बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 35

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

एक चौंकाने वाला विरोधाभास

एक ही अध्याय में दो योशिय्याह दिखाई देते हैं। एक वह जो फसह ऐसा मनाता है जैसा शमूएल नबी के दिनों से नहीं मनाया गया; दूसरा वह जो मगिद्दो की तराई में परमेश्वर का वचन ठुकराकर तीरों से बिंधकर गिरता है। यही अध्याय, यही राजा। भक्ति की चोटी और मूर्खता की खाई एक-दूसरे से इतनी सटी हुई हैं कि पाठक को रुककर सोचना पड़ता है: यह क्या हो रहा है?

पाठ

अध्याय के पहले भाग में योशिय्याह यरूशलेम में फसह मनाता है, याजकों और लेवियों को उनके स्थान पर ठहराता है, और अपनी सम्पत्ति में से हज़ारों पशु बलिदान के लिए देता है। ऐसा फसह शमूएल के दिनों से नहीं मनाया गया था। फिर मिस्र का राजा नको कर्कमीश की ओर बढ़ता है, योशिय्याह बिना कारण उसका सामना करने जाता है, नको के मुँह से निकले परमेश्वर के वचन को अनसुना करता है, और मारा जाता है।

मर्म

इस अध्याय का धार्मिक हृदय यह है: सच्ची आराधना और सच्ची आज्ञाकारिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। योशिय्याह ने फसह को “जैसा मूसा की पुस्तक में लिखा है” वैसा ही मनाया, हर विवरण व्यवस्था के अनुसार। यहाँ वह वचन के अधीन है। पर जब नको कहता है, “परमेश्वर ने मुझसे फुर्ती करने को कहा है,” तब योशिय्याह उन वचनों को “जो उसने परमेश्वर की ओर से कहे थे” नहीं मानता। इतिहासकार की भाषा तीक्ष्ण है: वही राजा जिसने वचन के अनुसार सब कुछ किया, अंत में वचन के विरुद्ध जाकर मरता है। भक्ति अनुष्ठान में सिद्ध हो सकती है, फिर भी विवेक में चूक सकती है।

बड़ी कहानी का सूत्र

फसह इस्राएल की मुक्ति की कहानी का केंद्र है, और हर पीढ़ी में वह मिस्र से निकाले जाने को दोहराती है। पर यहाँ एक विडंबना छिपी है: योशिय्याह मिस्र से छुड़ाए जाने का पर्व मनाता है, और कुछ ही समय बाद मिस्र के राजा के हाथों मारा जाता है। पुराने नियम का हर फसह अधूरा है, वह उस अंतिम फसह की छाया है जिसमें मेम्ना स्वयं परमेश्वर का पुत्र होगा। योशिय्याह हज़ारों भेड़-बकरियाँ देता है, पर अपनी जान नहीं दे सकता। मसीह उलटा करते हैं: वे स्वयं मेम्ना बनते हैं, और उनका लहू छिड़का जाता है ताकि मृत्यु टल जाए। योशिय्याह की मृत्यु दिखाती है कि सबसे अच्छा राजा भी वह राजा नहीं जिसकी हमें ज़रूरत है।

दर्पण

योशिय्याह की गलती हमारे लिए असुविधाजनक रूप से पहचानी हुई है। परमेश्वर का वचन कभी-कभी अप्रत्याशित होंठों से आता है, एक अविश्वासी सहकर्मी, एक कठोर मित्र, यहाँ तक कि एक विरोधी की चेतावनी से। हम सोचते हैं: “यह व्यक्ति तो परमेश्वर को जानता ही नहीं, इसकी बात क्यों सुनूँ?” और हम भेष बदलकर अपनी लड़ाई लड़ने चले जाते हैं। योशिय्याह की भक्ति सच्ची थी, पर उसकी सफलता ने शायद उसे यह विश्वास दिला दिया कि हर लड़ाई उसकी है। क्या आपकी पिछली भक्ति आपको यह भरोसा देती है कि अगला निर्णय अपने आप सही होगा? क्या आप उस आवाज़ को सुनने को तैयार हैं जो “गलत” जगह से आती है?

अंतर्पाठ

व्यवस्थाविवरण 17 में राजा के लिए आज्ञा थी कि वह व्यवस्था की पुस्तक स्वयं लिखे और उसे पढ़ता रहे। योशिय्याह ने ठीक यही किया, पर मगिद्दो में वह क्षण भर के लिए भूल गया। दूसरी ओर, बिलाम की कहानी याद आती है, जहाँ परमेश्वर एक विदेशी नबी के मुँह से बोले थे। नको कोई नबी नहीं था, फिर भी इतिहासकार स्पष्ट कहता है कि उसके वचन “परमेश्वर की ओर से” थे। और यिर्मयाह का विलापगीत, जो इसी अध्याय में उल्लेखित है, आगे चलकर यरूशलेम के पूरे विनाश पर विलाप बनेगा। योशिय्याह की मृत्यु उस बड़े पतन का पहला स्वर है।

संदर्भ

यह घटना योशिय्याह के राज्य के अठारहवें वर्ष में और उसके कुछ ही समय बाद घटती है, ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी के अंत में। अश्शूर का साम्राज्य ढह रहा है, बाबेल उभर रहा है, और मिस्र अश्शूर के अवशेषों की मदद के लिए उत्तर की ओर बढ़ रहा है ताकि बाबेल को रोक सके। योशिय्याह ने अपने राज्य में सुधार किया था, मंदिर की मरम्मत करवाई थी, व्यवस्था की खोई हुई पुस्तक पाई गई थी। वह दाऊद के बाद सबसे धर्मी राजाओं में गिना जाता है। मगिद्दो की तराई इस्राएल का सामरिक चौराहा थी, वह जगह जहाँ महाशक्तियाँ टकराती थीं। योशिय्याह शायद बाबेल के पक्ष में खड़ा होना चाहता था, पर यह उसकी लड़ाई नहीं थी।

श्रोताओं की स्थिति

इतिहास की पुस्तक निर्वासन के बाद के यहूदियों के लिए लिखी गई, जो टूटे मंदिर और खोए राज्य के बाद पुनर्निर्माण कर रहे थे। उनके लिए योशिय्याह की कहानी दोहरी चुभन थी: देखो, हमारा सबसे अच्छा राजा भी अंत में गिरा। कोई मानवीय राजा हमें नहीं बचा सकता। पर साथ ही देखो, फसह कैसे मनाया जाता है, आराधना कैसे व्यवस्थित की जाती है, वचन के अनुसार सब कुछ कैसे किया जाता है। लौटे हुए यहूदी जानते थे कि उनके पास अब कोई द

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2 Chronicles 35 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 35 का क्या अर्थ है?
एक ही अध्याय में दो योशिय्याह दिखाई देते हैं। एक वह जो फसह ऐसा मनाता है जैसा शमूएल नबी के दिनों से नहीं मनाया गया; दूसरा वह जो मगिद्दो की तराई में परमेश्वर का वचन ठुकराकर तीरों से बिंधकर गिरता है। यही अध्याय, यही राजा। भक्ति की चोटी और मूर्खता की खाई एक-दूसरे से इतनी सटी हुई हैं कि पाठक को रुककर सोचना पड़ता है: यह क्या हो रहा है?
2 इतिहास 35 किस विषय में है?
अध्याय के पहले भाग में योशिय्याह यरूशलेम में फसह मनाता है, याजकों और लेवियों को उनके स्थान पर ठहराता है, और अपनी सम्पत्ति में से हज़ारों पशु बलिदान के लिए देता है। ऐसा फसह शमूएल के दिनों से नहीं मनाया गया था। फिर मिस्र का राजा नको कर्कमीश की ओर बढ़ता है, योशिय्याह बिना कारण उसका सामना करने जाता है, नको के मुँह से निकले परमेश्वर के वचन को अनसुना करता है, और मारा जाता है।
2 इतिहास 35 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस अध्याय का धार्मिक हृदय यह है: सच्ची आराधना और सच्ची आज्ञाकारिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। योशिय्याह ने फसह को “जैसा मूसा की पुस्तक में लिखा है” वैसा ही मनाया, हर विवरण व्यवस्था के अनुसार। यहाँ वह वचन के अधीन है। पर जब नको कहता है, “परमेश्वर ने मुझसे फुर्ती करने को कहा है,” तब योशिय्याह उन वचनों को “जो उसने परमेश्वर की ओर से कहे थे” नहीं मानता। इतिहासकार की भाषा तीक्ष्ण है: वही राजा जिसने वचन के अनुसार सब कुछ किया, अंत में वचन के विरुद्ध जाकर मरता है। भक्ति अनुष्ठान में सिद्ध हो सकती है, फिर भी विवेक में चूक सकती है।
2 इतिहास 35 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फसह इस्राएल की मुक्ति की कहानी का केंद्र है, और हर पीढ़ी में वह मिस्र से निकाले जाने को दोहराती है। पर यहाँ एक विडंबना छिपी है: योशिय्याह मिस्र से छुड़ाए जाने का पर्व मनाता है, और कुछ ही समय बाद मिस्र के राजा के हाथों मारा जाता है। पुराने नियम का हर फसह अधूरा है, वह उस अंतिम फसह की छाया है जिसमें मेम्ना स्वयं परमेश्वर का पुत्र होगा। योशिय्याह हज़ारों भेड़-बकरियाँ देता है, पर अपनी जान नहीं दे सकता। मसीह उलटा करते हैं: वे स्वयं मेम्ना बनते हैं, और उनका लहू छिड़का जाता है ताकि मृत्यु टल जाए। योशिय्याह की मृत्यु दिखाती है कि सबसे अच्छा राजा भी वह राजा नहीं जिसकी हमें ज़रूरत है।
2 इतिहास 35 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
योशिय्याह की गलती हमारे लिए असुविधाजनक रूप से पहचानी हुई है। परमेश्वर का वचन कभी-कभी अप्रत्याशित होंठों से आता है, एक अविश्वासी सहकर्मी, एक कठोर मित्र, यहाँ तक कि एक विरोधी की चेतावनी से। हम सोचते हैं: “यह व्यक्ति तो परमेश्वर को जानता ही नहीं, इसकी बात क्यों सुनूँ?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 35 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

प्रभु, योशिय्याह की तरह मेरा मन भी आपकी याद में पूरी तरह डूब जाए। मुझे बस रस्म निभाना नहीं, सच्चे दिल से आपको याद करना सिखाइए। जो छुड़ौती आपने दी है, वह मेरे भीतर हर दिन नई खुशी जगाए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

आसाप, हेमान और यदूतून के वंशज गवैये अपनी जगह पर खड़े थे, और द्वारपाल हर एक फाटक पर। योशिय्याह के फसह में हर किसी की एक जगह थी, हर किसी का एक काम था। किसी को अपना स्थान छोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि उनके भाई उनके लिए तैयारी कर रहे थे।

सोचिए, परमेश्वर की सेवा में आपकी भी एक जगह है। शायद वह छोटी लगे, शायद कोई देखे भी नहीं, पर जब हर कोई अपनी जगह पर खड़ा होता है, तभी आराधना पूरी होती है। आज आप कहाँ खड़े हैं?

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