2 कुरिन्थियों 1:1
पाठ
यह वाक्य एक चिट्ठी का पता है, और कुछ नहीं: "पौलुस की ओर से जो परमेश्वर की इच्छा से मसीह यीशु का प्रेरित है, और भाई तीमुथियुस की ओर से।" भेजनेवाले दो हैं, एक प्रेरित और एक "भाई", और पानेवाले हैं "परमेश्वर की उस कलीसिया के नाम जो कुरिन्थुस में है, और सारे अखाया के सब पवित्र लोगों के नाम।" यानी एक विशेष शहर की एक विशेष मंडली, और उसके साथ पूरे प्रांत में फैले हुए वे सब लोग जिन्हें परमेश्वर ने अपना ठहराया है। तीन बातें इस एक पंक्ति में गुँथी हैं: पौलुस कौन है और किसके अधिकार से लिखता है, वह अकेला नहीं लिखता, और जिन्हें लिखता है वे उसकी नहीं, परमेश्वर की संपत्ति हैं।
मूल बात
गौर करें कि पौलुस ने यह नहीं लिखा कि "कुरिन्थुस की कलीसिया", बल्कि "परमेश्वर की उस कलीसिया" जो कुरिन्थुस में है। मंडली किसी शहर की, किसी गुट की, किसी बड़े नाम की नहीं; वह परमेश्वर की है और केवल किराए पर कुरिन्थुस में रहती है। और जिस मंडली को वह "पवित्र लोग" कहता है, वही मंडली है जिसमें फूट थी, मुकदमे थे, भोज पर अमीर-गरीब का भेद था, और जो पौलुस के अधिकार पर ही सवाल उठा रही थी। पवित्रता यहाँ उनकी उपलब्धि नहीं, परमेश्वर का दावा है: वे अलग किए गए हैं, इसलिए उन्हें अलग जीना है। ठीक इसी तरह पौलुस का प्रेरितपन उसकी योग्यता से नहीं, "परमेश्वर की इच्छा से" है। बुलावा पहले आता है, चरित्र उसके पीछे चलता है।
जोड़ने वाला सूत्र
"परमेश्वर की इच्छा" कोई धार्मिक तकिया-कलाम नहीं, यह पूरे बाइबल की कहानी का ढर्रा है: परमेश्वर बुलाते हैं, और बुलाया हुआ व्यक्ति भेजा जाता है। अब्राहम, मूसा, भविष्यद्वक्ता, और अंत में स्वयं पुत्र, जिसके बारे में पौलुस इसी अध्याय में कहता है कि "परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में 'हाँ' के साथ हैं।" प्रेरित का अधिकार इसी "हाँ" से निकलता है, उसकी अपनी वाक्पटुता से नहीं। और "पवित्र लोग" वह शब्द है जो पुराने नियम में इस्राएल के लिए था, एक ऐसी प्रजा जो परमेश्वर ने अपने लिए अलग की। अब वही नाम अखाया के यूनानी व्यापारियों, दासों और गृहिणियों पर लगा दिया गया है। मसीह में परमेश्वर का चुनाव प्रांत की सीमाएँ पार कर गया, और जो कभी बाहर थे वे अब उसी संपत्ति में गिने जाते हैं।
दर्पण
यह पद आपके अधिकार को छूता है। आप जहाँ भी जिम्मेदारी संभालते हैं, कक्षा में, दफ्तर में, घर में, मंडली की बैठक में, सवाल यही है: आपकी स्थिति आपकी योग्यता का इनाम है या परमेश्वर की सौंपी हुई अमानत? पहला जवाब आपको रक्षात्मक बनाता है, हर आलोचना खतरा लगती है। दूसरा जवाब आपको स्वतंत्र करता है, क्योंकि जो आपने कमाया नहीं, उसे बचाने की घबराहट भी नहीं। पौलुस इसी अध्याय के अंत में साफ कहता है, "यह नहीं, कि हम विश्वास के विषय में तुम पर प्रभुता जताना चाहते हैं।" दूसरी धार और तीखी है: जिन लोगों से आप चिढ़ते हैं, जिनका नाम देखकर आप संदेश बाद में पढ़ते हैं, वे "पवित्र लोग" हैं, परमेश्वर की संपत्ति। उनके साथ लापरवाही किसी और की चीज़ के साथ लापरवाही है।
आज ही, कागज पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपकी मंडली में सबसे ज़्यादा खटपट है, और नाम के नीचे लिखिए: "परमेश्वर का पवित्र जन।" फिर एक वाक्य में उसके लिए प्रार्थना कीजिए।
शास्त्र की गूँज
पहली चिट्ठी की शुरुआत भी लगभग यही थी: वहाँ भी पौलुस कुरिन्थुस की उसी झगड़ालू मंडली को परमेश्वर की कलीसिया और पवित्र किए हुए लोग कहकर संबोधित करता है। यह दोहराव संयोग नहीं। दो चिट्ठियों के बीच कड़वाहट, आँसू और एक तीखा पत्र आ चुका है, फिर भी पता नहीं बदला। परमेश्वर की पहचान उनके व्यवहार के साथ ऊपर-नीचे नहीं होती। दूसरी गूँज गलातियों की शुरुआत से है, जहाँ पौलुस और ज़ोर देकर कहता है कि उसका प्रेरितपन मनुष्यों की ओर से नहीं। दोनों जगह वह अपने पद का बचाव नहीं, अपने संदेश का स्रोत बता रहा है। यही अंतर नैतिक रूप से निर्णायक है: जो अपने ओहदे का बचाव करता है वह लड़ता है, जो अपने भेजनेवाले का नाम लेता है वह सेवा करता है।
पहले पाठक
कुरिन्थुस बंदरगाह शहर था, पैसा, प्रतिष्ठा और वक्तृत्व की मंडी। वहाँ किसी की बात का वज़न इस पर टिकता था कि वह कैसा बोलता है, किसका संरक्षण उसे प्राप्त है, उसकी उपस्थिति कितनी प्रभावशाली है। इन कानों को "परमेश्वर की इच्छा से प्रेरित" सुनना एक झटका था: पौलुस अपनी सिफारिश किसी सरपरस्त से नहीं, सीधे परमेश्वर से जोड़ता है, और साथ ही अपने नाम के बगल में एक युवा सहकर्मी को "भाई तीमुथियुस" कहकर बिठा देता है। उस समाज में यह दर्जा घटाना था, सम्मान बाँटना। और "सारे अखाया के सब पवित्र लोग" सुनकर कुरिन्थुस के लोगों को याद आता कि वे केंद्र नहीं हैं; छोटे कस्बों की मंडलियाँ भी उसी चिट्ठी की हकदार हैं।
मुख्य पात्र
पौलुस इस पंक्ति में दो बार अपने को छोटा करता है और एक बार बड़ा। बड़ा, क्योंकि वह प्रेरित है और यह बात वह छिपाता नहीं; छोटा, क्योंकि यह पद उसकी इच्छा से नहीं परमेश्वर की इच्छा से है, और क्योंकि वह अकेले हस्ताक्षर नहीं करता। यहाँ एक ऐसे आदमी का चित्र है जो घायल है, जिसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठे हैं, जो आगे चलकर अपने क्लेशों और मृत्यु के भय की बात खोलकर कहेगा, फिर भी जो पहली पंक्ति में अपने बचाव की जगह अपने भेजनेवाले का नाम रखता है। यही आत्मिक परिपक्वता है: जब आपको ठेस लगी हो तब भी बातचीत की शुरुआत परमेश्वर से करना, अपनी शिकायत से नहीं।
चिंतन
आप जिस जिम्मेदारी में हैं, उसे आप अपनी कमाई मानते हैं या सौंपी हुई अमानत? आपके व्यवहार में इसका फर्क कहाँ दिखेगा?
मंडली के किस व्यक्ति को आपने चुपचाप "पवित्र जन" की सूची से बाहर कर रखा है, और उसे वापस भीतर लाने के लिए इस हफ्ते आप क्या करेंगे?
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2 Corinthians 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 1:1 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 1:1 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 1:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस पर आरोप था कि उसकी बातों के पीछे कुछ और छिपा है। उसका जवाब सीधा है: "हम तुम्हें और कुछ नहीं लिखते, केवल वह जो तुम पढ़ते या मानते भी हो।" जो लिखा, वही कहा। जो कहा, वही जिया। सोचो, क्या तुम्हारे शब्दों को किसी ने दो बार पढ़कर समझना पड़ता है? पारदर्शिता प्रेम का सबसे शांत रूप है।
पिता, तू मेरे मन का गवाह है। जो बातें कोई नहीं जानता, वे तुझसे छिपी नहीं। मुझे ऐसा दिल दे जो दूसरों को चोट पहुँचाने से पहले रुक जाए, और कठोरता के बजाय कोमलता चुने। मेरी चुप्पी भी तेरे प्रेम से भरी हो।
पौलुस अपनी यात्रा की योजना बताते हुए एक छोटी सी बात कहता है, "तुम मुझे यहूदिया की ओर कुछ दूर तक पहुँचा दो।" इतना बड़ा प्रेरित, और फिर भी कलीसिया से सहारा माँग रहा है। जिनको वह सिखाता था, उन्हीं के साथ चलने की उसे चाह थी।
क्या तुम भी किसी को अपनी ज़रूरत बता सकते हो? अकेले चलना पवित्रता नहीं, कई बार बस अभिमान होता है।
पौलुस की योजना प्यार से बनी थी, "कि तुम्हें दूसरी बार आशीष मिले।" फिर भी वह योजना बदल गई, और कुरिन्थ के लोगों ने सोचा कि वह चंचल है। कभी तुम्हारा भी सबसे अच्छा इरादा गलत समझा गया है? दुख होता है। पर ध्यान दो, पौलुस सफाई देने से पहले अपने दिल की नीयत परमेश्वर के सामने रखता है। लोगों की राय से पहले उसकी नजर में साफ रहना सीखो।
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