2 इतिहास 6:20
पाठ
सुलैमान घुटनों पर है, हाथ फैलाए हुए, और उसकी सबसे बड़ी माँग कोई सोना-चाँदी या सीमा-विस्तार नहीं है। वह बस इतना चाहता है कि परमेश्वर की आँखें उस भवन की ओर, "इसी स्थान की ओर जिसके विषय में तूने कहा है कि मैं उसमें अपना नाम रखूँगा, रात-दिन खुली रहें।" ध्यान दीजिए, वह यह नहीं कहता कि परमेश्वर वहाँ बंद होकर रहें; एक ही साँस पहले उसने माना है कि "स्वर्ग में वरन् सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी तू नहीं समाता।" वह केवल यह माँगता है कि परमेश्वर की दृष्टि और कान उस दिशा में लगे रहें, ताकि जब कोई दास उस ओर मुँह करके पुकारे, तो सुना जाए। पूरे लंबे प्रार्थना-भाषण का बीज यही एक वाक्य है।
मर्म
यह पद परमेश्वर के बारे में दो बातें एक साथ कहता है, और दोनों को साथ पकड़े रहना ही विश्वास है। पहली, परमेश्वर किसी इमारत में कैद नहीं होते; कोई मंदिर, कोई गिरजा, कोई परंपरा उन्हें अपने कब्जे में नहीं ले सकती। दूसरी, वही असीम परमेश्वर स्वेच्छा से अपने आप को एक पते से बाँध लेते हैं, एक नाम, एक स्थान, एक वादा देते हैं, ताकि मनुष्य को अंधेरे में हाथ न टटोलने पड़ें। कृपा का यही स्वभाव है: परमेश्वर स्वयं को खोजने योग्य बना देते हैं। और इसका नैतिक भार भारी है। यदि परमेश्वर की आँखें सचमुच रात-दिन खुली हैं, तो प्रार्थना कोई भावनात्मक राहत नहीं, बल्कि खुली आँखों के सामने खड़े होना है। जो सुना जाता है, वह देखा भी जाता है।
जोड़ने वाला सूत्र
सुलैमान एक पते की माँग करता है, और परमेश्वर आगे चलकर उससे बड़ा उत्तर देते हैं: वे एक पता नहीं, एक व्यक्ति देते हैं। यीशु ने अपने शरीर को ही मंदिर कहा, और यूहन्ना बताता है कि वे "अपनी देह के मंदिर" की बात कर रहे थे। मैं यह जोड़ इसलिए खींचता हूँ कि इस पद की पूरी संरचना वहीं पूरी होती है: नाम, स्थान, और सुनी जाने वाली प्रार्थना। मसीह में परमेश्वर का नाम देह लेकर हमारे बीच बस गया, और अब जो उनकी ओर मुँह करता है वह किसी दिशा की ओर नहीं, किसी जीवित व्यक्ति की ओर मुँह करता है। इसलिए सुलैमान का भवन खोया नहीं; वह पूरा हुआ। और जो बात नहीं बदली, वह यही है कि परमेश्वर स्वयं को ढूँढ़े जाने योग्य बनाते हैं।
दर्पण
हम अक्सर उलटी बात मानकर जीते हैं: परमेश्वर की आँखें बंद हैं, कम से कम मेरी तरफ। इसलिए हम दफ्तर में वह छोटा झूठ बोल लेते हैं जो किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता, हिसाब-किताब में वह मोड़ ले लेते हैं जिसे कोई पकड़ नहीं सकता, घर में उस स्वर से बात करते हैं जो बाहर कभी नहीं निकलता। खुली आँखों का सिद्धांत इन सब पर चलता है। पर यही पद दूसरी तरफ भी काटता है: यदि आँखें रात-दिन खुली हैं, तो आपकी वह प्रार्थना भी सुनी गई है जो रात दो बजे तकिए में दबकर निकली थी और जिसका कोई उत्तर आपको आज तक नहीं मिला। परमेश्वर की सतर्कता आपकी निगरानी नहीं, आपका ठिकाना है।
आज दस मिनट निकालिए और वह एक बात कागज़ पर लिखिए जो आपने कभी परमेश्वर से इसलिए नहीं कही क्योंकि आपको लगा वे उधर देख ही नहीं रहे; फिर उसे ज़ोर से पढ़कर उनके सामने रख दीजिए।
मुख्य पात्र
सुलैमान इस दृश्य में राजा कम और याचक अधिक है। वह अपने बनाए पीतल की चौकी पर खड़ा होकर घुटने टेकता है, पूरी सभा के सामने, और अपने ही निर्माण को छोटा घोषित करता है: "मेरे बनाए हुए इस भवन में तू कैसे समाएगा?" यह उस आदमी का वाक्य है जिसने अभी-अभी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि पूरी की है। जो व्यक्ति अपनी सबसे बड़ी सफलता के बीचोंबीच खड़ा होकर कह सके कि यह परमेश्वर को समेटने के लिए काफी नहीं, वह विनम्रता का अभिनय नहीं कर रहा, वह सच बोल रहा है। और फिर भी वह माँगता है, जोर देकर, बार-बार। यही संतुलन दुर्लभ है: अपनी लघुता जानना और फिर भी बड़ी माँग रखना। जो अपने को कुछ नहीं समझता, वह अक्सर माँगना छोड़ देता है। सुलैमान नहीं छोड़ता।
कठिन प्रश्न
तो फिर वह भवन जल क्यों गया? इतिहास की पुस्तक लिखने वाले जानते थे कि जिस स्थान की ओर आँखें खुली रहने की माँग की गई थी, वह राख हो चुका था और लोग बँधुआई में थे। खुली आँखें विनाश को रोक नहीं पाईं। मैं इसे मीठा नहीं करूँगा। सुलैमान स्वयं आगे इसी की कल्पना करता है, बँधुआई की, और वहाँ भी यही रास्ता बताता है: उस दिशा में मुँह करके पुकारना। इसका मतलब है कि परमेश्वर का सुनना विपत्ति से बचाव की गारंटी नहीं है। यह उससे कुछ और है, कुछ ज़्यादा असुविधाजनक और ज़्यादा ठोस: वह न्याय के बीच भी सुनते हैं, और सुनने के बाद जो शब्द आता है वह है "क्षमा करना।" बचाव नहीं मिला; संबंध नहीं टूटा।
पहले श्रोता
यह पुस्तक उन लोगों के लिए लिखी गई जो बँधुआई से लौटे थे और जिनके पास एक छोटा, फीका मंदिर था, कोई राजा नहीं, कोई सेना नहीं। उनके लिए सुलैमान की यह प्रार्थना नास्टैल्जिया नहीं, दस्तावेज़ थी: देखो, हमारे पास आज भी वही एक चीज़ है जो असल में मायने रखती थी, वह नाम और वह वादा कि सुना जाएगा। भवन की भव्यता चली गई, पर पता नहीं बदला। जो हमसे छूट जाता है, वह यह है कि उनके कानों में यह पद उम्मीद की नहीं, जीवित रहने की शर्त थी। जिनके पास शक्ति नहीं बची, उनके पास प्रार्थना ही राजनीति थी।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा कोना ऐसा है जिसे आप चुपचाप मानकर चलते हैं कि वहाँ परमेश्वर नहीं देख रहे, और वह मान्यता आपके व्यवहार को कैसे ढाल रही है?
जब उत्तर नहीं आता, तब आप प्रार्थना करना छोड़ देते हैं या दिशा बदल लेते हैं; बँधुआई में भी उसी ओर मुँह किए रहना आपके लिए व्यावहारिक रूप से कैसा दिखेगा?
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2 Chronicles 6:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 इतिहास 6:20 का क्या अर्थ है?
2 इतिहास 6:20 किस विषय में है?
2 इतिहास 6:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 इतिहास 6:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 इतिहास 6:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Chronicles 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
सुलैमान ने पीतल का मंच इसलिए बनवाया कि सब उसे देख सकें, और फिर उसी ऊँचाई पर चढ़कर उसने घुटने टेक दिए। "उसी पर वह खड़ा हुआ; और सारी इस्राएली सभा के सामने घुटने टेककर स्वर्ग की ओर हाथ फैलाए हुए।" राजा ने ऊँचाई का इस्तेमाल झुकने के लिए किया। तुझे जो जगह, जो पद, जो नाम मिला है, क्या वह भी तेरे झुकने को दिखाने के काम आता है? या तू उस पर सिर्फ खड़ा रहता है?
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