट अंधकार की संतानों का स्वभाव है, दिन की संतानों का नहीं। आज, अपनी सबसे भारी परिस्थिति का नाम काग़ज़ पर लिखिए, और उसके ठीक नीचे एक वाक्य में लिखिए कि उस परिस्थिति के भीतर परमेश्वर ने आपको क्या दिया है। फिर वह वाक्य ज़ोर से बोलकर पढ़िए।
पृष्ठभूमि
थिस्सलुनीके रोमी मकिदुनिया की राजधानी थी, बंदरगाह वाला शहर, वीया एग्नातिया नामक महामार्ग उसके बीच से गुज़रता था, और उसे "स्वतंत्र नगर" का विशेषाधिकार प्राप्त था, जो उसने सम्राट के प्रति निष्ठा से कमाया था। शहर की दीवारों पर रोम की "शान्ति और सुरक्षा" का नारा खुदा था, वही जिसे पौलुस पद तीन में व्यंग्य से दोहराता है। हवा में मछली, धुएँ और बलि की चर्बी की गंध थी। ग्रीक में धन्यवाद के लिए शब्द है यूखारिस्तिया, और वह निजी भावना नहीं, सार्वजनिक कर्म था: संरक्षक का नाम लेकर, भीड़ के सामने, कभी पत्थर पर खुदवाकर। व्यापारिक संघ के भोज में देवता को धन्यवाद दिया जाता था; जो वहाँ चुप रहता, वह ग्राहकों और रोज़ी से हाथ धोता। पौलुस का आदेश इन लोगों के लिए आर्थिक जोखिम था।
शास्त्र की गूँज
यही पौलुस बाद में फिलिप्पियों को जेल की कोठरी से लिखेगा कि चिन्ता मत करो, बल्कि धन्यवाद के साथ अपनी विनती परमेश्वर के सामने रखो। दोनों जगह धन्यवाद और प्रार्थना एक ही साँस में आते हैं, और दोनों बार लिखनेवाला आराम में नहीं है। यह संयोग नहीं: पौलुस ऐसा उपदेश नहीं दे रहा जिसे उसने खुद चखा न हो। और पीछे मुड़कर देखें तो अंतिम भोज की मेज़ है, जहाँ यीशु ने पकड़वाए जाने की रात रोटी लेकर धन्यवाद किया। कलीसिया ने उस भोज को ही धन्यवाद का नाम दे दिया। इसलिए रविवार को प्रभु भोज में हाथ बढ़ाना अभ्यास है उसी चीज़ का जो पौलुस सोमवार से शनिवार तक माँगता है।
कठिन प्रश्न
पर क्या यह आदेश उस माँ पर भी लागू होता है जिसने अभी बच्चा दफनाया है? ईमानदारी से: पौलुस कहता है "हर बात में", और वह अपवाद की सूची नहीं देता। यह खटकता है, और खटकना चाहिए। दो बातें ध्यान रखें। पहली, वह "के लिये" नहीं कहता; बुराई को भला कहने की कोई माँग यहाँ नहीं है। दूसरी, यह आदेश बहुवचन में है, पूरी कलीसिया को। जब एक व्यक्ति के भीतर कोई धन्यवाद बचा ही न हो, तब उसकी जगह समुदाय गाता है, ठीक वैसे जैसे पद चौदह में निर्बलों को सम्भालने को कहा गया है। फिर भी प्रश्न पूरी तरह हल नहीं होता, और मैं उसे ज़बरदस्ती बंद नहीं करूँगा। कुछ आँसू इस जीवन में धन्यवाद में नहीं बदलते; वे उस दिन की प्रतीक्षा करते हैं जिसकी चर्चा इसी अध्याय के आरम्भ में है।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसे आपने चुपचाप धन्यवाद की पहुँच से बाहर घोषित कर रखा है, और क्यों?
थिस्सलुनीके के विश्वासियों के लिए खुलकर परमेश्वर को धन्यवाद देना सामाजिक और आर्थिक जोखिम था; आपके जीवन में कृतज्ञता की कौन सी कीमत है जिसे चुकाने से आप बचते रहे हैं?
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1 Thessalonians 5:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 थिस्सलुनीकियों 5:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 थिस्सलुनीकियों 5:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Thessalonians 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि तुम ज्योति की सन्तान बन जाओ, वह कहता है, "क्योंकि तुम सब ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान हो।" यह तुम्हारा काम नहीं, तुम्हारी पहचान है। रात अब तुम्हारा पता नहीं रही। तो फिर अंधेरे में छिपाकर रखी वह एक बात क्यों पाल रहे हो, जो तुम्हारे घर की नहीं है?
देखो, कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे; पर सदा भलाई करने पर तत्पर रहो, आपस में और सब से भी।" ध्यान दो, पौलुस उस कलीसिया से यह कह रहा है जो सता ली जा रही थी। बदला लेने का हक उनके पास था, फिर भी उन्हें भलाई में तत्पर रहने को कहा गया। जिसने तुम्हें चोट पहुँचाई, आज उसके लिए तुम्हारे हाथ में क्या है?
इसलिए हम औरों के समान सोते न रहें, पर जागते और सावधान रहें।"
सोना बुरा नहीं, पर यहाँ बात उस नींद की है जिसमें आदमी जीते जी सब कुछ भूल जाता है। पौलुस कहता है, तू अंधकार की संतान नहीं, तू ज्योति की संतान है। जागना किसी डर से नहीं, बल्कि इस उम्मीद से कि जो आनेवाला है वह तेरा प्रभु है।
आज अपने आप से पूछ: मेरे दिल का कौन सा हिस्सा सो गया है? वहीं से जागना शुरू कर।
पत्री के अंत में पौलुस बड़ी बातें नहीं, बल्कि एक छोटी सी बात कहता है: "सब भाइयों को पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो।" विश्वास सिर्फ मन में नहीं रहता, वह हाथ मिलाने, गले लगाने, नाम लेकर पुकारने तक उतरता है। सोचो, कलीसिया में कौन है जिससे तुम नज़रें चुराकर निकल जाते हो? शायद इस रविवार की सबसे बड़ी आज्ञा यही हो कि तुम उसके पास जाकर नमस्कार करो।
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