1 तीमुथियुस 1:15
पाठ
पौलुस एक वाक्य को मानो मुहर लगाकर सामने रखते हैं: "यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।" पहले आधे हिस्से में वे सुसमाचार का सार कहते हैं, दूसरे आधे हिस्से में वे अपने आप को उस सार के नीचे रख देते हैं। यह कोई ठंडा सैद्धांतिक कथन नहीं है, बल्कि एक गवाही है जिसमें बोलने वाला स्वयं आरोपी के कटघरे में खड़ा है। ठीक पिछली पंक्तियों में उन्होंने अपना पुराना परिचय दिया था, "निन्दा करनेवाला, और सतानेवाला, और अंधेर करनेवाला", और अब वही व्यक्ति कहता है कि मसीह उसी जैसे लोगों के लिये आए।
केंद्रीय बात
इस वाक्य में जो शब्द सबसे अधिक भार उठाता है, वह है "आया"। मसीह यीशु जगत में आए, यानी उद्धार कहीं ऊपर से उतरा, मनुष्य की सीढ़ी चढ़ने से नहीं मिला। यही स्वर पूरे शास्त्र में गूँजता है: लूका के सुसमाचार में यीशु ज़क्कई के घर पर कहते हैं कि वे खोए हुओं को ढूँढ़ने और बचाने आए हैं, और यूहन्ना के अनुसार परमेश्वर ने संसार को दोषी ठहराने नहीं, बचाने के लिये अपने पुत्र को भेजा। पौलुस उसी धारा में खड़े हैं, पर एक कदम आगे बढ़कर अपना नाम उस "पापियों" की सूची में सबसे ऊपर लिख देते हैं। यहाँ धर्मशास्त्र आत्मकथा बन जाता है। सुसमाचार तब तक सचमुच सुना नहीं गया, जब तक वह "उनके लिये" से "मेरे लिये" नहीं बन जाता।
सूत्र
"जगत में आया" वाक्यांश हमें पीछे की ओर खींचता है, उन सदियों में जब इस्राएल एक आने वाले की प्रतीक्षा में जी रहा था। परमेश्वर ने कभी भी योग्य लोगों को छाँटकर नहीं बचाया; उन्होंने मिस्र में दासों को, अपनी ही मूर्तियों से चिपके हुए लोगों को छुड़ाया। उद्धार का सूत्र हमेशा एक ही दिशा में चलता है, ऊपर से नीचे की ओर। पौलुस उसी सूत्र की आखिरी कड़ी में खड़े हैं। और ध्यान दीजिए कि उनका वाक्य लूका 18 के उस चुंगी लेने वाले की प्रार्थना से कितना मिलता है, जो मंदिर के कोने में खड़ा होकर अपने आप को पापी कहता है और धर्मी ठहराया हुआ घर लौटता है। जो यीशु ने एक दृष्टान्त में कहा था, वह पौलुस के जीवन में इतिहास बन गया। सुसमाचार कोई नया आविष्कार नहीं, पुराने वादे का पूरा होना है।
दर्पण
आपके भीतर भी एक फ़ाइल है जिसे आप खोलना नहीं चाहते। शायद वह एक रिश्ता है जिसे आपने तोड़ा, पैसे का एक फ़ैसला जिसे आप आज तक उचित ठहराते हैं, या वह जीभ जिससे आपने अपने बच्चे को ऐसा कुछ कहा जो उसने कभी नहीं भुलाया। हम में से अधिकांश इस फ़ाइल के साथ दो में से एक व्यवहार करते हैं: या तो उसे दबा देते हैं, या उसे अपनी पहचान बना लेते हैं। पौलुस तीसरा रास्ता दिखाते हैं। वे अपने अतीत को न छिपाते हैं, न उससे परिभाषित होते हैं; वे उसे मसीह के आने के नीचे रख देते हैं। आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप सबसे कम चाहेंगे कि कोई ज़ोर से पढ़े, और फिर उसी कागज़ के ऊपर यह वाक्य लिखिए, "मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया", और कागज़ फाड़ दीजिए।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ विनम्रता का अभिनय नहीं कर रहे। वे एक ऐसे आदमी हैं जिनकी स्मृति में स्तिफनुस के कपड़े रखे हुए हैं, जिनके हस्ताक्षर से घरों से लोग घसीटे गए थे। पद 13 में वे स्वयं कहते हैं कि यह सब उन्होंने "अविश्वास की दशा में बिन समझे बूझे" किया, और यह बचाव नहीं, निदान है: सबसे भयानक काम अक्सर धार्मिक निश्चय के साथ किए जाते हैं। इसीलिए उनका स्वर कड़वा नहीं, आभार से भरा है, "मैं अपने प्रभु मसीह यीशु का… धन्यवाद करता हूँ"। जो व्यक्ति दया को सचमुच चख चुका है, वह अपने पाप का बड़ा नाम लेने से नहीं डरता। पौलुस का आत्मिक भूदृश्य दो पहाड़ों के बीच की घाटी है: नीचे उनका अपराध, ऊपर परमेश्वर का अनुग्रह, और वे घाटी में खड़े होकर पद 17 की स्तुति गाते हैं।
संदर्भ
इफिसुस, एक बड़ा बंदरगाह शहर, अरतिमिस के मंदिर की छाया में, जहाँ धर्म और व्यापार एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। वहाँ की युवा कलीसिया में कुछ लोग "कहानियों और अनन्त वंशावलियों" पर उलझे थे और "व्यवस्थापक तो होना चाहते हैं, पर जो बातें कहते… उनको समझते भी नहीं"। यही पृष्ठभूमि है। तीमुथियुस एक युवा अगुवा है जिसे उम्रदराज़ शिक्षकों का सामना करना है, और पौलुस उसे कोई नई तकनीक नहीं, एक वाक्य थमाते हैं जिसे कलीसिया शायद पहले से दोहराती थी। ऐसे समाज में जहाँ इज़्ज़त सब कुछ थी, अपने आप को सार्वजनिक रूप से "सबसे बड़ा" पापी कहना सामाजिक आत्मघात जैसा था। पौलुस जानबूझकर ऐसा करते हैं: सच्ची शिक्षा वही है जो सिखाने वाले को पहले नीचे लाती है।
प्रश्न
पौलुस "मैं था" नहीं कहते, "मैं हूँ" कहते हैं। सालों की सेवा, पिटाई, जेल और कलीसियाओं की स्थापना के बाद भी वर्तमान काल। और यह उनके अपने दूसरे वाक्यों से टकराता है, जहाँ वे व्यवस्था के अनुसार अपने आचरण को निर्दोष कहते हैं और खुद को प्रेरितों में सबसे छोटा। तो क्या यह केवल धार्मिक अतिशयोक्ति है? मुझे नहीं लगता। अनुग्रह स्मृति को मिटाता नहीं, उसे बदल देता है। जो प्रकाश के जितना पास आता है, उसे अपने ऊपर की धूल उतनी ही साफ़ दिखती है; यशायाह ने मंदिर में परमेश्वर की महिमा देखकर अपने होंठों को अशुद्ध कहा था, पहले नहीं। पर इससे यह प्रश्न पूरी तरह हल नहीं होता कि क्षमा पाया हुआ मनुष्य किस अर्थ में अब भी सबसे बड़ा पापी है। शायद यही इस वाक्य की ईमानदारी है: पौलुस अपने अतीत को हल्का नहीं करते, और अपने उद्धार को भी नहीं।
चिंतन
आप अपने अतीत के किस हिस्से को अब भी "मैं था" कहकर दूर रखते हैं, जबकि परमेश्वर उसे "मुझ पर दया हुई" कहकर पास लाना चाहते हैं?
अगर आपकी कलीसिया या समूह में सबसे पहले आप अपने आप को पापी मान लें, तो वहाँ की बातचीत किस तरह बदल जाएगी?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
विश्वास और उत्तम विवेक को रखे रह।" पौलुस दोनों को एक साथ जोड़ता है, क्योंकि विवेक को बार-बार दबाने वाला आदमी एक दिन विश्वास भी नहीं बचा पाता। जहाज़ अचानक नहीं डूबता। पहले वह छोटी सी आवाज़ चुप कराई जाती है जो कहती है, यह ठीक नहीं। आज तुझसे भीतर कौन सी बात कही जा रही है, जिसे तू अनसुना करता आया है?
पिता, तेरा अनुग्रह मेरी कमियों से कहीं बड़ा है। जहाँ मैं अपने आप को नाकाबिल समझता हूँ, वहीं तू भर भरकर देता है। मसीह यीशु में जो विश्वास और प्रेम है, उससे मेरा मन भर दे, ताकि मैं भी दूसरों के साथ वैसा ही बरतूँ जैसा तूने मेरे साथ किया।
पौलुस कहता है, "मैं अपने प्रभु मसीह यीशु का आभारी हूँ, जिसने मुझे सामर्थ्य दी, कि उसने मुझे विश्वासयोग्य समझकर अपनी सेवा के लिए ठहराया।" ध्यान दे, यीशु ने उसे विश्वासयोग्य समझा, तब जब वह कलीसिया को सता रहा था। तेरी योग्यता उसकी नज़र से शुरू होती है, तेरे रिकॉर्ड से नहीं। और जिस काम के लिए वह बुलाता है, उसी के लिए सामर्थ्य भी वही देता है।
प्रभु यीशु, तू पापियों को बचाने के लिए इस दुनिया में आया, और मैं जानता हूँ कि उन्हीं में मैं भी हूँ। मेरे मन में अपने बीते कल का बोझ है, फिर भी तेरी दया मुझे लौटा लाती है। मुझे यह सच भूलने न दे कि तेरा प्रेम मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी से भी बड़ा है।
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