2 कुरिन्थियों 1
पाठ
पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को अभिवादन भेजता है और तुरन्त परमेश्वर की स्तुति में फूट पड़ता है: वे "दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर" हैं, जो हमें क्लेश में सांत्वना देते हैं ताकि हम दूसरों को दे सकें। फिर वह आसिया में हुए उस संकट की बात करता है जिसमें उसे लगा कि मृत्यु का फैसला सुना जा चुका है। अन्त में वह अपने बदले हुए यात्रा-कार्यक्रम का बचाव करता है: वह चंचल नहीं है, क्योंकि जिस मसीह का उसने प्रचार किया उसमें "हाँ" ही "हाँ" है, और परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में पूरी होती हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए, पद 4 में एक छोटा-सा शब्द है जो सब कुछ बदल देता है: "ताकि"। परमेश्वर सांत्वना देते हैं ताकि हम दे सकें। यूनानी में यहाँ पाराक्लेसिस है, वह शब्द जिसका अर्थ है किसी के पास आकर खड़े होना, हिम्मत बँधाना। यह कोई निजी सम्पत्ति नहीं है जिसे हम अपने दुःख की तिजोरी में बन्द रखें; यह अमानत है। और पद 9 इसे और तीखा करता है: पौलुस मृत्यु के मुँह तक पहुँचा ताकि वह अपने ऊपर भरोसा करना छोड़ दे। परमेश्वर ने संकट को नहीं हटाया, उसे आत्मनिर्भरता के अन्त तक ले गए। जो परमेश्वर मरे हुओं को जिलाते हैं, उन पर भरोसा तब ही सीखा जाता है जब अपने संसाधन चुक जाते हैं।
मुख्य सूत्र
पद 20 पूरी बाइबल को एक वाक्य में बाँध देता है: "परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में 'हाँ' के साथ हैं।" अब्राहम से लेकर भविष्यद्वक्ताओं तक जो कहा गया, वह हवा में लटका नहीं रहा; मसीह में उसका उत्तर मिला। इसीलिए पौलुस अपने दुःख को "मसीह के दुःख" कहता है (पद 5): क्रूस और पुनरुत्थान का ढाँचा उसके जीवन पर छप गया है। और पद 22 में आत्मा को "बयाना" कहा गया है, यानी आने वाले युग की पहली किश्त, जो हमारे भीतर पहले ही जमा हो चुकी है। हम अन्तिम भुगतान की प्रतीक्षा में जी रहे हैं, खाली हाथ नहीं।
आईना
तो यह हमारे जीवन में कहाँ चुभता है? पहले वहाँ जहाँ हम अपने घाव को निजी बना लेते हैं। आपने नौकरी खोई, बच्चा खोया, निदान सुना, और उसमें परमेश्वर की सांत्वना पाई। पद 4 के अनुसार वह अनुभव अब आपका नहीं, कलीसिया का है। जिस माँ के बेटे ने पिछले महीने वही खबर सुनी, उसके पास जाना आपकी सेवा नहीं, आपका कर्तव्य है।
दूसरा, वहाँ जहाँ हमारी बात भरोसे के लायक नहीं है। पौलुस पर आरोप लगा कि उसका "हाँ" और "नहीं" एक साथ चलता है। हम इसे शालीनता कहते हैं: "देखते हैं", "कोशिश करूँगा", संदेश पढ़ लिया पर उत्तर नहीं दिया, विकल्प खुले रखे। परमेश्वर का वचन ऐसा नहीं है, और जो उनका नाम लेता है उसका वचन भी ऐसा नहीं हो सकता। पद 12 इसे "विवेक की गवाही" कहता है, वह ईमानदारी जो तब भी कायम रहे जब कोई देख न रहा हो: हिसाब में, वादे में, समय में।
और तीसरा, पद 24: "यह नहीं, कि हम विश्वास के विषय में तुम पर प्रभुता जताना चाहते हैं।" यह हर उस व्यक्ति के लिए है जिसके हाथ में किसी और की आत्मा पर अधिकार है, माता-पिता, प्राचीन, समूह का अगुआ। आपका काम दबाव डालना नहीं, आनन्द में सहायक होना है।
आज ही करें: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आपने हफ्तों से अस्पष्ट उत्तर दिया है, और अभी उसे एक साफ "हाँ" या "नहीं" भेज दीजिए, बिना सफाई के।
प्रसंग
कुरिन्थ एक बन्दरगाह-नगर था, पैसे और प्रतिष्ठा का शहर, जहाँ प्रभावशाली वक्ता की इज़्ज़त होती थी और दुर्बल आदमी की नहीं। पौलुस यह पत्र किसी कठिन भेंट और एक कड़वी चिट्ठी के बाद, सम्भवतः मकिदुनिया से, लगभग 55-56 ई. में लिखता है। कलीसिया में कुछ लोग उसकी पीठ पीछे कह रहे थे कि जो प्रेरित पिटता है, कैद होता है, और अपना कार्यक्रम बदल देता है, वह भरोसेमन्द नहीं। आसिया का संकट, चाहे इफिसुस का दंगा हो या कोई जानलेवा बीमारी, उनके लिए पौलुस की कमज़ोरी का सबूत था। पौलुस उसे उल्टा कर देता है: यही उसका प्रमाणपत्र है, क्योंकि यही मसीह का रास्ता है।
कठिन प्रश्न
पद 6 सहज नहीं है: "यदि हम क्लेश पाते हैं, तो यह तुम्हारी शान्ति और उद्धार के लिये है।" क्या परमेश्वर किसी के दुःख को दूसरों के लाभ का साधन बनाते हैं? पौलुस यहाँ कोई सिद्धान्त नहीं गढ़ रहा; वह पीछे मुड़कर देखता है और पाता है कि उसकी टूटन दूसरों के लिए द्वार बनी। पर पद 10 का "बचाएगा" फिर भी खटकता है, क्योंकि अन्त में पौलुस बचा नहीं, मारा गया। तो वादा क्या था? यह नहीं कि हर मृत्यु टल जाएगी, बल्कि यह कि जो परमेश्वर मरे हुओं को जिलाते हैं वही अन्तिम शब्द बोलेंगे। "हाँ" परिस्थितियों में नहीं, मसीह में है। इससे कम कहना झूठी तसल्ली होगी।
शास्त्र की गूँज
पद 3-4 की भाषा यशायाह 40 से उठती है, जहाँ परमेश्वर निर्वासित इस्राएल को कहते हैं कि उसे शान्ति दी जाए; पौलुस यह घोषित कर रहा है कि निर्वासन के अन्त की वह सांत्वना अब मसीह की देह में बहने लगी है, और हम उसकी नालियाँ हैं। और पद 17-18 के पीछे यीशु का अपना वचन सुनाई देता है, कि तुम्हारी हाँ हाँ हो और नहीं नहीं; पौलुस उसे केवल नैतिक नियम नहीं, परमेश्वर के चरित्र का प्रतिबिम्ब बताता है। सच बोलना अच्छे व्यवहार की बात नहीं, उस परमेश्वर की नकल है जिसकी प्रतिज्ञाएँ दो तरफ नहीं झूलतीं।
चिन्तन के प्रश्न
आपके किस दुःख में परमेश्वर ने आपको सांत्वना दी थी, और वह अनुभव अब तक किसके काम आया है?
आपके शब्दों पर लोग कितना भरोसा कर सकते हैं, और अगर कम, तो आप किस चीज़ से बचना चाह रहे हैं?
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2 Corinthians 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 1 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 1 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस की योजना प्यार से बनी थी, "कि तुम्हें दूसरी बार आशीष मिले।" फिर भी वह योजना बदल गई, और कुरिन्थ के लोगों ने सोचा कि वह चंचल है। कभी तुम्हारा भी सबसे अच्छा इरादा गलत समझा गया है? दुख होता है। पर ध्यान दो, पौलुस सफाई देने से पहले अपने दिल की नीयत परमेश्वर के सामने रखता है। लोगों की राय से पहले उसकी नजर में साफ रहना सीखो।
पिता, जब दर्द से गुज़रती हूँ, तो समझ नहीं आता कि इसका मकसद क्या है। पर तू कहता है कि मेरी तकलीफ बेकार नहीं जाती, उससे किसी और को हिम्मत मिल सकती है। मुझे यह भरोसा दे, और जो सांत्वना तुझसे मिली है, उसे दूसरों तक पहुँचाना सिखा।
पौलुस पर आरोप था कि वह अपनी बात बदल देता है, कभी हाँ कभी ना। जवाब में वह अपनी सफाई नहीं, मसीह को सामने रखता है: "क्योंकि परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में 'हाँ' के साथ हैं।" तुम्हारी प्रार्थना का जवाब देर से आए, तब भी परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदलता। और तुम्हारा "आमीन" कहना, यह उसकी हाँ पर भरोसा करना है।
पिता, मैं जानता हूँ कि मेरी नींव मेरी अपनी मजबूती नहीं, बल्कि तेरा थामना है। जब मन डगमगाता है, तू मुझे मसीह में स्थिर रखता है। तूने मुझे चुना और अपना कहा, यही मेरा भरोसा है। आज मुझे इसी सच्चाई में चलने दे।
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