बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 1:11

बाइबल

पाठ

दो श्वेत वस्त्रधारी पुरुष जैतून पहाड़ पर खड़े ग्यारह चेलों से एक सवाल पूछते हैं जो सांत्वना कम और झिड़की ज़्यादा लगता है: "हे गलीली पुरुषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?" फिर वे एक वादा जोड़ते हैं जो पूरी कलीसिया की आशा का आधार बन गया: "यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा।" स्वर्गारोहण का अंत नहीं, बल्कि एक नई प्रतीक्षा की शुरुआत।

मर्म

इस वचन का धार्मिक केंद्र एक छोटे से शब्द में छिपा है: "यही"। स्वर्गदूत यह नहीं कहते कि परमेश्वर लौटेंगे, या कोई महिमामय शक्ति प्रकट होगी। वे कहते हैं: यही यीशु। वही व्यक्ति जिसके साथ ये लोग नाव में सोए थे, जिसने उनके पैर धोए, जिसके हाथों में कीलों के निशान हैं। मसीह का देहधारण कोई अस्थायी वेश नहीं था जिसे वे स्वर्ग की दहलीज़ पर उतार देते। परमेश्वर ने मनुष्यता को हमेशा के लिए अपना लिया है। और यही बात हमारे उद्धार की गारंटी है: जो हमारा भाई बना, वही न्याय करने आएगा। इतिहास किसी अंधी शक्ति की ओर नहीं, एक जाने-पहचाने चेहरे की ओर बह रहा है।

सूत्र

दानिय्येल ने रात के दर्शन में देखा था कि "मनुष्य के सन्तान सा" कोई आकाश के बादलों के साथ आता है और उसे राज्य, महिमा और प्रभुता दी जाती है। पद 9 में बादल यीशु को छिपा नहीं रहा, वह उन्हें पिता के सिंहासन तक ले जा रहा है। यानी जैतून पहाड़ पर जो हुआ वह विदाई नहीं, राज्याभिषेक था। और स्वर्गदूतों की घोषणा उसी दर्शन का दूसरा आधा भाग खोल देती है: जिसे बादल ले गया, उसे बादल वापस लाएगा। पुराने नियम की सारी प्रतीक्षा, दाऊद के सिंहासन का वादा, भविष्यद्वक्ताओं की पुकार कि परमेश्वर आकर न्याय करेंगे, इस एक व्यक्ति में सिमट आई है। उद्धार की कहानी में यह वचन वह कील है जो अतीत और भविष्य दोनों को एक साथ जोड़ती है।

दर्पण

आकाश की ओर ताकते रहना आज भी हमारा सबसे धार्मिक दिखने वाला पलायन है। हम भविष्यवाणी के चार्ट बनाते हैं, समाचारों में संकेत ढूँढ़ते हैं, और इस बीच पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते। दूसरी ओर एक और खतरा है: हम इतने व्यस्त हैं कि वापसी की बात हमारे कैलेंडर में कहीं दर्ज ही नहीं। सोमवार की मीटिंग, बच्चों की फीस, माता-पिता की बीमारी, और वह पुराना झगड़ा जिसे सुलझाने का समय नहीं मिला। यह वचन दोनों को छूता है। यदि यीशु सचमुच लौट आएंगे, तो जिस बात को आप टालते आए हैं, वह वैसे ही नहीं रह सकती। क्षमा जो कल पर टाली गई, ईमानदारी जो सुविधा के कारण छोड़ी गई, गवाही जो शर्म के कारण दबाई गई। प्रतीक्षा आलस्य नहीं, तैयारी है।

एक बारीकी

"हे गलीली पुरुषों।" स्वर्गदूत उन्हें "प्रेरितों" या "चुने हुओं" नहीं कहते, बल्कि उनके गाँव-देहात के नाम से पुकारते हैं। गलील यरूशलेम की नज़र में पिछड़ा इलाका था, उच्चारण से पहचाना जाने वाला, थोड़ा उपहास के योग्य। ठीक उसी क्षण जब ब्रह्मांड का राजा सिंहासन पर बैठ रहा है, स्वर्ग उसके साथियों को उनकी साधारण पहचान से पुकारता है। यह अपमान नहीं, अनुग्रह है। पद 8 में उन्हें "पृथ्वी की छोर तक" गवाह बनने का काम मिला है, और उसी साँस में उन्हें याद दिलाया जाता है कि वे कौन हैं: गलील के मामूली लोग। परमेश्वर का राज्य ऐसे ही लोगों के हाथों फैलता है, जो अपनी छोटी शुरुआत भूलते नहीं।

कठिन प्रश्न

दो हज़ार साल हो गए। "जिस रीति से" का वादा अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ? पद 7 में यीशु स्वयं इस सवाल का दरवाज़ा बंद कर चुके हैं: "उन समयों या कालों को जानना, जिनको पिता ने अपने ही अधिकार में रखा है, तुम्हारा काम नहीं।" यह उत्तर संतोषजनक नहीं लगता, खासकर उस माँ को जिसने अन्याय में बेटा खोया है, या उस मंडली को जो सताव में जी रही है। पर ध्यान दीजिए कि यीशु समय की जानकारी को हमसे छिपाकर हमें खाली नहीं छोड़ते; वे उसकी जगह पवित्र आत्मा और गवाही का काम रख देते हैं। देरी का रहस्य बना रहता है। मगर वह रहस्य अनुपस्थिति नहीं है। जो व्यक्ति लौटने का वादा करके गया, वह अब भी वही व्यक्ति है।

पहले सुननेवाले

लूका जिनके लिए लिख रहे हैं, वे ऐसे विश्वासी हैं जो पहली पीढ़ी के गुज़र जाने के बाद घबरा रहे थे। यरूशलेम का मंदिर नष्ट हो चुका था या होने को था, रोमी सम्राट स्वयं को देवता कहलवाता था, और "आगमन" शब्द राजा के नगर-प्रवेश के लिए इस्तेमाल होता था, जिसमें प्रजा शहर के बाहर निकलकर उसका स्वागत करती थी। इन कानों में यह वचन राजनीतिक रूप से खतरनाक था: असली राजा लौट रहा है, और वह कैसर नहीं। साथ ही यह गहरा दिलासा भी था। उनके शहीद व्यर्थ नहीं मरे, उनकी छोटी सभाएँ इतिहास के हाशिये पर नहीं हैं। पद 6 की उम्मीद कि इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित हो, टली नहीं थी; वह बड़ी होकर पूरी पृथ्वी तक फैल गई थी।

चिंतन

यदि आप सचमुच यह मानते हैं कि "यही यीशु" इसी सप्ताह लौट सकते हैं, तो आपके रिश्तों या पैसों में कौन-सी एक बात आज ही बदलनी चाहिए?

आप आकाश की ओर ताकने में ज़्यादा समय बिताते हैं या ज़मीन पर गवाही देने में, और यह असंतुलन आपके भीतर के किस डर से जुड़ा है?

Acts में और गहराई से जानें

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The Message of Acts

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Acts: An Introduction and Commentary

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Acts 1:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 1:11 का क्या अर्थ है?
दो श्वेत वस्त्रधारी पुरुष जैतून पहाड़ पर खड़े ग्यारह चेलों से एक सवाल पूछते हैं जो सांत्वना कम और झिड़की ज़्यादा लगता है: "हे गलीली पुरुषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?" फिर वे एक वादा जोड़ते हैं जो पूरी कलीसिया की आशा का आधार बन गया: "यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा।" स्वर्गारोहण का अंत नहीं, बल्कि एक नई प्रतीक्षा की शुरुआत।
प्रेरितों के काम 1:11 किस विषय में है?
दानिय्येल ने रात के दर्शन में देखा था कि "मनुष्य के सन्तान सा" कोई आकाश के बादलों के साथ आता है और उसे राज्य, महिमा और प्रभुता दी जाती है। पद 9 में बादल यीशु को छिपा नहीं रहा, वह उन्हें पिता के सिंहासन तक ले जा रहा है। यानी जैतून पहाड़ पर जो हुआ वह विदाई नहीं, राज्याभिषेक था। और स्वर्गदूतों की घोषणा उसी दर्शन का दूसरा आधा भाग खोल देती है: जिसे बादल ले गया, उसे बादल वापस लाएगा। पुराने नियम की सारी प्रतीक्षा, दाऊद के सिंहासन का वादा, भविष्यद्वक्ताओं की पुकार कि परमेश्वर आकर न्याय करेंगे, इस एक व्यक्ति में सिमट आई है। उद्धार की कहानी में यह वचन वह कील है जो अतीत और भविष्य दोनों को एक साथ जोड़ती है।
प्रेरितों के काम 1:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"हे गलीली पुरुषों।" स्वर्गदूत उन्हें "प्रेरितों" या "चुने हुओं" नहीं कहते, बल्कि उनके गाँव-देहात के नाम से पुकारते हैं। गलील यरूशलेम की नज़र में पिछड़ा इलाका था, उच्चारण से पहचाना जाने वाला, थोड़ा उपहास के योग्य। ठीक उसी क्षण जब ब्रह्मांड का राजा सिंहासन पर बैठ रहा है, स्वर्ग उसके साथियों को उनकी साधारण पहचान से पुकारता है। यह अपमान नहीं, अनुग्रह है। पद 8 में उन्हें "पृथ्वी की छोर तक" गवाह बनने का काम मिला है, और उसी साँस में उन्हें याद दिलाया जाता है कि वे कौन हैं: गलील के मामूली लोग। परमेश्वर का राज्य ऐसे ही लोगों के हाथों फैलता है, जो अपनी छोटी शुरुआत भूलते नहीं।
प्रेरितों के काम 1:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका जिनके लिए लिख रहे हैं, वे ऐसे विश्वासी हैं जो पहली पीढ़ी के गुज़र जाने के बाद घबरा रहे थे। यरूशलेम का मंदिर नष्ट हो चुका था या होने को था, रोमी सम्राट स्वयं को देवता कहलवाता था, और "आगमन" शब्द राजा के नगर-प्रवेश के लिए इस्तेमाल होता था, जिसमें प्रजा शहर के बाहर निकलकर उसका स्वागत करती थी। इन कानों में यह वचन राजनीतिक रूप से खतरनाक था: असली राजा लौट रहा है, और वह कैसर नहीं। साथ ही यह गहरा दिलासा भी था। उनके शहीद व्यर्थ नहीं मरे, उनकी छोटी सभाएँ इतिहास के हाशिये पर नहीं हैं। पद 6 की उम्मीद कि इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित हो, टली नहीं थी; वह बड़ी होकर पूरी पृथ्वी तक फैल गई थी।
प्रेरितों के काम 1:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप आकाश की ओर ताकने में ज़्यादा समय बिताते हैं या ज़मीन पर गवाही देने में, और यह असंतुलन आपके भीतर के किस डर से जुड़ा है?
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Acts 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 11

हे गलीली पुरुषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो?" स्वर्गदूत उनकी आँखें आसमान से हटाकर गलील की ओर मोड़ते हैं, उनके अपने लोगों, अपने काम की ओर। और साथ में एक सांत्वना भी, "यही यीशु" फिर आएगा। वही, कोई और नहीं। जिसने तुम्हारे पाँव धोए थे, वही लौटेगा। तो अब बस खड़े मत रहो, जाओ, जीओ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

जी उठने के बाद यीशु एक बार दिखकर चले नहीं गए। "उसने दुःख उठाने के बाद बहुत से पक्के प्रमाणों से अपने आपको उन्हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्हें दिखाई देता रहा।" चालीस दिन, बार बार, क्योंकि वह जानता था कि उनका मन कितना डगमगा रहा है। तेरे संदेह से वह ऊबता नहीं। वह लौट लौटकर आता है, जब तक तू सचमुच जान न ले।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

चेले पूछ रहे थे, "क्या तू इसी समय राज्य फिर से बहाल करेगा?" यीशु ने तारीख नहीं बताई, बस इतना कहा, "उन समयों या कालों को जानना, जिनको पिता ने अपने ही अधिकार में रखा है, तुम्हारा काम नहीं।" कुछ बातें पिता के हाथ में ही रहती हैं, और यही तेरे लिए चैन है। तू भी शायद पूछ रहा है, कब? उत्तर के बिना भी उसका हाथ थामे रहना सीख।

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