2 कुरिन्थियों 10:10
पाठ
पौलुस अपने आलोचकों का वाक्य ज्यों का त्यों उद्धृत करते हैं, बिना उसे नरम किए: "उसकी पत्रियाँ तो गम्भीर और प्रभावशाली हैं; परन्तु जब देखते हैं, तो कहते है वह देह का निर्बल और वक्तव्य में हलका जान पड़ता है।" कुरिन्थुस में लोग यह कह रहे थे कि दूर से लिखी चिट्ठियों में यह आदमी शेर है, पर सामने खड़ा हो तो कुछ भी नहीं, दुबला शरीर, दबी आवाज़, बोलने की कोई कला नहीं। यह ताना उनके सन्देश पर नहीं, उनके शरीर और उनकी वाक्पटुता पर था। और पौलुस इस ताने को छिपाते नहीं, वे उसे अपनी ही चिट्ठी में दर्ज कर देते हैं, ताकि पूरी कलीसिया उसे पढ़े और खुद तय करे कि प्रेरिताई की पहचान आखिर किस चीज़ से होती है।
मूल बात
यह पद एक बुनियादी प्रश्न खोल देता है: परमेश्वर का अधिकार किस रूप में इस दुनिया में आता है? कुरिन्थुस की संस्कृति में वक्ता का शरीर, उसकी उपस्थिति, उसका प्रभावशाली बोलना ही उसके संदेश की गारंटी माना जाता था। पौलुस इस पूरे पैमाने को उलट देते हैं, और वे ऐसा किसी विनम्रता के दिखावे से नहीं करते, बल्कि इसलिए कि उनका मसीह क्रूस पर चढ़ा हुआ मसीह है। जिस राजा की महिमा उसकी कमज़ोरी में प्रकट हुई, उसके दूत की विश्वसनीयता भी किसी और तराजू पर नहीं तौली जा सकती। इसीलिए वे आगे कहते हैं कि "हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं"। निर्बल देह और हलका वक्तव्य कोई शर्मिंदगी नहीं, वे उस सुसमाचार के अनुरूप हैं जो मनुष्य की प्रभावशीलता पर नहीं, परमेश्वर के सामर्थ्य पर टिका है। जहाँ कलीसिया यह भूलती है, वहाँ वह मसीह की जगह किसी और की चमक पूजने लगती है।
सूत्र
यह ताना अकेला नहीं खड़ा है; यह बाइबल की एक लम्बी धारा में बहता है। परमेश्वर बार-बार ऐसे लोगों को चुनते हैं जिनकी उपस्थिति प्रभावित नहीं करती। मूसा ने जलती झाड़ी के सामने यही कहा था कि वे बोलने में निपुण नहीं हैं, और परमेश्वर ने उन्हें वाक्पटु बनाने के बजाय भेज दिया। शमूएल को यिशै के घर में सिखाया गया कि मनुष्य बाहरी रूप देखता है पर परमेश्वर मन। यशायाह का वह दास, जिसमें न कोई रूप था न ऐसा तेज कि लोग उसे चाहें, इसी धारा का सबसे गहरा बिंदु है। पौलुस की दुबली देह और साधारण बोली उस क्रूस की प्रतिध्वनि है जिसे रोमी दुनिया ने घिनौना समझा। सुसमाचार की पूरी कहानी इसी उलटे क्रम पर चलती है: जो देखने में तुच्छ है, उसी में परमेश्वर अपनी सामर्थ्य रखते हैं।
दर्पण
आप जानते हैं वह क्षण: सभा के बाद किसी ने कहा कि दूसरे वक्ता की बात ज़्यादा "असरदार" थी। या दफ़्तर में वह सहकर्मी जो कम जानता है पर आत्मविश्वास से बोलता है, और आप अपनी तैयारी के बावजूद पीछे रह जाते हैं। शरीर का ढलना, आवाज़ का काँपना, अंग्रेज़ी या मंच की कला का अभाव, ये सब हमें भीतर से खोखला कर देते हैं। और खतरा दोनों तरफ़ है: या तो हम चमक पाने के लिए खुद को बदलने लगते हैं, या हम कड़वाहट में अपनी उपेक्षा को ओढ़ लेते हैं। पौलुस दोनों नहीं करते; वे ताने को दर्ज करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। आज वह एक वाक्य कागज़ पर लिखिए जो किसी ने आपके बारे में कहा और जो आज तक चुभता है, उसके नीचे लिखिए "जो घमण्ड करे, वह प्रभु पर घमण्ड करे", और उसे ऊँची आवाज़ में एक बार पढ़िए।
संदर्भ
कुरिन्थुस एक बंदरगाह शहर था जहाँ प्रतिष्ठा बिकती थी। घूमते हुए वक्ता भीड़ जुटाते, शुल्क लेते, और उनकी सफलता उनकी देह, हावभाव और भाषण-कला से नापी जाती थी। इसी माहौल में कुछ नए शिक्षक कुरिन्थुस पहुँचे, सिफ़ारिशी पत्र लेकर, आत्मविश्वास से भरे, और उन्होंने पौलुस की तुलना अपने आप से करवाई। पौलुस ने वहाँ अपने हाथों से तंबू सिलकर कमाया था, यानी समाज की नज़र में वे एक मज़दूर थे, दार्शनिक नहीं। जिन लोगों को उन्होंने मसीह तक पहुँचाया, वही अब उनके रूप-रंग पर हँस रहे थे। अध्याय दस से तेरह तक पत्री का स्वर अचानक तीखा हो जाता है, क्योंकि यहाँ पौलुस अपनी इज़्ज़त नहीं, उस सुसमाचार की सच्चाई बचा रहे हैं जिसे उन्होंने उन्हें सौंपा था।
अंतर्पाठ
पौलुस खुद इस बहस को पहले ही शुरू कर चुके थे। पहली पत्री में उन्होंने कुरिन्थुस वालों को याद दिलाया कि वे उनके पास ज्ञान या वाक्पटुता की श्रेष्ठता लेकर नहीं आए, और यह कि परमेश्वर ने जगत की निर्बल और तुच्छ वस्तुओं को चुना। गलातियों में वे लिखते हैं कि शरीर की किसी दुर्बलता के कारण ही उन्होंने पहली बार वहाँ सुसमाचार सुनाया था; बीमारी ही सेवा का द्वार बनी। और इस अध्याय के अंत में पौलुस स्वयं यिर्मयाह की ओर इशारा करते हैं, जहाँ बुद्धिमान, बलवान और धनी को अपनी-अपनी चीज़ पर घमण्ड करने से मना किया गया है। यानी कुरिन्थुस का यह विवाद कोई नई बात नहीं, वही पुराना झगड़ा है: मनुष्य किस आधार पर अपने आप को खड़ा करता है।
विवरण
"वक्तव्य में हलका" के पीछे यूनानी शब्द है एक्सूथेनेमेनोस, जिसका अर्थ "हलका" से कहीं कड़ा है: तुच्छ समझा गया, शून्य गिना गया, ठुकराया हुआ। यह कोई शिष्ट आलोचना नहीं थी, यह अपमान था। और यहीं इस पद की सबसे बारीक बात छिपी है: यही शब्द पौलुस पहले लिख चुके थे उन "तुच्छ वस्तुओं" के लिए जिन्हें परमेश्वर ने चुना ताकि बड़ी वस्तुएँ व्यर्थ ठहरें। आलोचक जो शब्द गाली की तरह फेंकते हैं, वही परमेश्वर के चुनाव की भाषा है। पौलुस ने इस ताने को मिटाया नहीं; उन्होंने उसे पत्री में जड़ दिया, क्योंकि जिस श्रेणी में उन्हें डाला गया था, उसी श्रेणी में उनका प्रभु भी खड़ा था।
चिंतन
आप अपनी सेवा या अपने विश्वास की सफलता किस पैमाने से नापते हैं, और वह पैमाना आपने कहाँ से उधार लिया है?
किस व्यक्ति को आपने अनजाने में "तुच्छ" की श्रेणी में रख दिया है, और इस सप्ताह आप उसे कैसे सुनेंगे?
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2 Corinthians 10:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 कुरिन्थियों 10:10 का क्या अर्थ है?
2 कुरिन्थियों 10:10 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 10:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 कुरिन्थियों 10:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 कुरिन्थियों 10:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Corinthians 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे भीतर झाँककर देख कि मैं किस तरह जी रहा हूँ। कहीं मेरे फैसले सिर्फ दुनिया की सोच से तो नहीं चल रहे? मुझे ऐसा साहस दे जो नम्रता से भरा हो, और ऐसा दिल जिसे किसी के सामने कठोर होने की ज़रूरत न पड़े।
पौलुस के बारे में लोग कहते थे, "उसकी पत्रियाँ तो गम्भीर और प्रभावशाली हैं, परन्तु जब देखते हैं, तो वह देह का निर्बल और वक्तव्य में हल्का जान पड़ता है।" जिस आदमी के पत्र आज भी कलीसिया को थामे हुए हैं, उसे उसके जमाने में कमज़ोर और फीका कहा गया। तुम्हें भी शायद किसी ने आँका हो, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारा रूप, तुम्हारा बोलने का ढंग देखकर। परमेश्वर वहीं से काम शुरू करता है, जहाँ लोग मुँह फेर लेते हैं।
तुम इन बातों को जो आँखों के सामने हैं देखते हो।" पौलुस की शिकायत यही थी, लोग उसे उसकी कमज़ोर काया और साधारण बोली से तौल रहे थे। आज भी हम किसी को कपड़ों, पद या बोलने के ढंग से आँक लेते हैं। पर जो मसीह का है, वह मसीह का है। क्या तुम्हारी नज़र भी सिर्फ़ ऊपरी सतह तक ही जाती है?
पौलुस दूसरों की मेहनत पर अपना नाम नहीं लिखता। उसकी आशा अजीब है: "ज्यों-ज्यों तुम्हारा विश्वास बढ़ता जाएगा, त्यों-त्यों हम अपनी सीमा के अनुसार तुम्हारे कारण और भी बढ़ते जाएँगे।" उसका बढ़ना दूसरों के बढ़ने से बंधा हुआ है। खुद से पूछो: क्या मुझे सच में खुशी होती है जब कोई और मसीह में मज़बूत होता है, या तब जब मेरा नाम लिया जाता है?
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