2 इतिहास 17
पाठ
आसा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र यहोशापात गद्दी पर बैठता है, सीमाओं को मजबूत करता है, और परमेश्वर की खोज में लगा रहता है। उसके राज्य के तीसरे वर्ष में वह कुछ हाकिमों, लेवियों और याजकों को व्यवस्था की पुस्तक देकर यहूदा के नगरों में शिक्षा देने भेजता है। फिर आस-पास के राज्यों में परमेश्वर का ऐसा भय समा जाता है कि कोई युद्ध नहीं करता, और अध्याय एक लम्बी सैन्य सूची के साथ समाप्त होता है, लाखों योद्धा, गिने हुए, नाम से दर्ज।
मर्म
ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है। पहले परमेश्वर यहोशापात के संग हैं, फिर राज्य दृढ़ होता है, फिर धन और वैभव आता है। इतिहास की पुस्तक यह कारण-क्रम चुपचाप नहीं छोड़ती, वह उसे रेखांकित करती है: "इस कारण यहोवा ने राज्य को उसके हाथ में दृढ़ किया।" पर यहाँ एक खतरा भी है, क्योंकि यही वाक्य आसानी से एक सौदे में बदल जाता है: भक्ति दो, समृद्धि लो। पाठ ऐसा नहीं कहता। वह कहता है कि यहोशापात ने बाल की खोज नहीं की, बल्कि "अपने पिता के परमेश्वर की खोज" की। खोज शब्द दोबारा आता है, क्योंकि यही केंद्र है। समृद्धि परिणाम है, उद्देश्य नहीं। जिस क्षण वह उद्देश्य बनती है, खोज समाप्त हो जाती है।
सूत्र
एक राजा जो अपनी प्रजा को व्यवस्था सिखाने के लिए शिक्षक भेजता है, बाइबल में कोई मामूली बात नहीं है। इस्राएल के अधिकांश राजा जनता से लेते हैं; यह राजा उन्हें देता है। और वह क्या देता है, वह परमेश्वर का वचन देता है, नगर दर नगर, "यहोवा की व्यवस्था की पुस्तक अपने साथ लिये हुए"। इसमें उस राजा की परछाईं है जो स्वयं वचन होकर आया, जो गाँव-गाँव घूमता रहा और सिखाता रहा, जिसके राज्य की सुरक्षा दीवारों से नहीं बल्कि सुने और माने गए वचन से बनी। यहोशापात के किले टूट गए; उसका भेजा हुआ शिक्षण-दल उस बड़ी परंपरा का हिस्सा है जो अंततः शिष्यों के भेजे जाने में खुलती है।
दर्पण
छठे पद में एक अजीब वाक्य है: "यहोवा के मार्गों पर चलते-चलते उसका मन मगन हो गया।" इब्रानी में यहाँ शब्द है गावाह, "ऊँचा होना"। यही शब्द बाइबल में प्रायः घमंड के लिए इस्तेमाल होता है, पर यहाँ नहीं। यहाँ मन ऊँचा होता है और उसका फल मूरतों को हटाना है, अपने आप को ऊँचा करना नहीं। यह भेद पतला है और हमारे भीतर रोज़ चलता है। आपके काम में जब कोई परियोजना सफल होती है, आपके घर में जब बच्चे संभल जाते हैं, आपकी सेवकाई में जब लोग सराहते हैं, तब मन ऊँचा होता है। सवाल यह है कि वह ऊँचाई किस दिशा में मुड़ती है, आत्म-प्रदर्शन की ओर या उन चीज़ों को हटाने की ओर जो परमेश्वर की जगह ले रही हैं। आज कोई एक "ऊँचा स्थान" चुनिए, कोई एक आदत, ऐप या खर्च जो चुपचाप आपकी भक्ति की जगह खा रहा है, और अगले सात दिनों के लिए उसे कागज़ पर लिखकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
श्रोता
इतिहास की पुस्तकें उन लोगों के लिए लिखी गईं जो बंधुआई से लौटे थे। उनके पास न सेना थी, न खज़ाना, न स्वतंत्र राज्य। वे किसी दूसरे साम्राज्य की छाया में एक छोटी-सी बस्ती थे, और यरूशलेम की दीवारें अभी अधूरी थीं। उनके लिए यह अध्याय पुरानी शान का उदास स्मरण नहीं था, बल्कि एक प्रश्न था: क्या हमारा भविष्य फिर संभव है? और उत्तर सैन्य नहीं था। उत्तर यह था कि जिस राजा ने वचन को नगरों तक पहुँचाया, उसी के दिनों में पड़ोसी देशों ने युद्ध नहीं किया। लौटे हुए लोगों के लिए यह राहत की बात थी, क्योंकि हथियार उनके पास नहीं थे, पर व्यवस्था की पुस्तक उनके पास थी।
मुख्य पात्र
यहोशापात का चित्र यहाँ लगभग निर्दोष है, और यही थोड़ा असहज करता है, क्योंकि हम जानते हैं कि आगे के अध्यायों में वह अहाब से मित्रता करेगा और डाँट सुनेगा। पर इस अध्याय में लेखक उसे एक खोजी के रूप में दिखाता है, ऐसा व्यक्ति जो विरासत में मिली भक्ति से संतुष्ट नहीं, बल्कि "अपने मूलपुरुष दाऊद की प्राचीन चाल" को फिर से चुनता है। उसकी आत्मिक बनावट में दो चीज़ें साथ चलती हैं: सीमाओं पर सिपाही और नगरों में शिक्षक। वह भोला नहीं है, पर वह यह भी नहीं मानता कि सुरक्षा केवल हथियारों से आती है। अध्याय के अंत की विशाल सूची और तीसरे वर्ष का छोटा-सा शिक्षण-दल, इन दोनों में से कौन-सा वास्तव में राज्य को थामे हुए था, पाठ यह खुला छोड़ देता है।
अंतर्पाठ
वही इब्रानी वाक्यांश, "मन ऊँचा होना", 2 इतिहास 26 में उज्जियाह के बारे में आता है, और वहाँ उसका परिणाम विनाश है: वह बलवान हुआ, उसका मन ऊँचा हुआ, और वह मंदिर में धूप जलाने घुस गया। दोनों राजाओं का मन ऊँचा हुआ, पर एक ने मूरतें हटाईं और दूसरे ने अपनी सीमा लाँघी। यही पाठ का मौन प्रश्न है। और व्यवस्थाविवरण 17 में राजा को आदेश है कि वह व्यवस्था की एक प्रति अपने पास रखे और जीवन भर उसे पढ़ता रहे। यहोशापात उससे एक कदम आगे जाता है: वह केवल स्वयं नहीं पढ़ता, वह पूरे देश को पढ़वाता है। शायद यही उसके राज्य की सबसे बड़ी किलेबंदी थी।
चिंतन
यदि आपकी सफलता का फल मापा जाए, तो वह किस दिशा में मुड़ता है, आपके नाम की ओर या परमेश्वर की ओर?
आपके जीवन में परमेश्वर का वचन किस तरह "नगरों तक" पहुँचता है, यानी किन लोगों तक आपके द्वारा पहुँचता है?
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2 Chronicles 17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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2 Chronicles 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जो कुछ मेरे हाथ में है, वह आपने ही थमाया है। मेरे काम को थामे रखिए, मेरे घर को स्थिर कीजिए। जब आदर और भरपूरी मिले, तब मेरा मन घमंड में न भटके, बल्कि आपकी राहों पर टिका रहे। मैं आपके भरोसे जीना चाहता हूँ।
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