2 कुरिन्थियों 10
पाठ
कुरिन्थ में किसी ने पौलुस के बारे में यह कहा था: चिट्ठियाँ तो ज़ोरदार लिखता है, पर सामने आता है तो "वह देह का निर्बल और वक्तव्य में हलका जान पड़ता है।" इस ताने के जवाब में पौलुस यह अध्याय लिखता है। वह अपनी दीनता को छिपाता नहीं, बल्कि उसे "मसीह की नम्रता, और कोमलता" से जोड़ता है, और साथ ही यह घोषित करता है कि उसकी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं हैं, बल्कि गढ़ों को ढा देनेवाले हैं। फिर वह अपने विरोधियों की उस बीमारी पर उँगली रखता है जो आज भी सेवकाई को खा जाती है: अपनी प्रशंसा, आपस की तुलना, और दूसरों के परिश्रम पर घमण्ड। अंत में एक ही मापदण्ड बचता है, "जो घमण्ड करे, वह प्रभु पर घमण्ड करे।"
मर्म
यहाँ असली प्रश्न अधिकार का नहीं, अधिकार के आकार का है। कुरिन्थ के लोग रोमी संसार के मानदण्डों से प्रेरितों को नाप रहे थे: प्रभावशाली उपस्थिति, ऊँचा भाषण, आत्मविश्वास से भरी वाणी। पौलुस इस पैमाने को ही तोड़ देता है। परमेश्वर ने उसे अधिकार दिया, पर "तुम्हारे बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये।" यही परमेश्वर का चरित्र है: उनकी सामर्थ्य कुचलती नहीं, गढ़ती है। और वह सामर्थ्य दिखती भी वहीं है जहाँ मनुष्य कमज़ोरी देखता है। इसलिए यह पाठ केवल पौलुस का बचाव नहीं, यह इस बात का प्रकाशन है कि परमेश्वर अपना काम संसार के हथियारों से नहीं करते। जो सेवक अपने प्रभाव से लोगों को झुकाता है, वह चाहे कितनी भीड़ जुटा ले, वह दूसरे युद्ध में लड़ रहा है।
सूत्र
ध्यान दीजिए, पौलुस अपनी नम्रता को अपना स्वभाव नहीं कहता, वह उसे "मसीह की नम्रता, और कोमलता" कहता है। यह वही मसीह हैं जिन्होंने कहा कि वे मन में दीन हैं, और जो गदहे पर बैठकर यरूशलेम में आए, जिनका सिंहासन क्रूस निकला। पौलुस की दुर्बल उपस्थिति उस पैटर्न की नकल नहीं, उसका फल है। सुसमाचार का पूरा ढाँचा ही यही है: परमेश्वर नीचे उतरकर जीतते हैं। और फिर पद 5 पर लौटिए, हर भावना को "कैद करके मसीह का आज्ञाकारी" बनाना। रोमी विजय-यात्रा में बंदी राजा के पीछे चलते थे; यहाँ विजेता मसीह हैं और बंदी हमारे विचार हैं। जो क्रूस पर हारा हुआ लगा, वही अब मनुष्य के मन का स्वामी है। यही मुक्ति की योजना का धागा है, और पौलुस उसी धागे पर टँगा है।
दर्पण
तुलना। पद 12 का वाक्य आपके भीतर कहीं चुभता है, क्योंकि हम रोज़ यही करते हैं। आप अपने समूह की उपस्थिति दूसरे समूह से नापते हैं, अपने बच्चों के परिणाम पड़ोसी के बच्चों से, अपनी सेवकाई की चर्चा उस व्यक्ति से जिसे लोग ज़्यादा सुनते हैं। पौलुस इसे नैतिक पाप नहीं, मूर्खता कहता है: जो आपस में नाप तौल करते हैं, वे "मूर्ख ठहरते हैं।" क्योंकि तुलना का पैमाना ही झूठा है। और दूसरा दर्पण: क्या आपके अधिकार से लोग बनते हैं या बिगड़ते हैं? घर में, दफ़्तर में, कलीसिया की बैठक में, आपके पास जितनी भी शक्ति है, उसका असर देखिए। जहाँ आपकी उपस्थिति लोगों को छोटा करती है, वहाँ वह मसीह का अधिकार नहीं, केवल शरीर का बल है।
बारीकी
"सीमा" शब्द चार बार आता है, और यह पौलुस का बहुत सचेत चुनाव है। मूल में यह नापी हुई ज़मीन का हिस्सा है, जैसे किसी को बाँटकर दिया गया खेत। परमेश्वर ने उसके लिए एक क्षेत्र ठहराया, और कुरिन्थ उसी क्षेत्र में पड़ता है, क्योंकि "मसीह का सुसमाचार सुनाते हुए तुम तक पहुँच चुके हैं।" उसके विरोधी दूसरों के बनाए काम पर दावा जमा रहे थे; पौलुस के लिए यह चोरी जैसा है। इसमें एक गहरी बात छिपी है: सेवकाई विरासत है, अधिग्रहण नहीं। परमेश्वर ने आपको जो नापकर दिया है, उतना ही आपका है, और उसी में आपको स्वतंत्रता है। जो अपनी सीमा जानता है, वह दूसरों की सफलता से घबराता नहीं, क्योंकि उसका खेत उसे किसी और के खेत से मिला नहीं है।
प्रश्न
पद 6 खटकता है: "हर एक प्रकार की आज्ञा न मानने का पलटा लें।" जो अभी मसीह की कोमलता की दुहाई दे रहा था, वह अब दण्ड की बात करता है। इसे मीठा करके टालना बेईमानी होगी। पौलुस चेतावनी दे रहा है कि कोमलता कमज़ोरी नहीं है; जो चरवाहा भेड़ों से प्रेम करता है, वह भेड़ियों से नहीं मुस्कुराता। पर यह असहज बना रहता है, क्योंकि इतिहास में कलीसियाई अधिकार ने इसी तरह की भाषा का दुरुपयोग किया है। शायद बचाव यही है जो पौलुस ख़ुद देता है: अधिकार का उद्देश्य बनाना है, बिगाड़ना नहीं। जहाँ अनुशासन बनाता नहीं, वहाँ वह मसीह का अनुशासन नहीं। लेकिन इस सीमा-रेखा को कब कैसे खींचा जाए, यह पाठ खुला छोड़ देता है, और हमें उसी बेचैनी में रहना पड़ता है।
पहचान
कुरिन्थ एक बंदरगाह-नगर था, महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा से भरा। वहाँ घूमते-फिरते वक्ता पैसे लेकर भाषण देते थे, और श्रोता उनकी शारीरिक उपस्थिति, आवाज़ और शैली पर जज करते थे। ऐसे माहौल में एक ऐसा प्रेरित, जो हाथ से काम करता था, जिसके शरीर पर पिटाई के निशान थे, जो बोलने में साधारण था, स्वाभाविक रूप से घटिया लगता। कुरिन्थ के विश्वासियों को शर्म आती थी कि उनका संस्थापक इतना अप्रभावशाली है। इसलिए उनके कानों में यह अध्याय एक धक्का था: पौलुस उन्हें अपनी शर्म से बाहर नहीं निकालता, बल्कि उन्हें सिखाता है कि उस शर्म का स्रोत मसीह के क्रूस में है। जिसे तुम कमज़ोरी कहते हो, वही तुम्हारे उद्धार का तरीका था।
चिंतन
आपके भीतर किस व्यक्ति के साथ तुलना की आवाज़ सबसे तेज़ है, और वह तुलना आपको मसीह की सेवा में क्या क़ीमत चुकवा रही है?
परमेश्वर ने जो "सीमा" आपके लिए ठहराई है, उसे पहचानने में आपको क्या रोक रहा है: महत्वाकांक्षा, डर, या दूसरों की अपेक्षाएँ?
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2 Corinthians 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 10 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 10 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे भीतर झाँककर देख कि मैं किस तरह जी रहा हूँ। कहीं मेरे फैसले सिर्फ दुनिया की सोच से तो नहीं चल रहे? मुझे ऐसा साहस दे जो नम्रता से भरा हो, और ऐसा दिल जिसे किसी के सामने कठोर होने की ज़रूरत न पड़े।
पौलुस के बारे में लोग कहते थे, "उसकी पत्रियाँ तो गम्भीर और प्रभावशाली हैं, परन्तु जब देखते हैं, तो वह देह का निर्बल और वक्तव्य में हल्का जान पड़ता है।" जिस आदमी के पत्र आज भी कलीसिया को थामे हुए हैं, उसे उसके जमाने में कमज़ोर और फीका कहा गया। तुम्हें भी शायद किसी ने आँका हो, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारा रूप, तुम्हारा बोलने का ढंग देखकर। परमेश्वर वहीं से काम शुरू करता है, जहाँ लोग मुँह फेर लेते हैं।
तुम इन बातों को जो आँखों के सामने हैं देखते हो।" पौलुस की शिकायत यही थी, लोग उसे उसकी कमज़ोर काया और साधारण बोली से तौल रहे थे। आज भी हम किसी को कपड़ों, पद या बोलने के ढंग से आँक लेते हैं। पर जो मसीह का है, वह मसीह का है। क्या तुम्हारी नज़र भी सिर्फ़ ऊपरी सतह तक ही जाती है?
पौलुस दूसरों की मेहनत पर अपना नाम नहीं लिखता। उसकी आशा अजीब है: "ज्यों-ज्यों तुम्हारा विश्वास बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों हम अपनी सीमा के अनुसार तुम्हारे कारण और भी बढ़ते जाएँगे।" उसका बढ़ना दूसरों के बढ़ने से बंधा हुआ है। खुद से पूछो: क्या मुझे सच में खुशी होती है जब कोई और मसीह में मज़बूत होता है, या तब जब मेरा नाम लिया जाता है?
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