बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

बादल ने उन्हें छिपा लिया, और ग्यारह लोग आकाश की ओर ताकते रह गए। लूका अपनी दूसरी पुस्तक थियुफिलुस के नाम खोलते हैं: चालीस दिन तक जी उठे यीशु मसीह अपने प्रेरितों को दिखाई देते रहे, परमेश्वर के राज्य की बातें करते रहे, और अंत में एक आज्ञा छोड़ गए, यरूशलेम मत छोड़ो, पिता की प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा करो। फिर वे ऊपर उठा लिए गए, दो श्वेत वस्त्रधारी पुरुष उन ताकते हुए शिष्यों को फिर धरती पर लौटाते हैं, और वे अटारी पर जाकर प्रार्थना में लग जाते हैं। इसी प्रतीक्षा के बीच पतरस खड़े होते हैं और यहूदा के खाली हुए स्थान पर मत्तियाह चिट्ठी द्वारा चुने जाते हैं।

मर्म

यह अध्याय एक अजीब खालीपन पर टिका है। यीशु मसीह चले गए हैं, आत्मा अभी नहीं आए हैं। बीच में केवल प्रतीक्षा है। और यही परमेश्वर के काम करने का ढंग है: वे अपने लोगों को अंतराल में रखते हैं, जहाँ न पुराना पकड़ में है न नया हाथ आया है। शिष्य पूछते हैं, "हे प्रभु, क्या तू इसी समय इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेगा?" उत्तर मिलता है कि समयों का ज्ञान उनका काम नहीं। ध्यान दें, प्रश्न को गलत नहीं कहा गया, केवल उसका उत्तर रोक लिया गया। परमेश्वर सब कुछ नहीं बताते। वे सामर्थ्य देने का वचन देते हैं, कार्यक्रम नहीं। विश्वास यहाँ जानकारी नहीं, सौंपना है।

सूत्र

चालीस दिन। जल से बपतिस्मा, फिर आत्मा से बपतिस्मा। जैतून पहाड़ से बादल में उठ जाना। ये चित्र संयोग नहीं हैं। इस्राएल चालीस वर्ष जंगल में रहा, प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा करता हुआ; अब चालीस दिन तक मसीह अपने लोगों को नई प्रतिज्ञा के लिए तैयार करते हैं। और जो बादल यीशु मसीह को ढाँकता है, वही बादल है जो सीनै पर उतरा और मंदिर को भर गया, परमेश्वर की उपस्थिति का पर्दा। मसीह किसी शून्य में नहीं जाते, वे पिता के सिंहासन तक जाते हैं। "यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक" यह भूगोल अब्राहम से चला आ रहा वादा है, कि उसके द्वारा पृथ्वी की सब जातियाँ आशीष पाएँगी। कहानी सिकुड़ी नहीं, फैल गई।

आत्म-दर्पण

आप और मैं वही प्रश्न पूछते हैं, बस दूसरे शब्दों में। कब ठीक होगी यह बीमारी? कब यह नौकरी मिलेगी? कब वह बेटा लौटेगा जो सालों से बात नहीं करता? हम समय जानना चाहते हैं, क्योंकि समय जानना नियंत्रण जैसा लगता है। और उत्तर वही आता है, कोमल लेकिन दृढ़: वह जानना तुम्हारा काम नहीं। यह टाल-मटोल नहीं है, यह भार उतारना है। पर हमारी दूसरी बीमारी भी यहीं पकड़ी जाती है, आकाश की ओर ताकते रह जाना। कुछ लोग प्रतीक्षा को इतना आत्मिक बना लेते हैं कि जीना भूल जाते हैं, दफ्तर, रसोई, पड़ोसी सब गौण हो जाते हैं। स्वर्गदूत उन्हें झिंझोड़ते हैं: नीचे देखो, शहर वहाँ है, गवाही वहाँ होनी है।

एक बारीकी

"हे गलीली पुरुषों।" कमाल है कि उन्हें प्रेरित नहीं, गलीली कहा गया। गलील उस समय ताने का नाम था, यरूशलेम के पढ़े-लिखे लोग गलीली उच्चारण पर हँसते थे। पतरस की जबान ने आँगन में उसे पकड़वा दिया था। यानी जिस क्षण मसीह महिमा में उठाए जाते हैं, उनके गवाहों को उनकी देहाती पहचान से पुकारा जाता है। न कोई उपाधि, न कोई पदोन्नति। जो पृथ्वी की छोर तक जाना है, वह ग्यारह गँवई मर्दों और अटारी में प्रार्थना करती कुछ स्त्रियों से शुरू होता है। परमेश्वर अपनी योजना को छिपाते नहीं, पर वे उसे उन हाथों में देते हैं जिन्हें दुनिया गिनती में नहीं लेती।

पहले सुननेवाले

थियुफिलुस और उसके जैसे पाठक एक ऐसे आंदोलन के बारे में पढ़ रहे थे जिसका संस्थापक रोमी क्रूस पर मारा गया था। उनके मन में सहज संदेह होगा: क्या यह हारी हुई बात है? लूका का उत्तर यह है कि वह मरा हुआ नहीं, "बहुत से पक्के प्रमाणों से" जीवित है, और वह अब ऊपर से राज करता है। जिन विश्वासियों ने पहली सदी में यह पढ़ा, वे अल्पसंख्यक थे, संदिग्ध थे, कभी-कभी सताए हुए। उनके लिए यह अध्याय कहता है कि उनकी छोटी सभा किसी दुर्घटना का अवशेष नहीं, एक भेजी गई गवाही है, और उनका प्रभु लौटेगा "जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से।"

पृष्ठभूमि

समय ईस्टर के लगभग छह सप्ताह बाद, स्थान यरूशलेम, वही शहर जहाँ कुछ हफ्ते पहले भीड़ ने "क्रूस पर चढ़ा" चिल्लाया था। यह पंतेकुस्त के त्योहार का मौसम है, शहर तीर्थयात्रियों से भरने वाला है। शिष्य किसी मंदिर के कक्ष में नहीं, एक अटारी में हैं, किराए के ऊपरी कमरे में, जहाँ दरवाजा बंद रखना समझदारी थी। जैतून पहाड़ की दूरी "एक सब्त के दिन की दूरी" बताई गई है, यानी लगभग एक किलोमीटर, उतना जितना सब्त पर चलना जायज़ माना जाता था; लूका का यह छोटा-सा माप बताता है कि ये लोग अभी भी यहूदी जीवन के भीतर सांस ले रहे थे। और ध्यान रखें कि इस सभा में स्त्रियाँ और यीशु मसीह की माता मरियम भी गिनी जाती हैं, जो उस समाज में असामान्य था। बारहवें प्रेरित का चुनाव भी आकस्मिक नहीं: बारह गोत्रों के लिए बारह गवाह, इस्राएल की नई शुरुआत का संकेत।

चिंतन के प्रश्न

आपके जीवन में वह कौन सा प्रश्न है जिसका उत्तर परमेश्वर ने आज तक नहीं दिया, और उस चुप्पी के साथ आप कैसे जी रहे हैं?

कहीं आप आकाश की ओर ताकते हुए, अगली स्पष्टता की प्रतीक्षा में, उस काम को टाल नहीं रहे जो आज आपके सामने रखा है?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

Ajith Fernando

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Acts 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 1 का क्या अर्थ है?
बादल ने उन्हें छिपा लिया, और ग्यारह लोग आकाश की ओर ताकते रह गए। लूका अपनी दूसरी पुस्तक थियुफिलुस के नाम खोलते हैं: चालीस दिन तक जी उठे यीशु मसीह अपने प्रेरितों को दिखाई देते रहे, परमेश्वर के राज्य की बातें करते रहे, और अंत में एक आज्ञा छोड़ गए, यरूशलेम मत छोड़ो, पिता की प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा करो। फिर वे ऊपर उठा लिए गए, दो श्वेत वस्त्रधारी पुरुष उन ताकते हुए शिष्यों को फिर धरती पर लौटाते हैं, और वे अटारी पर जाकर प्रार्थना में लग जाते हैं। इसी प्रतीक्षा के बीच पतरस खड़े होते हैं और यहूदा के खाली हुए स्थान पर मत्तियाह चिट्ठी द्वारा चुने जाते हैं।
प्रेरितों के काम 1 किस विषय में है?
चालीस दिन। जल से बपतिस्मा, फिर आत्मा से बपतिस्मा। जैतून पहाड़ से बादल में उठ जाना। ये चित्र संयोग नहीं हैं। इस्राएल चालीस वर्ष जंगल में रहा, प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा करता हुआ; अब चालीस दिन तक मसीह अपने लोगों को नई प्रतिज्ञा के लिए तैयार करते हैं। और जो बादल यीशु मसीह को ढाँकता है, वही बादल है जो सीनै पर उतरा और मंदिर को भर गया, परमेश्वर की उपस्थिति का पर्दा। मसीह किसी शून्य में नहीं जाते, वे पिता के सिंहासन तक जाते हैं। "यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक" यह भूगोल अब्राहम से चला आ रहा वादा है, कि उसके द्वारा पृथ्वी की सब जातियाँ आशीष पाएँगी। कहानी सिकुड़ी नहीं, फैल गई।
प्रेरितों के काम 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"हे गलीली पुरुषों।" कमाल है कि उन्हें प्रेरित नहीं, गलीली कहा गया। गलील उस समय ताने का नाम था, यरूशलेम के पढ़े-लिखे लोग गलीली उच्चारण पर हँसते थे। पतरस की जबान ने आँगन में उसे पकड़वा दिया था। यानी जिस क्षण मसीह महिमा में उठाए जाते हैं, उनके गवाहों को उनकी देहाती पहचान से पुकारा जाता है। न कोई उपाधि, न कोई पदोन्नति। जो पृथ्वी की छोर तक जाना है, वह ग्यारह गँवई मर्दों और अटारी में प्रार्थना करती कुछ स्त्रियों से शुरू होता है। परमेश्वर अपनी योजना को छिपाते नहीं, पर वे उसे उन हाथों में देते हैं जिन्हें दुनिया गिनती में नहीं लेती।
प्रेरितों के काम 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
समय ईस्टर के लगभग छह सप्ताह बाद, स्थान यरूशलेम, वही शहर जहाँ कुछ हफ्ते पहले भीड़ ने "क्रूस पर चढ़ा" चिल्लाया था। यह पंतेकुस्त के त्योहार का मौसम है, शहर तीर्थयात्रियों से भरने वाला है। शिष्य किसी मंदिर के कक्ष में नहीं, एक अटारी में हैं, किराए के ऊपरी कमरे में, जहाँ दरवाजा बंद रखना समझदारी थी। जैतून पहाड़ की दूरी "एक सब्त के दिन की दूरी" बताई गई है, यानी लगभग एक किलोमीटर, उतना जितना सब्त पर चलना जायज़ माना जाता था; लूका का यह छोटा-सा माप बताता है कि ये लोग अभी भी यहूदी जीवन के भीतर सांस ले रहे थे। और ध्यान रखें कि इस सभा में स्त्रियाँ और यीशु मसीह की माता मरियम भी गिनी जाती हैं, जो उस समाज में असामान्य था। बारहवें प्रेरित का चुनाव भी आकस्मिक नहीं: बारह गोत्रों के लिए बारह गवाह, इस्राएल की नई शुरुआत का संकेत।
प्रेरितों के काम 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
कहीं आप आकाश की ओर ताकते हुए, अगली स्पष्टता की प्रतीक्षा में, उस काम को टाल नहीं रहे जो आज आपके सामने रखा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

हे गलीली पुरुषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?" स्वर्गदूत उनकी आँखें आसमान से हटाकर गलील की ओर मोड़ते हैं, उनके अपने लोगों, अपने काम की ओर। और साथ में एक सांत्वना भी, "यही यीशु" फिर आएगा। वही, कोई और नहीं। जिसने तुम्हारे पाँव धोए थे, वही लौटेगा। तो अब बस खड़े मत रहो, जाओ, जीओ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

जी उठने के बाद यीशु एक बार दिखकर चले नहीं गए। "उसने दुःख उठाने के बाद बहुत से पक्के प्रमाणों से अपने आपको उन्हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्हें दिखाई देता रहा।" चालीस दिन, बार बार, क्योंकि वह जानता था कि उनका मन कितना डगमगा रहा है। तेरे संदेह से वह ऊबता नहीं। वह लौट लौटकर आता है, जब तक तू सचमुच जान न ले।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

चेले पूछ रहे थे, "क्या तू इसी समय राज्य फिर से बहाल करेगा?" यीशु ने तारीख नहीं बताई, बस इतना कहा, "उन समयों या कालों को जानना, जिनको पिता ने अपने ही अधिकार में रखा है, तुम्हारा काम नहीं।" कुछ बातें पिता के हाथ में ही रहती हैं, और यही तेरे लिए चैन है। तू भी शायद पूछ रहा है, कब? उत्तर के बिना भी उसका हाथ थामे रहना सीख।

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