बाइबल व्याख्या

1 तीमुथियुस 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

इफिसुस की एक भरी हुई कोठरी में तीमुथियुस पत्र खोलता है। बाहर बहस की आवाज़ें हैं, वंशावलियों और कहानियों पर लड़ते लोग, जो व्यवस्था के शिक्षक बनना चाहते हैं। पौलुस लिखते हैं: उन्हें रोको, क्योंकि आज्ञा का सारांश विवाद नहीं, "शुद्ध मन और अच्छे विवेक, और निष्कपट विश्वास से प्रेम" है। फिर पत्र अचानक मुड़ता है और पौलुस अपने ही बारे में बोलने लगते हैं: निन्दा करनेवाला, सतानेवाला, "सबसे बड़ा" पापी, जिस पर दया हुई। अंत में तीमुथियुस को सौंपी गई ज़िम्मेदारी: अच्छी लड़ाई लड़ता रह, विवेक को थामे रह, क्योंकि कुछ लोगों का "विश्वास रूपी जहाज डूब गया।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि पौलुस झूठी शिक्षा का इलाज सही शिक्षा से नहीं, बल्कि प्रेम से बताते हैं। यह चौंकाने वाला है। आज्ञा का लक्ष्य ऐसा प्रेम है जो तीन जड़ों से उगता है: शुद्ध मन, अच्छा विवेक, निष्कपट विश्वास। जहाँ ये तीन सूख जाते हैं, वहाँ धर्म बकवाद बन जाता है। और परमेश्वर के बारे में सबसे गहरी बात इसी के आगे आती है: वे "हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर" हैं, जिनका सुसमाचार पापियों को खोजता है, न कि सुयोग्य लोगों को। व्यवस्था अच्छी है, पर उसका काम है घाव दिखाना, दवा देना नहीं। इसलिए पौलुस की धर्मविद्या कभी ठंडी नहीं होती: वह हर बार अपनी ही कहानी पर आ गिरती है, जहाँ दया ने उन्हें पकड़ा।

सूत्र

पौलुस मसीह यीशु को "हमारी आशा के आधार" कहते हैं, और यह पूरे बाइबल की कहानी का धागा है। इस्राएल को व्यवस्था मिली थी, और व्यवस्था भली है, पर उसने कभी किसी को नया मन नहीं दिया। भविष्यद्वक्ता एक ऐसे दिन की बाट जोहते रहे जब परमेश्वर स्वयं आकर अपने लोगों को बचाएँगे। पद 15 उस लंबी प्रतीक्षा का उत्तर है: "मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया।" यह वाक्य पौलुस के समय की कलीसिया में शायद गाया जाता था, एक भरोसेमंद कथन जिसे लोग दोहराते थे। अब्राहम से लेकर इफिसुस तक की कहानी इसी एक बिंदु पर मुड़ती है, और पौलुस स्वयं उस मोड़ का जीता-जागता सबूत हैं।

आईना

आप जिस बाइबल अध्ययन समूह को चलाते हैं, या जिस कक्षा में पढ़ाते हैं, वहाँ यह जाँचने लायक है: मेरे ज्ञान का फल क्या है? यहाँ बहस जीतने की भूख को नाम दिया गया है, और वह भूख धार्मिक लोगों में सबसे मीठे कपड़े पहनकर आती है। हम "व्यवस्थापक तो होना चाहते हैं," दूसरों को सही ठहराने का अधिकार चाहते हैं, बिना यह समझे कि हम क्या बोल रहे हैं। दूसरी ओर पौलुस "अच्छे विवेक" पर ज़ोर देते हैं। विवेक को दबाना धीरे-धीरे होता है: वह छोटा झूठ दफ़्तर में, वह पैसा जिसका हिसाब आपने नहीं दिया, वह कड़वाहट जिसे आप प्रार्थना में भी छिपाते हैं। पौलुस कहते हैं, ऐसे जहाज़ डूबते हैं।

बारीकी

पद 15 में एक शब्द रुककर देखने लायक है: पौलुस "मैं था" नहीं, "मैं हूँ" कहते हैं। "जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।" यह वर्तमान काल है, दशकों की सेवा के बाद लिखा गया। यह झूठी विनम्रता नहीं, न ही आत्म-घृणा। यह उस आदमी की भाषा है जो जितना अनुग्रह की गहराई में उतरा, उतना ही अपने अंधेपन को साफ़ देखने लगा। पद 13 में वे कहते हैं कि उन्होंने "अविश्वास की दशा में बिन समझे बूझे" यह किया, और फिर भी इसे बहाना नहीं बनाते। अपने पाप को वर्तमान काल में रख पाना, और उसी सांस में परमेश्वर की महिमा गा पाना, आत्मिक परिपक्वता की एक बहुत अच्छी पहचान है।

अन्तर्पाठ

पौलुस की यह ईमानदारी उस दृश्य से जुड़ी है जहाँ यीशु ने दो प्रार्थनाओं की तुलना की थी: एक फरीसी जो अपनी धार्मिकता गिनता है, और एक चुंगी लेनेवाला जो कहता है, हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर (लूका 18)। पौलुस पहले पहला आदमी था, और अब दूसरा बन गया है। दूसरी गूँज रोमियों 7 से आती है, जहाँ वे व्यवस्था को "पवित्र" कहते हुए भी स्वीकारते हैं कि वह उन्हें बचा नहीं सकती। यहाँ भी वही संतुलन है: "व्यवस्था को व्यवस्था की रीति पर काम में लाए तो वह भली है।" व्यवस्था को गलत जगह लगाना, उसे उद्धार का साधन बनाना, उसका अपमान है।

प्रश्न

पद 20 सहज नहीं है। पौलुस दो नामों को खुले पत्र में लिखते हैं और कहते हैं कि उन्होंने उन्हें "शैतान को सौंप दिया।" हम ठीक-ठीक नहीं जानते इसका क्या अर्थ था: कलीसिया से बहिष्कार, या उससे अधिक। और यह उसी अध्याय में है जो प्रेम और दया से भरा है। इसे मीठा करने की कोशिश बेईमानी होगी। पर उद्देश्य पर ध्यान दीजिए: "कि वे निन्दा करना न सीखें।" यह सज़ा भी सुधार की ओर देखती है, नाश की ओर नहीं। फिर भी एक असहज सच बचा रहता है: अनुग्रह के प्रेरित का हाथ कठोर भी हो सकता है, और कलीसिया में कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें प्रेम के नाम पर सहना असल में प्रेम नहीं है।

चिन्तन

मेरे बाइबल ज्ञान में जो बढ़ा है, उसका फल प्रेम है या तर्क में जीत की भूख?

अपने विवेक में वह एक बात कौन-सी है जिसे मैं वर्षों से टाल रहा हूँ, और आज उसे उजाले में लाने से क्या रोक रहा है?

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The Message of 1 Timothy and Titus

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1 Timothy 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 तीमुथियुस 1 का क्या अर्थ है?
इफिसुस की एक भरी हुई कोठरी में तीमुथियुस पत्र खोलता है। बाहर बहस की आवाज़ें हैं, वंशावलियों और कहानियों पर लड़ते लोग, जो व्यवस्था के शिक्षक बनना चाहते हैं। पौलुस लिखते हैं: उन्हें रोको, क्योंकि आज्ञा का सारांश विवाद नहीं, "शुद्ध मन और अच्छे विवेक, और निष्कपट विश्वास से प्रेम" है। फिर पत्र अचानक मुड़ता है और पौलुस अपने ही बारे में बोलने लगते हैं: निन्दा करनेवाला, सतानेवाला, "सबसे बड़ा" पापी, जिस पर दया हुई। अंत में तीमुथियुस को सौंपी गई ज़िम्मेदारी: अच्छी लड़ाई लड़ता रह, विवेक को थामे रह, क्योंकि कुछ लोगों का "विश्वास रूपी जहाज डूब गया।"
1 तीमुथियुस 1 किस विषय में है?
पौलुस मसीह यीशु को "हमारी आशा के आधार" कहते हैं, और यह पूरे बाइबल की कहानी का धागा है। इस्राएल को व्यवस्था मिली थी, और व्यवस्था भली है, पर उसने कभी किसी को नया मन नहीं दिया। भविष्यद्वक्ता एक ऐसे दिन की बाट जोहते रहे जब परमेश्वर स्वयं आकर अपने लोगों को बचाएँगे। पद 15 उस लंबी प्रतीक्षा का उत्तर है: "मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया।" यह वाक्य पौलुस के समय की कलीसिया में शायद गाया जाता था, एक भरोसेमंद कथन जिसे लोग दोहराते थे। अब्राहम से लेकर इफिसुस तक की कहानी इसी एक बिंदु पर मुड़ती है, और पौलुस स्वयं उस मोड़ का जीता-जागता सबूत हैं।
1 तीमुथियुस 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 15 में एक शब्द रुककर देखने लायक है: पौलुस "मैं था" नहीं, "मैं हूँ" कहते हैं। "जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।" यह वर्तमान काल है, दशकों की सेवा के बाद लिखा गया। यह झूठी विनम्रता नहीं, न ही आत्म-घृणा। यह उस आदमी की भाषा है जो जितना अनुग्रह की गहराई में उतरा, उतना ही अपने अंधेपन को साफ़ देखने लगा। पद 13 में वे कहते हैं कि उन्होंने "अविश्वास की दशा में बिन समझे बूझे" यह किया, और फिर भी इसे बहाना नहीं बनाते। अपने पाप को वर्तमान काल में रख पाना, और उसी सांस में परमेश्वर की महिमा गा पाना, आत्मिक परिपक्वता की एक बहुत अच्छी पहचान है।
1 तीमुथियुस 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 20 सहज नहीं है। पौलुस दो नामों को खुले पत्र में लिखते हैं और कहते हैं कि उन्होंने उन्हें "शैतान को सौंप दिया।" हम ठीक-ठीक नहीं जानते इसका क्या अर्थ था: कलीसिया से बहिष्कार, या उससे अधिक। और यह उसी अध्याय में है जो प्रेम और दया से भरा है। इसे मीठा करने की कोशिश बेईमानी होगी। पर उद्देश्य पर ध्यान दीजिए: "कि वे निन्दा करना न सीखें।" यह सज़ा भी सुधार की ओर देखती है, नाश की ओर नहीं। फिर भी एक असहज सच बचा रहता है: अनुग्रह के प्रेरित का हाथ कठोर भी हो सकता है, और कलीसिया में कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें प्रेम के नाम पर सहना असल में प्रेम नहीं है।
1 तीमुथियुस 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अपने विवेक में वह एक बात कौन-सी है जिसे मैं वर्षों से टाल रहा हूँ, और आज उसे उजाले में लाने से क्या रोक रहा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Timothy 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

पौलुस हुमिनयुस और सिकन्दर को शैतान को सौंपता है, पर कारण सुनिए: "कि वे ताड़ना पा कर निन्दा करना छोड़ दें।" यह बदला नहीं, यह उम्मीद है। सज़ा का लक्ष्य उनका नाश नहीं, उनका सुधार था। आज जब परमेश्वर तुम्हें किसी बात में कसता है, तो सोचो कि वह तुम्हें मिटाने नहीं, सिखाने लगा है। उसकी ताड़ना में भी उसका प्रेम छिपा है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, जो बुलाहट तूने मुझ पर रखी है, उसे मैं भूलने न पाऊँ। जब थकान आती है और लड़ाई लंबी लगती है, तब मुझे याद दिला कि तूने मुझे चुना है। मुझे हिम्मत दे कि मैं डटा रहूँ, विश्वास न छोड़ूँ, और तेरी सौंपी हुई बात को सँभाल कर आगे बढ़ता रहूँ।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 8

पिता, धन्यवाद कि तेरी व्यवस्था भली है, और तूने उसे हमें कोसने के लिए नहीं, बल्कि सही राह दिखाने के लिए दिया। धन्यवाद कि तू हमें सिखाता है कि उसे उचित रीति से काम में लाएँ, ताकि वह हमें मसीह के पास ले जाए, न कि बोझ बने।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

कुछ लोग शिक्षक कहलाना चाहते थे, पर पौलुस कहता है, "वे व्यवस्थापक तो होना चाहते हैं, पर जो बातें कहते हैं और जिन्हें दृढ़ता से बताते हैं, उनको समझते भी नहीं।" डर यह नहीं कि वे चुप थे, डर यह था कि वे बहुत आत्मविश्वास से बोल रहे थे। आवाज़ की ऊँचाई समझ का सबूत नहीं होती। आज खुद से पूछ: जो मैं दूसरों को सिखा रहा हूँ, क्या वह मेरे अपने दिल में जिया गया है?

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